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Suicide Fruiting

इस साल बाज़ार में जितने जामुन दिखाई दे रहे हैं, उतने मैंने पिछले दो दशकों में कभी नहीं देखे। ​जामुन के अक्षरशः ढेर लग रहे हैं (नीचे गिर रहे हैं)। जिन पेड़ों पर पिछले साल इक्का-दुक्का फल आए थे, वे पेड़ भी इस बार जामुन से पटे पड़े हैं। जहाँ फल आए थे, वहाँ अब उन का अंबार लगना शुरू हो गया है। ​आखिर यह सब क्या चल रहा है? ​हमारी दादी/नानी हमेशा कहती थीं कि, "जिस गर्मियों में जामुन के ऐसे ढेर लगते हैं, उस साल सूखा पड़ता है।" ​बुजुर्गों का यह पारंपरिक ज्ञान वनस्पति विज्ञान (Botany) के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बिल्कुल सही और सटीक है। विज्ञान में इस दिलचस्प और उतनी ही चौंकाने वाली प्रक्रिया को "मास्टिंग" (Masting) या "स्ट्रेस फ्रूटिंग" (Stress Fruiting) कहा जाता है। ​पेड़ों द्वारा खुद को खत्म करके ज्यादा से ज्यादा फल देने के इस आखिरी प्रयास को कभी-कभी "सुसाइड फ्रूटिंग" (Suicide Fruiting) या "बंपर क्रॉप" भी कहा जाता है। ​यह असल में क्या है और इसके पीछे का विज्ञान क्या कहता है, आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं: ​१. 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट' (अस्ति...

The Saga of Justice Radha Binod Pal

 

एक कहानी,जिसे जापान याद रखता है, लेकिन भारत भूल चुका है।


वह दिन था 12 नवम्बर 1948


टोक्यो के बाहरी इलाके में स्थित एक बड़े से घर में इतिहास रचने बदलने की तैयारी  थी। द्वितीय विश्व युद्ध में पराजय के बाद जापान के 55 युद्धबंदियों पर मुकदमा चल रहा था। इनमें तत्कालीन जापानी प्रधानमंत्री तोजो भी शामिल थे।


 इनमें से 28 को क्लास A यानी क्राइम्स अगेंस्ट पीस का दोषी माना गया था। दोष सिद्ध होने पर केवल एक ही सज़ा थी मृत्युदंड की।


दुनिया भर से आए 11 अंतरराष्ट्रीय जज एक-एक कर अपना फैसला सुना रहे थे कि ये दोषी है… 


अचानक अदालत में उस समय एक भारी और स्पष्ट आवाज़ गूँजी not guilty दोषी नहीं हैं..


पूरा कक्ष सन्न रह गया, आखिर ये अकेली असहमति किसकी थी।


यह आवाज़ थी भारत के न्यायाधीश राधा बिनोद पाल की।वे उन 11 जजों के पैनल में मौजूद तीन एशियन जजों में से एक थे,जिनको इस टोक्यो ट्रायल में जापान के वार क्राइम में सजा देने के लिए नियुक्त किया गया था।उन्होंने विजेता देशों द्वारा किए जा रहे Victors’ Justice के विरुद्ध अकेले खड़े होकर असहमति दर्ज की।


उनकी जीवनी भी बहुत रोचक है। 1886 में बंगाल के कुमिल्ला में जन्में , उनका परिवार साधारण था। माँ घर और एक गाय की देखभाल करके जीवन चलाती थीं। बालक राधा बिनोद उस गाय को चराने गाँव के प्राथमिक विद्यालय के पास ले जाया करते थे। कक्षा के भीतर पढ़ाई चलती रहती और बाहर खड़े-खड़े वे सब कुछ सुनते रहते।


