समाज लोगों से प्यार तब तक करता है, जब तक वे उसके लिए उपयोगी रहते हैं। और जैसे ही कोई व्यक्ति उपयोगी होना बंद कर देता है—उसका अस्तित्व भी असहज हो जाता है। यही वास्तविक भयावहता है काफ्का के "द मेटामॉर्फोसिस" की। ग्रेगर साम्सा रातों‑रात कोई राक्षस नहीं बन जाता। वह बस एक ऐसा इंसान बन जाता है जो अब काम नहीं कर सकता, कमाई नहीं कर सकता, परिवार की उम्मीदों को पूरा नहीं कर सकता, और समाज की उस "सामान्य" दुनिया में फिट नहीं बैठता जो हम सबको थोप देती है। और अचानक— उसका अपना कमरा छोटा लगने लगता है, घर की बातचीत में ठंडक घर कर जाती है, और वही परिवार जिसने कभी उस पर अपेक्षाएँ और निर्भरता रखी थी, धीरे‑धीरे उसके बिना जीना सीख जाता है। काफ्का हमें दिखाते हैं कि समाज अक्सर मानवता की कीमत नहीं, बस उत्पादकता की कीमत चुकता है। जैसे ही कोई व्यक्ति कमज़ोर होता है, बेरोज़गार होता है, दुखी, अलग, टूटा हुआ— तो वह बस एक बोझ बन जाता है। किसी इंसान की जगह एक “समस्या” बन जाता है। यह सच्चाई हम आ...
सौ दिन की पराजय एक क्षण की कायरता से बेहतर होती है.. 18 साल के IPL में, कभी भी मैने, धोनी के क्रीज पर रहते हुए,चेपक को इतना खामोश नहीं देखा था, जितना खामोश चेपक आज था। बहुत से लोग धोनी को शायद इसलिए पसंद करते होंगे क्योंकि उसने ट्रॉफियां जिताई है, रन बनाए है, छक्के मारे है। पर मुझे धोनी सिर्फ और सिर्फ अपनी दिलेरी की वजह से पसंद रहा है। वो बांग्लादेश वाला मैच, जब एक रन बराबरी के लिए चाहिए था,कोई और विकेटकीपर होता तो थ्रो मार देता, पर हाथ में गेंद लेकर स्प्रिंट नहीं लगाता। क्योंकि थ्रो मारने पर थ्रो लगे न लगे,मामला फिफ्टी फिफ्टी का रहता है, कोई धोनी को ब्लेम करने नहीं जाता, पर हाथ में गेंद लेकर दौड़ने पर अगर एक दो सेकंड का फासला भी रहता तो सारा ब्लेम धोनी पर ही आना था, पर धोनी को कभी डर नहीं लगा इन बातों से। इसी तरह वर्ल्डकप फाइनल में, खुद को युवराज की जगह प्रमोट करना,वहां धोनी के पास पाने को कम और खोने को ज्यादा था। पर ये बन्दा उतरा, खेला, और जिताया भी।कई लोग धोनी को उस दिन के लिए ट्रॉल करते है, जब धोनी ने अंबाती रायडू को आधी पिच से लौटा दिया था इस कॉन्फिडेंट में कि लास्ट बॉल पर मै...