सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Suicide Fruiting

इस साल बाज़ार में जितने जामुन दिखाई दे रहे हैं, उतने मैंने पिछले दो दशकों में कभी नहीं देखे। ​जामुन के अक्षरशः ढेर लग रहे हैं (नीचे गिर रहे हैं)। जिन पेड़ों पर पिछले साल इक्का-दुक्का फल आए थे, वे पेड़ भी इस बार जामुन से पटे पड़े हैं। जहाँ फल आए थे, वहाँ अब उन का अंबार लगना शुरू हो गया है। ​आखिर यह सब क्या चल रहा है? ​हमारी दादी/नानी हमेशा कहती थीं कि, "जिस गर्मियों में जामुन के ऐसे ढेर लगते हैं, उस साल सूखा पड़ता है।" ​बुजुर्गों का यह पारंपरिक ज्ञान वनस्पति विज्ञान (Botany) के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बिल्कुल सही और सटीक है। विज्ञान में इस दिलचस्प और उतनी ही चौंकाने वाली प्रक्रिया को "मास्टिंग" (Masting) या "स्ट्रेस फ्रूटिंग" (Stress Fruiting) कहा जाता है। ​पेड़ों द्वारा खुद को खत्म करके ज्यादा से ज्यादा फल देने के इस आखिरी प्रयास को कभी-कभी "सुसाइड फ्रूटिंग" (Suicide Fruiting) या "बंपर क्रॉप" भी कहा जाता है। ​यह असल में क्या है और इसके पीछे का विज्ञान क्या कहता है, आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं: ​१. 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट' (अस्ति...

The Protector of Sanatan Dharama: Naga Sadhu सनातन धर्म योद्धा: नागा साधु

नागा साधु बनने की प्रक्रिया और कुंभ मेला 
 🔱🚩

यूँ तो भारत में नागा साधुओं का इतिहास बहुत पुराना है लेकिन आज भी इनका जीवन आम लोगों के लिए एक रहस्य की तरह होता है। भारत में लगने वाले सबसे बड़े धार्मिक मेले महाकुंभ, के कई अलग-अलग रंगों में से सबसे रहस्यमयी रंग होते हैं- नागा साधु, जिनका संबंध शैव परंपरा से है।
सनातन परंपरा की रक्षा करने और इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए अलग-अलग संन्यासी अखाड़ों में हर महाकुंभ के दौरान नागा साधु बनने की प्रक्रिया अपनाई जाती है।
आमतौर पर नागा साधु सभी संन्यासी अखाड़ों में बनाए जाते हैं लेकिन जूना अखाड़ा सबसे ज्यादा नागा साधु बनाता है। 
सभी 13 अखाड़ों (निरंजनी अखाड़ा, जूना अखाड़ा, महानिर्वाणी अखाड़ा, अटल अखाड़ा,आह्वान अखाड़ा, आनंद अखाड़ा, पंचाग्नि अखाड़ा, नागपंथी गोरखनाथ अखाड़ा, वैष्णव अखाड़ा, उदासीन पंचायती बड़ा अखाड़ा,उदासीन नया अखाड़ा, निर्मल पंचायती अखाड़ा और निर्मोही अखाड़ा) में ये सबसे बड़ा अखाड़ा भी माना जाता है। जूना अखाड़े के महंत के मुताबिक नागाओं को सेना की तरह तैयार किया जाता है, उनको आम दुनिया से अलग और विशेष बनना होता है। इस प्रक्रिया में काफी समय लगता है।
महाकुंभ के दौरान नागा साधु बनाए जाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है जब नागा साधु बनने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति और संन्यासी जीवन जीने की प्रबल इच्छा रखने वाला कोई व्यक्ति नागा साधु बनने के लिए अखाड़े में जाता है तो उसे कभी सीधे-सीधे अखाड़े में शामिल नहीं किया जाता। 

