समाज लोगों से प्यार तब तक करता है, जब तक वे उसके लिए उपयोगी रहते हैं। और जैसे ही कोई व्यक्ति उपयोगी होना बंद कर देता है—उसका अस्तित्व भी असहज हो जाता है। यही वास्तविक भयावहता है काफ्का के "द मेटामॉर्फोसिस" की। ग्रेगर साम्सा रातों‑रात कोई राक्षस नहीं बन जाता। वह बस एक ऐसा इंसान बन जाता है जो अब काम नहीं कर सकता, कमाई नहीं कर सकता, परिवार की उम्मीदों को पूरा नहीं कर सकता, और समाज की उस "सामान्य" दुनिया में फिट नहीं बैठता जो हम सबको थोप देती है। और अचानक— उसका अपना कमरा छोटा लगने लगता है, घर की बातचीत में ठंडक घर कर जाती है, और वही परिवार जिसने कभी उस पर अपेक्षाएँ और निर्भरता रखी थी, धीरे‑धीरे उसके बिना जीना सीख जाता है। काफ्का हमें दिखाते हैं कि समाज अक्सर मानवता की कीमत नहीं, बस उत्पादकता की कीमत चुकता है। जैसे ही कोई व्यक्ति कमज़ोर होता है, बेरोज़गार होता है, दुखी, अलग, टूटा हुआ— तो वह बस एक बोझ बन जाता है। किसी इंसान की जगह एक “समस्या” बन जाता है। यह सच्चाई हम आ...
महाभारत_सभी_दण्डित_हुए✍🏻🙏🏻 बहुत सारे मित्रों ने कहा कि महाभारत के चीर-हरण प्रसङ्ग पर लिखिये।. मुझे लगता है महाभारत एक पूर्ण न्यायशास्त्र है, और चीर-हरण उसका केन्द्रबिन्दु! इस प्रसङ्ग के बाद की पूरी कथा इस घिनौने अपराध के अपराधियों को मिले दण्ड की कथा है।. वह दण्ड, जिसे निर्धारित किया भगवान श्रीकृष्ण ने और किसी को नहीं छोड़ा... किसी को भी नहीं। दुर्योधन ने उस अबला स्त्री को दिखा कर अपनी जंघा ठोकी थी, तो उसकी जंघा तोड़ी गयी। दुशासन ने छाती ठोकी तो उसकी छाती फाड़ दी गयी। महारथी कर्ण ने एक असहाय स्त्री के अपमान का समर्थन किया, तो श्रीकृष्ण ने असहाय दशा में ही उसका वध कराया। भीष्म ने यदि प्रतिज्ञा में बंध कर एक स्त्री के अपमान को देखने और सहन करने का पाप किया, तो असँख्य तीरों में बिंध कर अपने पूरे कुल को एक-एक कर मरते हुए भी देखे... भारत का कोई बुजुर्ग अपने सामने अपने बच्चों को मरते देखना नहीं चाहता, पर भीष्म अपने सामने चार पीढ़ियों को मरते देखते रहे। जबतक सब देख नहीं लिया, तबतक मर भी न सके... यही उनका दण्ड था। ...