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Madness for Iphone

​ *आखिर जा कहां रहा है हमारा समाज..* महाराष्ट्र के निम्न मध्यम वर्गीय मां-बाप ने अपनी इकलौती संतान को जैसे-तैसे पाल पोसकर 18 साल का किया। अब उस बेटे को आईफोन की सनक जग गई, पहाड़ के किनारे खड़े होकर 3 घंटे का फुल वोल्टेज ड्रामा चला। संभवतः सभी को लगा होगा कि ड्रामा कर रहा है, इसी बीच बाप सामने आया, शायद उसे अपने भावनात्मक और शारीरिक बल पर भरोसा रहा होगा, कि या तो मैं अपने बेटे को प्यार/डांट से मना/धमका लूंगा, नहीं तो ताकत का प्रयोग करके उसे किनारे से खींच लाऊंगा। बाप का दांव गलत साबित हुआ, बेटा उसकी उम्मीद से ज्यादा भावनात्मक रूप से ढीट और बलशाली था, खींचा-तानी में बेटे का बैलेंस बिगड़ा, गिरते बेटे ने वही किया जो वो पिछले 18 साल से करता आ रहा था, (बाप का सपोर्ट लेना), और उसने सपोर्ट लेने के चक्कर में अपने साथ बाप को भी खाई में खींच लिया। मां जो पहले ही बेटे को मनाने के लिए अपना मंगलसूत्र देने की पेशकश कर रही थी, इस दृश्य को देखकर कुछ समझ नहीं सकी, और बदहवासी में 1-2 सेकंड बाद उसने भी खाई में जंप लगा दी। पूरा परिवार एक आईफोन की सनक में कॉल के ग्रास में चले गए।। गलती किसकी है: 1. आईफोन के...

Indo China war when India defeated China

 

1965 में सगत सिंह की जिद से नाथू-ला पर चीनियों का कब्जा नहीं हो पाया था, जिसके कारण भारतीय सेना को टैक्टिकल एडवांटेज मिली हुई थी। चीनी चाह कर भी आगे नहीं बढ़ सकते थे। चीनियों ने बंदूक की जगह लाउडस्पीकर का सहारा लिया। वे लाउडस्पीकर पर हिंदी और अंग्रेजी में भारतीय सैनिकों को 1962 की हार की याद दिलाते, उनके कपड़ों, कम सुविधाओं, कम वेतन को लेकर ताने मारते। कहते कि देखो, तुम्हारे अफसर तो मजे में एसी ऑफिसों में बैठे रहते हैं, और तुम्हें यहां मरने के लिए भेज दिया गया है। 


सगत सिंह ने लाउडस्पीकर का जवाब लाउडस्पीकर से दिया। उन्होंने मैंडेरियन चाइनीज में रिकॉर्डेड मैसेज प्रसारित करने शुरू कर दिए। वो भी लगातार, लूप में। 


बात इतनी ही होती तो कोई दिक्कत नहीं थी। पर चीनी जब-तब दौरे पर निकली छोटी फौजी टुकड़ियों (पेट्रोलिंग पार्टीज) से बदसलूकी करते। एक बार तो छिपकर उन्होंने गोली भी चला दी जिससे 17 असम राइफल्स के दो जवान मारे गए। सीमा निर्धारित तो थी नहीं। चीनियों का कहना था कि ये टुकड़ी चीनी क्षेत्र में घुस आई थी।


सगत सिंह ने रोज-रोज की इस चिकचिक से परेशान होकर कोर्प्स कमांडर से बात की। लेफ्टिनेंट जनरल जे. एस. अरोड़ा ने उन्हें सलाह दी कि तुम बॉर्डर पर पैदल-पैदल चलो। अगर चीनियों ने कोई बवाल नहीं किया, तो इसका मतलब होगा कि वो उस जमीन को भारतीय मान रहे हैं। अगर सब ठीक रहा, तो जहां-जहां तुम चले होगे, वहां तार-बाड़, फेंस लगवा दो। सीमा का स्पष्ट निर्धारण हो जाएगा। 


सगत सिंह ने बिलकुल यही किया। जब वे बॉर्डर पर चल रहे थे, दूसरी तरफ उनके साथ-साथ चीनी अफसर एक कैमरामैन के साथ चल रहा था। हालांकि वह कुछ बोला नहीं। 


सगत सिंह ने फेंस लगाने का ऑर्डर दे दिया। 20 अगस्त 1967 से काम शुरू हो गया। चीनियों ने भारतीयों से काम रोकने को कहा, पर कोई रुका नहीं। चीनी कुढ़ते रहे, भारतीय लगे रहे। 6 सितंबर को 2 ग्रेनेडियर की पेट्रोलिंग पार्टी को चीनियों ने घेर लिया, और धमकी दी। अगले दिन उन्होंने तार-बाड़ को तोड़ने की कोशिश भी की। 10 सितंबर तक काम लगभग पूरा हो चुका था। निर्णय लिया गया कि चीनी उतावले हो चले हैं। उनके द्वारा कोई एक्शन लेने से पहले काम पूरा कर लिया जाए। अगले दिन जितने भी उपलब्ध सैनिक थे, सभी को काम पर लगा दिया गया। उनकी सुरक्षा के लिए 18 राजपूत को बुलाया गया।