अखाड़ा अपने स्तर पर ये जाँच करता है कि वह साधु क्यों बनना चाहता है, उसकी पूरी पृष्ठभूमि देखी जाती है। अगर अखाड़े को ये लगता है कि वह साधु बनने के लिए सही व्यक्ति है तो उसे अखाड़े में प्रवेश की अनुमति मिलती है। प्रवेश के बाद व्यक्ति को कई जटिल परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। प्रवेश की अनुमति के बाद पहले 3 साल गुरुओं की सेवा करने के साथ धर्म कर्म और अखाड़ों के नियमों को समझना होता है।इसी अवधि में सबसे पहली परीक्षा ‘ब्रह्मचर्य’ की ली जाती है। अगर अखाड़ा और उस व्यक्ति का गुरु यह निश्चित कर ले कि वह दीक्षा देने लायक हो चुका है तो फिर उसे अगली प्रक्रिया में ले जाया जाता है।
ब्रह्मचर्य की परीक्षा सफलतापूर्वक पूर्ण करने के बाद व्यक्ति को 5 गुरु- शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य और गणेश द्वारा, जिन्हें पंच देव भी कहा जाता है, से दीक्षा प्राप्त करनी होती है।

इस दौरान उनका मुंडन कराने के साथ उसे 108 बार गंगा में डुबकी लगवाई जाती है।
भस्म, भगवा, रूद्राक्ष आदि चीजें दी जाती हैं। उसे अवधूत बनाया जाता है। अखाड़ों के आचार्य द्वारा अवधूत का जनेऊ संस्कार कराने के साथ संन्यासी जीवन की शपथ दिलाई जाती हैं। इस दौरान उसके परिवार के साथ उसका भी ‘पिंडदान’ कराया जाता है। इसके पश्चात दंडी संस्कार कराया जाता है
और रातभर उसे “ॐ नम: शिवाय” का जाप करना होता है।

जप के बाद भोर में अखाड़े के महामंडलेश्वर उससे विजया हवन कराते हैं। उसके पश्चात सभी को फिर से गंगा में 108 डुबकियां लगवाई जाती हैं। स्नान के बाद अखाड़े के ध्वज के नीचे उससे दंडी त्याग कराया जाता है।
इस प्रक्रिया के बाद वह नागा साधु बन जाता है।

नागा साधु किसी अन्य व्यक्ति के समक्ष सिर नहीं झुकाते हैं उनका सिर आशीर्वाद लेने के लिए केवल वरिष्ठ सन्यासियों के समक्ष ही झुकता है। नागा साधु भिक्षा में मिला हुआ भोजन ही ग्रहण करते हैं। यदि किसी दिन उन्हें भोजन नहीं मिलता है तो उन्हें बिना खाए ही रहना पड़ता है। नागा साधुओं को आजीवन निर्वस्त्र रहना होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि वस्त्र को सांसारिक जीवन और आडंबर का प्रतीक माना जाता है। 
नागा साधु बनने के बाद वे अपने शरीर पर भभूत की चादर चढ़ा देते हैं। यह भस्म या भभूत बहुत लंबी प्रक्रिया के बाद तैयार की जाती है। या तो किसी मुर्दे की राख को शुद्ध करके उसे शरीर पर मला जाता है या फिर हवन या धुनी की राख से शरीर ढका जाता है। साथ ही ठंड इत्यादि से बचने के लिए कठिन योग क्रिया करते हैं। अगर मुर्दे की राख उपलब्ध नहीं है तो हवन कुंड में पीपल, पाखड़, सरसाला, केला और गाय के गोबर को जलाकर उस राख को एक कपड़े से छानकर दूध की सहायता से लड्डू बनाए जाते हैं। इन लड्डुओं को सात बार अग्नि में तपाकर उसे फिर कच्चे दूध से बुझा दिया जाता है। इस तरह भस्म तैयार होती है जिसे समय-समय पर नागा अपने शरीर पर लगाते हैं।
और यही भस्म उनके वस्त्र होते हैं। 
 क्यूँकि नागा साधु की प्रक्रिया प्रयाग (इलाहाबाद), हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में कुम्भ के दौरान ही होती है। ऐसे में प्रयाग के महाकुंभ में दीक्षा लेने वालों को ‘नागा’ , उज्जैन में दीक्षा लेने वालों को ‘खूनी नागा’, हरिद्वार में दीक्षा लेने वालों को ‘बर्फानी’  व नासिक वालों को ‘खिचड़िया नागा’ के नाम से जाना जाता है। 
इन्हें अलग-अलग नाम से केवल इसलिए जाना जाता है, जिससे उनकी यह पहचान हो सके कि किसने कहाँ दीक्षा ली है ।

