प्रेमचंद का एक चित्र मेरे सामने है, पत्नी के साथ फ़ोटो खिंचा रहे हैं. सिर पर किसी मोटे कपड़े की टोपी, कुरता और धोती पहने हैं. कनपटी चिपकी है, गालों की हड्डियां उभर आई हैं, पर घनी मूंछें चेहरे को भरा-भरा बतलाती हैं. पांवों में केनवस के जूते हैं, जिनके बंद बेतरतीब बंधे हैं. लापरवाही से उपयोग करने पर बंद के सिरों पर की लोहे की पतरी निकल जाती है और छेदों में बंद डालने में परेशानी होती है. तब बंद कैसे भी कस लिए जाते हैं. दाहिने पांव का जूता ठीक है, मगर बाएं जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अंगुली बाहर निकल आई है. मेरी दृष्टि इस जूते पर अटक गई है. सोचता हूं-फ़ोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी-इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है. यह जैसा है, वैसा ही फ़ोटो में खिंच जाता है. मैं चेहरे की तरफ़ देखता हूं. क्या तुम्हें मालूम है, मेरे साहित्यिक पुरखे कि तुम्हारा जूता फट गया है और अंगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हें इसका ज़रा भी अहसास नहीं है? ज़रा लज्जा, संकोच या झेंप नहीं है? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि धोती को थोड़ा न...
अर्थला पुस्तक समीक्षा Arthala by Vivek Kumar book review by Abiiinabu फिक्शन फैंटेसी श्रेणी में श्रेष्ठ उपन्यासों में से एक कहना जल्द बाजी होगी। अर्थला की किस्सागोई जबरदस्त है और वर्णन करते समय एक बार को तो ऐसा लगने लगता है कि आप स्वयं वहां मौजूद हों। विधान एक साधारण से घर में पला बढ़ा नवयुवक है। उसकी रुचि अपने मा के काम को ना करते हुए योद्धा बनने की है। जिसके लिए वे पिछले पांच वर्षों से लगातार अपने गुरु से कलाएं सीख रहा है। उसके अपने गुरु के बारे में कुछ भी नहीं मालूम है सिवाय इसके कि वे उसके गुरु हैं और उनमें गजब की प्रतिभा है। गुरुजी विधान को युद्धकला के साथ साथ जीवन के दर्शन भी समझाते रहते हैं। विधान गुरुजी के बारे में जानना चाहता है लेकिन गुरुजी गुरुदक्षिना वाले दिन बताने कि बात कह कर टालते रहते हैं। इंतजार करते करते गुरूदक्षीना वाला दिन भी आ जाता है और विधान की आंखों के सामने है उसके गुरु की हत्या कर दी जाती है। उसके गुरु की हत्या किसने की? उसके गुरु की हत्या क्यों की? उसके गुरु कौन थे? इन्हीं सब प्रश्नों के उत्तर पाने की तलाश में विधान व्याकुल रहता है। त...