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जून, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

प्रेमचंद के फटे जूते

  प्रेमचंद का एक चित्र मेरे सामने है, पत्नी के साथ फ़ोटो खिंचा रहे हैं. सिर पर किसी मोटे कपड़े की टोपी, कुरता और धोती पहने हैं. कनपटी चिपकी है, गालों की हड्डियां उभर आई हैं, पर घनी मूंछें चेहरे को भरा-भरा बतलाती हैं. पांवों में केनवस के जूते हैं, जिनके बंद बेतरतीब बंधे हैं. लापरवाही से उपयोग करने पर बंद के सिरों पर की लोहे की पतरी निकल जाती है और छेदों में बंद डालने में परेशानी होती है. तब बंद कैसे भी कस लिए जाते हैं. दाहिने पांव का जूता ठीक है, मगर बाएं जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अंगुली बाहर निकल आई है. मेरी दृष्टि इस जूते पर अटक गई है. सोचता हूं-फ़ोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी-इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है. यह जैसा है, वैसा ही फ़ोटो में खिंच जाता है. मैं चेहरे की तरफ़ देखता हूं. क्या तुम्हें मालूम है, मेरे साहित्यिक पुरखे कि तुम्हारा जूता फट गया है और अंगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हें इसका ज़रा भी अहसास नहीं है? ज़रा लज्जा, संकोच या झेंप नहीं है? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि धोती को थोड़ा न...

Suicide Fruiting

इस साल बाज़ार में जितने जामुन दिखाई दे रहे हैं, उतने मैंने पिछले दो दशकों में कभी नहीं देखे। ​जामुन के अक्षरशः ढेर लग रहे हैं (नीचे गिर रहे हैं)। जिन पेड़ों पर पिछले साल इक्का-दुक्का फल आए थे, वे पेड़ भी इस बार जामुन से पटे पड़े हैं। जहाँ फल आए थे, वहाँ अब उन का अंबार लगना शुरू हो गया है। ​आखिर यह सब क्या चल रहा है? ​हमारी दादी/नानी हमेशा कहती थीं कि, "जिस गर्मियों में जामुन के ऐसे ढेर लगते हैं, उस साल सूखा पड़ता है।" ​बुजुर्गों का यह पारंपरिक ज्ञान वनस्पति विज्ञान (Botany) के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बिल्कुल सही और सटीक है। विज्ञान में इस दिलचस्प और उतनी ही चौंकाने वाली प्रक्रिया को "मास्टिंग" (Masting) या "स्ट्रेस फ्रूटिंग" (Stress Fruiting) कहा जाता है। ​पेड़ों द्वारा खुद को खत्म करके ज्यादा से ज्यादा फल देने के इस आखिरी प्रयास को कभी-कभी "सुसाइड फ्रूटिंग" (Suicide Fruiting) या "बंपर क्रॉप" भी कहा जाता है। ​यह असल में क्या है और इसके पीछे का विज्ञान क्या कहता है, आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं: ​१. 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट' (अस्ति...

Who was Prathvi Raj Kapoor

​ आज जब कपूर खानदान का नाम लिया जाता है, तो लोगों के सामने रणबीर कपूर, करीना कपूर और करिश्मा कपूर जैसे सितारों की तस्वीर उभरती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस विशाल विरासत की नींव एक ऐसे इंसान ने रखी थी, जिसने संघर्ष को अपनी ताकत बनाया था। वह इंसान थे पृथ्वीराज कपूर। पृथ्वीराज कपूर केवल अभिनेता नहीं थे। वह एक आंदोलन थे। एक सोच थे। एक ऐसी विरासत थे, जिसने भारतीय सिनेमा को नई पहचान दी। उनकी जिंदगी में गरीबी थी, दर्द था, असफलताएं थीं और ऐसे फैसले थे, जिन्होंने उन्हें बाकी कलाकारों से अलग बना दिया। यही वजह है कि उनकी कहानी आज भी लोगों को प्रेरित करती है। मां का साया बचपन में छिन गया, बुआ बनीं यशोदा 3 नवंबर 1906 को अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत में पृथ्वीनाथ कपूर का जन्म हुआ था। उनका बचपन सामान्य नहीं था। जब वह केवल तीन वर्ष के थे, तब उनकी मां का निधन हो गया। इतनी छोटी उम्र में मां का साया सिर से उठ जाना किसी भी बच्चे के लिए बड़ा आघात होता है। उनके पिता ने बाद में दूसरी शादी कर ली। इसके बाद पृथ्वीराज को उनके दादा पेशावर ले गए। वहां उनकी बुआ ने उन्हें अपने बेटे की तरह पाला। कहा जाता है...