टिप्पणियाँ

Best From the Author

Not demonic, just introverted! आसुरी नहीं, अंतर्मुखी!

मैं 27 मूल नक्षत्रों, शनिवार और 22 तारीख को जन्मा व्यक्ति हूँ — एक ऐसा जन्म‑संयोग जो न सिर्फ़ मेरी तिथि बताता है, बल्कि मेरे भीतर की गहराई, द्वंद्व और अस्थिरता का भी संकेत देता है। राहु के प्रबल और दूरदर्शी प्रभाव ने मेरे व्यक्तित्व को सीधे, सरल और सतही नहीं रहने दिया; मैं विचारों की उस गहरी खाई में अक्सर भटक जाता हूँ, जहाँ हर बात बस बाहरी रूप नहीं, बल्कि भीतरी अर्थ भी धरती होता है। मैं हर निर्णय के पीछे छिपे संभावित नतीजों, अनजाने खतरों और छिपी हुई उम्मीदों को भी देखने का आदी हूँ।   कभी‑कभी लोग मेरे कार्यों, अभिव्यक्ति और निर्णयों को असामान्य, अत्यंत गहन या यहाँ तक कि “आसुरी” समझने लगते हैं, क्योंकि मेरी सोच उनकी सामान्य धारणाओं की रेखाओं से बाहर निकल जाती है। पर यह आसुरी नहीं, बस एक टूटी हुई, खुरदरी और अत्यंत ईमानदार आत्मा की आवाज़ है, जो दिखावे की दुनिया से थक चुकी है और अपने सच्चे रूप में जीना चाहती है। मैं जब भी बोलता हूँ, तो बस शब्द नहीं बोलता, बल्कि उसके पीछे समा दर्द, संघर्ष, अनुभव और उम्मीदों को भी लाता हूँ।   मेरी पहचान में ग्रहों का भी बड़ा हाथ है। जब ग्रह ही वही है...

काग के भाग बड़े सजनी

  पितृपक्ष में रसखान रोते हुए मिले। सजनी ने पूछा -‘क्यों रोते हो हे कवि!’ कवि ने कहा:‘ सजनी पितृ पक्ष लग गया है। एक बेसहारा चैनल ने पितृ पक्ष में कौवे की सराहना करते हुए एक पद की पंक्ति गलत सलत उठायी है कि कागा के भाग बड़े, कृश्न के हाथ से रोटी ले गया।’ सजनी ने हंसकर कहा-‘ यह तो तुम्हारी ही कविता का अंश है। जरा तोड़मरोड़कर प्रस्तुत किया है बस। तुम्हें खुश होना चाहिए । तुम तो रो रहे हो।’ कवि ने एक हिचकी लेकर कहा-‘ रोने की ही बात है ,हे सजनी! तोड़मोड़कर पेश करते तो उतनी बुरी बात नहीं है। कहते हैं यह कविता सूरदास ने लिखी है। एक कवि को अपनी कविता दूसरे के नाम से लगी देखकर रोना नहीं आएगा ? इन दिनों बाबरी-रामभूमि की संवेदनशीलता चल रही है। तो क्या जानबूझकर रसखान को खान मानकर वल्लभी सूरदास का नाम लगा दिया है। मनसे की तर्ज पर..?’ खिलखिलाकर हंस पड़ी सजनी-‘ भारतीय राजनीति की मार मध्यकाल तक चली गई कविराज ?’ फिर उसने अपने आंचल से कवि रसखान की आंखों से आंसू पोंछे और ढांढस बंधाने लगी।  दृष्य में अंतरंगता को बढ़ते देख मैं एक शरीफ आदमी की तरह आगे बढ़ गया। मेरे साथ रसखान का कौवा भी कांव कांव करता चला आ...

