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कर्म फल तो भोगना ही पड़ेगा

 महाभारत के भयंकर नरसंहार के बाद पुत्र-वियोग में तड़पती गांधारी जब श्रीकृष्ण को शाप देने के लिए आगे बढ़ती हैं, तब श्रीकृष्ण शांत स्वर में कहते हैं— माते!  मैं शोक, मोह और पीड़ा—इन सबसे परे हूँ, न मुझे विजय का गर्व है, न पराजय का विषाद, न मुझे सम्मान बाँधता है, न अपमान। न जीवन, न मृत्यु—किसी में मैं आबद्ध नहीं हूँ। मैं न सत्य में बँधा हूँ, न असत्य में.. काल और महाकाल—दोनों मेरे अधीन हैं; मैं उन्हीं के माध्यम से अपने कार्य सिद्ध कराता हूँ। हे माता, यह युद्ध अवश्यम्भावी था। जो चले गए हैं, उनके लिए विलाप मत करो। जो शेष हैं—उन्हें स्वीकारो। वर्तमान को अपनाओ, क्योंकि अतीत का शोक ही दुख का मूल है.. कृष्ण की वाणी सुनकर गांधारी विलाप करती हुई कह उठती हैं.. कृष्ण…! तुम यह सब कह सकते हो, क्योंकि तुम माँ नहीं हो। तुम क्या जानो एक माँ की ममता क्या होती है? तुम क्या समझो पुत्र-शोक की असहनीय पीड़ा? तुम मोह-त्याग और ज्ञान की बातें करते हो, तो जाओ—अपनी माता देवकी से पूछो कि पुत्र-वियोग क्या होता है! पूछना उनसे— कैसा लगता था जब कंस एक-एक कर उसके कलेजे के टुकड़े छीन लेता था.. जब उसका दूध उतरता थ...

Indo China war when India defeated China

  1965 में सगत सिंह की जिद से नाथू-ला पर चीनियों का कब्जा नहीं हो पाया था, जिसके कारण भारतीय सेना को टैक्टिकल एडवांटेज मिली हुई थी। चीनी चाह कर भी आगे नहीं बढ़ सकते थे। चीनियों ने बंदूक की जगह लाउडस्पीकर का सहारा लिया। वे लाउडस्पीकर पर हिंदी और अंग्रेजी में भारतीय सैनिकों को 1962 की हार की याद दिलाते, उनके कपड़ों, कम सुविधाओं, कम वेतन को लेकर ताने मारते। कहते कि देखो, तुम्हारे अफसर तो मजे में एसी ऑफिसों में बैठे रहते हैं, और तुम्हें यहां मरने के लिए भेज दिया गया है।  सगत सिंह ने लाउडस्पीकर का जवाब लाउडस्पीकर से दिया। उन्होंने मैंडेरियन चाइनीज में रिकॉर्डेड मैसेज प्रसारित करने शुरू कर दिए। वो भी लगातार, लूप में।  बात इतनी ही होती तो कोई दिक्कत नहीं थी। पर चीनी जब-तब दौरे पर निकली छोटी फौजी टुकड़ियों (पेट्रोलिंग पार्टीज) से बदसलूकी करते। एक बार तो छिपकर उन्होंने गोली भी चला दी जिससे 17 असम राइफल्स के दो जवान मारे गए। सीमा निर्धारित तो थी नहीं। चीनियों का कहना था कि ये टुकड़ी चीनी क्षेत्र में घुस आई थी। सगत सिंह ने रोज-रोज की इस चिकचिक से परेशान होकर कोर्प्स कमांडर से बात की...

The Saga of Justice Radha Binod Pal

  एक कहानी,जिसे जापान याद रखता है, लेकिन भारत भूल चुका है। वह दिन था 12 नवम्बर 1948 टोक्यो के बाहरी इलाके में स्थित एक बड़े से घर में इतिहास रचने बदलने की तैयारी  थी। द्वितीय विश्व युद्ध में पराजय के बाद जापान के 55 युद्धबंदियों पर मुकदमा चल रहा था। इनमें तत्कालीन जापानी प्रधानमंत्री तोजो भी शामिल थे।  इनमें से 28 को क्लास A यानी क्राइम्स अगेंस्ट पीस का दोषी माना गया था। दोष सिद्ध होने पर केवल एक ही सज़ा थी मृत्युदंड की। दुनिया भर से आए 11 अंतरराष्ट्रीय जज एक-एक कर अपना फैसला सुना रहे थे कि ये दोषी है…  अचानक अदालत में उस समय एक भारी और स्पष्ट आवाज़ गूँजी not guilty दोषी नहीं हैं.. पूरा कक्ष सन्न रह गया, आखिर ये अकेली असहमति किसकी थी। यह आवाज़ थी भारत के न्यायाधीश राधा बिनोद पाल की।वे उन 11 जजों के पैनल में मौजूद तीन एशियन जजों में से एक थे,जिनको इस टोक्यो ट्रायल में जापान के वार क्राइम में सजा देने के लिए नियुक्त किया गया था।उन्होंने विजेता देशों द्वारा किए जा रहे Victors’ Justice के विरुद्ध अकेले खड़े होकर असहमति दर्ज की। उनकी जीवनी भी बहुत रोचक है। 1886 में बंगाल ...