एक दिन शहर से आए एक स्कूल इंस्पेक्टर ने बच्चों से सवाल पूछे। कक्षा में सन्नाटा छा गया। तभी खिड़की के बाहर से एक आवाज़ आई ,मैं इन सभी सवालों के जवाब जानता हूँ। सब चौंक गए। लड़के ने एक-एक कर सभी उत्तर सही दे दिए। इंस्पेक्टर ने पूछा‌ कि तुम किस कक्षा में पढ़ते हो?उत्तर मिला मैं पढ़ता नहीं हूँ… यहाँ गाय चराता हूँ।


इंस्पेक्टर अवाक रह गया। हेडमास्टर को बुलाया गया और आदेश दिया गया कि इस बच्चे को तुरंत स्कूल में दाख़िला दिया जाए और छात्रवृत्ति दी जाए। यहीं से राधा बिनोद पाल की औपचारिक शिक्षा शुरू हुई।

उन्होंने ज़िले में सर्वोच्च अंकों के साथ स्कूल पास किया और प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाख़िला पाया। गणित में एमएससी करने के बाद उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय में क़ानून की पढ़ाई की और डॉक्टरेट प्राप्त की। वे कहा करते थे क़ानून और गणित में उतना अंतर नहीं, जितना लोग समझते हैं। मतलब और बेहतरीन वकील थे। राधा विनोद पाल भारत में

कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायाधीश रहे,कलकत्ता विश्वविद्यालय में क़ानून के प्रोफेसर रहे और अंतरराष्ट्रीय क़ानून पर कई महत्वपूर्ण ग्रंथों के लेखक भी रहे।


अब फिर लौटते हैं उसी टोक्यो ट्रायल्स की उस अदालत में।

जस्टिस पाल ने अपने 1,232 पन्नों के ऐतिहासिक असहमतिपत्र में कहा कि विजेता राष्ट्र भी अंतरराष्ट्रीय क़ानून के सिद्धांतों का उल्लंघन कर चुके हैं। जापान के आत्मसमर्पण के संकेतों की अनदेखी की गई और लाखों निर्दोष नागरिकों की जान परमाणु बमों से ली गई। ऐसे में केवल पराजितों को अपराधी ठहराना न्याय नहीं, बल्कि विजेताओं का न्याय है।


उनकी दलीलों का प्रभाव इतना गहरा था कि कई आरोपियों को क्लास-ए से क्लास-बी में लाना पड़ा और अनेक लोगों की निश्चित मृत्यु-सज़ा टल गई। इस निर्णय ने जस्टिस राधा बिनोद पाल और भारत दोनों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।


जापान ने इस उपकार को कभी नहीं भुलाया। 1966 में सम्राट हिरोहितो ने उन्हें जापान के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘कोक्को कुन्शो’ से सम्मानित किया। टोक्यो और क्योटो की दो प्रमुख सड़कों के नाम उनके नाम पर हैं। टोक्यो की सुप्रीम कोर्ट के सामने उनकी प्रतिमा स्थापित है। उनका निर्णय आज भी जापान की क़ानूनी शिक्षा का हिस्सा है।


2007 में तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने दिल्ली में उनके पुत्र से मिलना अपना सौभाग्य माना।

जापान में उनके नाम पर संग्रहालय है, विश्वविद्यालय में शोध केंद्र है और यासुकुनी श्राइन में उनकी प्रतिमा है।

 चीन में उनके कुछ  निर्णय के कारण वे विवादास्पद रहे, लेकिन जापान के लिए वे न्याय की अंतरात्मा हैं।


10 जनवरी 1967 को संसार से विदा हुए डॉ. राधा बिनोद पाल जापान के इतिहास में अमर हैं।


विडंबना यह है कि भारत में उन्हें लगभग कोई नहीं जानता शायद उनके पड़ोसी भी नहीं।

टोक्यो ट्रायल्स पर बनी एक इंडो जापानी फ़िल्म, जिसमें इरफ़ान ख़ान ने अभिनय किया था, वह भी देश में कोई खास ध्यान नहीं पा सकी।


जापान याद रखता है और भारत चुपचाप भूल गया। ये तस्वीर भी 2015 की है जब शशि थरूर ने वहां पहली बार वीजिट की थी।

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