Biography of Sardar Udham Singh| सरदार उधम सिंह की जीवनी

Biography of Sardar Udham Singh | सरदार उधम सिंह की जीवनी Sardar Udham Singh 31 जुलाई 1940, सुबह के 4:00 बज रहे थे। लंदन की पैंटनविले जेल में, जेलर ने अपने सहायक को लोहे की बनी मोटी सलाखों वाले दरवाजे को खोलने का आदेश दिया। जेलर ने कहा तुम्हारा समय आ गया है क्या तुम्हें नहीं लगता कि तुम बहुत जल्दी मर रहे हो? आंखों में सुकून, सिर पर पगड़ी और हाथों में वाहेगुरु का जप नाम लिए शेर सिंह उठा। और बड़े आत्मविश्वास के साथ उसने कहा-  "मैंने उसे मारा क्योंकि मुझे उससे नफरत थी। वो इसी लायक था। मैं किसी समाज का नहीं। मैं किसी के साथ नहीं। मरने के लिए बूढ़े होने का इंतजार क्यों करना? मैं देश के लिए अपनी जान दे रहा हूं।" घड़ी आगे बढ़ चली थी। थोड़ी देर बाद आदेश के अनुसार शेर सिंह को फांसी दे दी गई।  शेर सिंह, 2 महीने पहले तक अंग्रेज सरकार को इस नाम से बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था। लेकिन 2 महीने पहले कुछ ऐसा हुआ जिसने अंग्रेजी हुकूमत को यह बता दिया कि हिंदुस्तान अब नया रूप ले रहा है। यह घर में घुसेगा भी और ठोकेगा भी। शेर सिंह की शहादत के बाद ही पता चला कि भगत सिंह केवल एक नाम नहीं था, ब...

Kashi ka Assi Book Review

**किताब समीक्षा: "काशी का अस्सी"** **लेखक**: काशीनाथ सिंह   **शैली**: व्यंग्यात्मक कथा साहित्य   **प्रकाशन वर्ष**: 2004 "काशी का अस्सी" हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण और चर्चित उपन्यास है, जिसे काशीनाथ सिंह ने लिखा है। यह किताब बनारस की जीवनशैली, वहाँ की संस्कृति और आम जनमानस की भाषा और बोलचाल का जीवंत चित्रण करती है। किताब का केंद्र बनारस का प्रसिद्ध अस्सी घाट है, जो सिर्फ एक भौगोलिक स्थल नहीं, बल्कि बनारसी जीवन का प्रतीक है। ### **कहानी का सारांश**: कहानी अस्सी घाट के इर्द-गिर्द घूमती है, जहाँ विभिन्न तबकों के लोग बैठकर बातचीत, बहस और ठहाके लगाते हैं। यह बनारसी समाज की धड़कनों को पकड़ता है। किताब में कई पात्र हैं, जिनमें मुख्यत: पंडित, टीकाकार, शिक्षक, छात्र, नौकरीपेशा लोग और साधारण नागरिक शामिल हैं। हर व्यक्ति का अपना दृष्टिकोण और जीवन के प्रति अपने अनुभव होते हैं, जो किताब को वास्तविक और मजेदार बनाते हैं। **काशी का अस्सी** में अस्सी घाट के पंडों और स्थानीय निवासियों के रोजमर्रा के जीवन को बड़े ही सजीव और व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है। काशी का परंपर...