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Not demonic, just introverted! आसुरी नहीं, अंतर्मुखी!

मैं 27 मूल नक्षत्रों, शनिवार और 22 तारीख को जन्मा व्यक्ति हूँ — एक ऐसा जन्म‑संयोग जो न सिर्फ़ मेरी तिथि बताता है, बल्कि मेरे भीतर की गहराई, द्वंद्व और अस्थिरता का भी संकेत देता है। राहु के प्रबल और दूरदर्शी प्रभाव ने मेरे व्यक्तित्व को सीधे, सरल और सतही नहीं रहने दिया; मैं विचारों की उस गहरी खाई में अक्सर भटक जाता हूँ, जहाँ हर बात बस बाहरी रूप नहीं, बल्कि भीतरी अर्थ भी धरती होता है। मैं हर निर्णय के पीछे छिपे संभावित नतीजों, अनजाने खतरों और छिपी हुई उम्मीदों को भी देखने का आदी हूँ।   कभी‑कभी लोग मेरे कार्यों, अभिव्यक्ति और निर्णयों को असामान्य, अत्यंत गहन या यहाँ तक कि “आसुरी” समझने लगते हैं, क्योंकि मेरी सोच उनकी सामान्य धारणाओं की रेखाओं से बाहर निकल जाती है। पर यह आसुरी नहीं, बस एक टूटी हुई, खुरदरी और अत्यंत ईमानदार आत्मा की आवाज़ है, जो दिखावे की दुनिया से थक चुकी है और अपने सच्चे रूप में जीना चाहती है। मैं जब भी बोलता हूँ, तो बस शब्द नहीं बोलता, बल्कि उसके पीछे समा दर्द, संघर्ष, अनुभव और उम्मीदों को भी लाता हूँ।   मेरी पहचान में ग्रहों का भी बड़ा हाथ है। जब ग्रह ही वही है...

The Saga of Justice Radha Binod Pal

 

एक कहानी,जिसे जापान याद रखता है, लेकिन भारत भूल चुका है।


वह दिन था 12 नवम्बर 1948


टोक्यो के बाहरी इलाके में स्थित एक बड़े से घर में इतिहास रचने बदलने की तैयारी  थी। द्वितीय विश्व युद्ध में पराजय के बाद जापान के 55 युद्धबंदियों पर मुकदमा चल रहा था। इनमें तत्कालीन जापानी प्रधानमंत्री तोजो भी शामिल थे।


 इनमें से 28 को क्लास A यानी क्राइम्स अगेंस्ट पीस का दोषी माना गया था। दोष सिद्ध होने पर केवल एक ही सज़ा थी मृत्युदंड की।


दुनिया भर से आए 11 अंतरराष्ट्रीय जज एक-एक कर अपना फैसला सुना रहे थे कि ये दोषी है… 


अचानक अदालत में उस समय एक भारी और स्पष्ट आवाज़ गूँजी not guilty दोषी नहीं हैं..


पूरा कक्ष सन्न रह गया, आखिर ये अकेली असहमति किसकी थी।


यह आवाज़ थी भारत के न्यायाधीश राधा बिनोद पाल की।वे उन 11 जजों के पैनल में मौजूद तीन एशियन जजों में से एक थे,जिनको इस टोक्यो ट्रायल में जापान के वार क्राइम में सजा देने के लिए नियुक्त किया गया था।उन्होंने विजेता देशों द्वारा किए जा रहे Victors’ Justice के विरुद्ध अकेले खड़े होकर असहमति दर्ज की।


उनकी जीवनी भी बहुत रोचक है। 1886 में बंगाल के कुमिल्ला में जन्में , उनका परिवार साधारण था। माँ घर और एक गाय की देखभाल करके जीवन चलाती थीं। बालक राधा बिनोद उस गाय को चराने गाँव के प्राथमिक विद्यालय के पास ले जाया करते थे। कक्षा के भीतर पढ़ाई चलती रहती और बाहर खड़े-खड़े वे सब कुछ सुनते रहते।


एक दिन शहर से आए एक स्कूल इंस्पेक्टर ने बच्चों से सवाल पूछे। कक्षा में सन्नाटा छा गया। तभी खिड़की के बाहर से एक आवाज़ आई ,मैं इन सभी सवालों के जवाब जानता हूँ। सब चौंक गए। लड़के ने एक-एक कर सभी उत्तर सही दे दिए। इंस्पेक्टर ने पूछा‌ कि तुम किस कक्षा में पढ़ते हो?उत्तर मिला मैं पढ़ता नहीं हूँ… यहाँ गाय चराता हूँ।


इंस्पेक्टर अवाक रह गया। हेडमास्टर को बुलाया गया और आदेश दिया गया कि इस बच्चे को तुरंत स्कूल में दाख़िला दिया जाए और छात्रवृत्ति दी जाए। यहीं से राधा बिनोद पाल की औपचारिक शिक्षा शुरू हुई।

उन्होंने ज़िले में सर्वोच्च अंकों के साथ स्कूल पास किया और प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाख़िला पाया। गणित में एमएससी करने के बाद उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय में क़ानून की पढ़ाई की और डॉक्टरेट प्राप्त की। वे कहा करते थे क़ानून और गणित में उतना अंतर नहीं, जितना लोग समझते हैं। मतलब और बेहतरीन वकील थे। राधा विनोद पाल भारत में

कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायाधीश रहे,कलकत्ता विश्वविद्यालय में क़ानून के प्रोफेसर रहे और अंतरराष्ट्रीय क़ानून पर कई महत्वपूर्ण ग्रंथों के लेखक भी रहे।


अब फिर लौटते हैं उसी टोक्यो ट्रायल्स की उस अदालत में।

जस्टिस पाल ने अपने 1,232 पन्नों के ऐतिहासिक असहमतिपत्र में कहा कि विजेता राष्ट्र भी अंतरराष्ट्रीय क़ानून के सिद्धांतों का उल्लंघन कर चुके हैं। जापान के आत्मसमर्पण के संकेतों की अनदेखी की गई और लाखों निर्दोष नागरिकों की जान परमाणु बमों से ली गई। ऐसे में केवल पराजितों को अपराधी ठहराना न्याय नहीं, बल्कि विजेताओं का न्याय है।


उनकी दलीलों का प्रभाव इतना गहरा था कि कई आरोपियों को क्लास-ए से क्लास-बी में लाना पड़ा और अनेक लोगों की निश्चित मृत्यु-सज़ा टल गई। इस निर्णय ने जस्टिस राधा बिनोद पाल और भारत दोनों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।


जापान ने इस उपकार को कभी नहीं भुलाया। 1966 में सम्राट हिरोहितो ने उन्हें जापान के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘कोक्को कुन्शो’ से सम्मानित किया। टोक्यो और क्योटो की दो प्रमुख सड़कों के नाम उनके नाम पर हैं। टोक्यो की सुप्रीम कोर्ट के सामने उनकी प्रतिमा स्थापित है। उनका निर्णय आज भी जापान की क़ानूनी शिक्षा का हिस्सा है।


2007 में तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने दिल्ली में उनके पुत्र से मिलना अपना सौभाग्य माना।

जापान में उनके नाम पर संग्रहालय है, विश्वविद्यालय में शोध केंद्र है और यासुकुनी श्राइन में उनकी प्रतिमा है।

 चीन में उनके कुछ  निर्णय के कारण वे विवादास्पद रहे, लेकिन जापान के लिए वे न्याय की अंतरात्मा हैं।


10 जनवरी 1967 को संसार से विदा हुए डॉ. राधा बिनोद पाल जापान के इतिहास में अमर हैं।


विडंबना यह है कि भारत में उन्हें लगभग कोई नहीं जानता शायद उनके पड़ोसी भी नहीं।

टोक्यो ट्रायल्स पर बनी एक इंडो जापानी फ़िल्म, जिसमें इरफ़ान ख़ान ने अभिनय किया था, वह भी देश में कोई खास ध्यान नहीं पा सकी।


जापान याद रखता है और भारत चुपचाप भूल गया। ये तस्वीर भी 2015 की है जब शशि थरूर ने वहां पहली बार वीजिट की थी।

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Ten Dikpalas of Hindu Religion

 The 10 Dikpàlas (deities presiding over the ten directions) in Sanatan Dharm 1. Kubera - Guardian of the North Direction 2.Yamraj - Guardian of the South Direction 3. Indra - Guardian of the East Direction 4. Varuna - Guardian of the West Direction 5.Agni -Guardian of the South-East Direction 6.Nirrti - Guardian of the South-West Direction 7. Vàyu - Guardian of the North-West Direction 8. Īśāna - Guardian of the North East Direction 9. Bhagwan Brahmà - Guardian of the Zenith (Highest point in the celestial sphere) 10. Sesa - Guardian of the Nadir (The point in the celestial sphere which is directly opposite the zenith)

सूफी संतों और शायरों की पोषित धरती बदायूं

एक समय था जब ऐतिहासिक शहर बदायूं (जिसे बदायूं भी कहा जाता है और बदायूं भी कहा जाता है), रोहिलखंड क्षेत्र के केंद्र में, तीन चीजों के लिए जाना जाता था: पीर, कवि और पेरा। 13वीं सदी के सूफी संत, निजामुद्दीन औलिया का जन्म यहीं हुआ था और दो प्रमुख दरगाहों को छोटे सरकार और बड़ी सरकार के नाम से जाना जाता है, जिसमें दूर-दूर से हजारों लोग आते थे। यहां बनाया गया पेरा - विशेष रूप से मम्मन खान हलवाई के मीठे दूध से, उसके सुनहरे-भूरे रंग तक उबाला गया, कुछ दानेदार अवशेषों को डिस्क में संपीड़ित किया जा सकता था और पाउडर चीनी के साथ छिड़का जा सकता था - एक 'पेरा बेल्ट' में अपने प्रशंसकों का उचित हिस्सा खींचा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का घेरा। लेकिन यह सूफियों, कवियों और पत्रों के पुरुषों और महिलाओं ने वास्तव में, इस अन्यथा गैर-वर्णनात्मक, धूल भरे, छोटे शहर को मानचित्र पर रखा था। यह एक बार कहा गया था, केवल आंशिक रूप से मजाक में, कि यदि आप इस शहर में कहीं भी एक व्यस्त चौराहे पर एक कंकड़ फेंकते हैं, तो यह निश्चित रूप से एक कवि को मारा जाएगा - या दो! सोत नदी के किनारे बसे इस छोटे से शहर के बारे में कुछ थ...

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