जब सुबह काम शुरू हुआ, चीनियों ने बदसलूकी शुरू कर दी। बात बढ़ते-बढ़ते बहुत बढ़ गई। 2 ग्रेनेडियर के कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल राय सिंह यादव मुंहजबानी लड़ाई में चीनियों की ऐसी-तैसी कर रहे थे। हालांकि सगत सिंह ने उन्हें वापस बंकर में आने को कहा, पर वर्षों से चीनियों की दादागिरी सहते आ रहे भारतीय अफसरों और सैनिकों का गुस्सा फूट पड़ा था। 


अचानक ही चीनियों ने गोलियां चलानी शुरू कर दी। फेन्स पर काम कर रहे कई सैनिक मारे गए। मरने वालों में राय सिंह यादव भी थे (बुरी तरह घायल, सैनिकों ने समझा कि वे मारे गए)। अपने अफसर को गिरता देख ग्रेनेडियर्स पागल हो उठे। वे अपने खड्डों (ट्रेंच) से बाहर निकल आये और कैप्टन पी. एस. डागर के नेतृत्व में चीनियों पर हमला बोल दिया।


1962 की जंग में हुई शर्मनाक हार और वर्षों से चीनी प्रोपेगैंडा, चीनियों के महाशक्तिशाली होने के विश्वास के कारण, और अपने अफसर को बस यूहीं मरते देख कुछ ग्रेनेडियर्स अपनी पोस्ट छोड़ पीछे हटने लगे थे। यह देख खुद सगत सिंह स्टेनगन लेकर बाहर निकल आये और सैनिकों को उनका फर्ज, उनके अफसर का बलिदान याद दिला कर, उन्हें वापस अपने ट्रेंचों में भेजा। 


18 राजपूत के कुछ सैनिक और इंजीनियर भी मारे गए थे, मारे जा रहे थे। 18 राजपूत के कमांडर मेजर हरभजन सिंह को समझ आ गया कि जब तक चीनी बंकर को नहीं उड़ाया जाता, भारतीय सैनिक मरते रहेंगे। उन्होंने अपने सैनिकों को देख हुक्म दिया कि चीनी बंकर में घुसकर चीनियों को खत्म कर दिया जाए, और खुद बाहर निकलकर चीनियों की ओर बढ़ने लगे। 


इस कोशिश में कई सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए, जिनमें मेजर हरभजन और कैप्टन पृथ्वी सिंह डागर भी शामिल थे। लेकिन उनके जोश ने भारतीय सैनिकों को चीनियों के बंकरों तक पहुंचा दिया था। बंकरों में घुसकर बन्दूक की संगीनों से चीनियों की अतड़ियाँ निकाल ली गई। 


मेजर और कैप्टन जैसे अफसरों के वीरगति को प्राप्त हो जाने के कारण छिटपुट लड़ाई एक पूर्ण युद्ध में बदल गई थी। यह युद्ध तीन दिन चला। सगत सिंह ने क्यांगनोसा-ला से मध्यम दूरी तक मार करने वाली तोपें मंगवा ली। दो साल पहले जिस पोस्ट को सगत सिंह ने खाली करने से मना कर दिया था, वहाँ ये तोपें लगाई गई और चीनियों को चुन-चुन कर मारा गया। अगर यह पोस्ट भारतीय कब्जे में न होती तो शायद 1962 वाला हाल हुआ होता। 


कुल 65 भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। चीनियों का आधिकारिक आंकड़ा 300 था, जो सम्भवतः वास्तविक संख्या से बहुत कम था। 


फौजियों की मौत ने देश को खून के आंसू रुलाए, पर 65 वीरों के बलिदान और 145 घायलों ने देश को वह दे दिया था जो उससे कुछ सालों पहले छीनकर कुचल दिया गया था। 


1962 में जिस चीनी ड्रैगन ने अपने मुख की ज्वाला से हमें दग्ध किया था, 1967 में उस ड्रैगन को पूँछ से पकड़कर घुमाकर पटक दिया गया था। 


1967 के बाद आज तक चीनियों की हिम्मत नहीं हुई कि वे एक गोली भी चला सकें। 


#सगत_सिंह 3


(फोटो में नाथू-ला की लड़ाई के बाद सगत सिंह जी पूर्वी कमान के आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल मानेकशॉ के बाएं।)

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