प्रेमचंद का एक चित्र मेरे सामने है, पत्नी के साथ फ़ोटो खिंचा रहे हैं. सिर पर किसी मोटे कपड़े की टोपी, कुरता और धोती पहने हैं. कनपटी चिपकी है, गालों की हड्डियां उभर आई हैं, पर घनी मूंछें चेहरे को भरा-भरा बतलाती हैं. पांवों में केनवस के जूते हैं, जिनके बंद बेतरतीब बंधे हैं. लापरवाही से उपयोग करने पर बंद के सिरों पर की लोहे की पतरी निकल जाती है और छेदों में बंद डालने में परेशानी होती है. तब बंद कैसे भी कस लिए जाते हैं. दाहिने पांव का जूता ठीक है, मगर बाएं जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अंगुली बाहर निकल आई है. मेरी दृष्टि इस जूते पर अटक गई है. सोचता हूं-फ़ोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी-इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है. यह जैसा है, वैसा ही फ़ोटो में खिंच जाता है. मैं चेहरे की तरफ़ देखता हूं. क्या तुम्हें मालूम है, मेरे साहित्यिक पुरखे कि तुम्हारा जूता फट गया है और अंगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हें इसका ज़रा भी अहसास नहीं है? ज़रा लज्जा, संकोच या झेंप नहीं है? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि धोती को थोड़ा न...
Democracy is in Danger!! लोकतंत्र खतरे में है !!! यह हमारे देश की विडम्बना है कि तमिलनाडु के रामेश्वरम की धनुषकोटि में एक नाव चलाने वाले का एक बेटा लोकतंत्र की बदौलत देश की नैया का खवैया बनता है, और उसी बेटे की पुण्यस्मृति में आयोजित कई कार्यक्रमों में अचानक से यह कहा जाने लगा कि लोकतंत्र खतरे में है। पहले उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश और अब भूतपूर्व उप राष्ट्रपति अचानक से चेते और एक असंवैधानिक कदम उठाते हुए सभी को बोलने लगे कि लोकतंत्र विफल हो चुका है , इस देश में लोकतंत्र की हत्या हो चुकी है और लोकतंत्र अपने जीवन की अंतिम श्वाँसों को बड़ी ही अधीरता से गिन रहा है। पाठकों इस घटना ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। यह घटना एक तमाचा थी मेरे जैसे उस प्रत्येक देशवासी के मुँह पर जो यह सोचता था कि भारत विश्व का सबसे बड़ा और शानदार लोकतंत्र है जो हर विभाग में दुनिया की महाशक्तियों को बड़ी टक्कर दे रहा है। उस तमाचे से हृदय में एक ऐसी पीड़ा ह...