सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Suicide Fruiting

इस साल बाज़ार में जितने जामुन दिखाई दे रहे हैं, उतने मैंने पिछले दो दशकों में कभी नहीं देखे। ​जामुन के अक्षरशः ढेर लग रहे हैं (नीचे गिर रहे हैं)। जिन पेड़ों पर पिछले साल इक्का-दुक्का फल आए थे, वे पेड़ भी इस बार जामुन से पटे पड़े हैं। जहाँ फल आए थे, वहाँ अब उन का अंबार लगना शुरू हो गया है। ​आखिर यह सब क्या चल रहा है? ​हमारी दादी/नानी हमेशा कहती थीं कि, "जिस गर्मियों में जामुन के ऐसे ढेर लगते हैं, उस साल सूखा पड़ता है।" ​बुजुर्गों का यह पारंपरिक ज्ञान वनस्पति विज्ञान (Botany) के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बिल्कुल सही और सटीक है। विज्ञान में इस दिलचस्प और उतनी ही चौंकाने वाली प्रक्रिया को "मास्टिंग" (Masting) या "स्ट्रेस फ्रूटिंग" (Stress Fruiting) कहा जाता है। ​पेड़ों द्वारा खुद को खत्म करके ज्यादा से ज्यादा फल देने के इस आखिरी प्रयास को कभी-कभी "सुसाइड फ्रूटिंग" (Suicide Fruiting) या "बंपर क्रॉप" भी कहा जाता है। ​यह असल में क्या है और इसके पीछे का विज्ञान क्या कहता है, आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं: ​१. 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट' (अस्ति...

Indo China war when India defeated China

 

1965 में सगत सिंह की जिद से नाथू-ला पर चीनियों का कब्जा नहीं हो पाया था, जिसके कारण भारतीय सेना को टैक्टिकल एडवांटेज मिली हुई थी। चीनी चाह कर भी आगे नहीं बढ़ सकते थे। चीनियों ने बंदूक की जगह लाउडस्पीकर का सहारा लिया। वे लाउडस्पीकर पर हिंदी और अंग्रेजी में भारतीय सैनिकों को 1962 की हार की याद दिलाते, उनके कपड़ों, कम सुविधाओं, कम वेतन को लेकर ताने मारते। कहते कि देखो, तुम्हारे अफसर तो मजे में एसी ऑफिसों में बैठे रहते हैं, और तुम्हें यहां मरने के लिए भेज दिया गया है। 


सगत सिंह ने लाउडस्पीकर का जवाब लाउडस्पीकर से दिया। उन्होंने मैंडेरियन चाइनीज में रिकॉर्डेड मैसेज प्रसारित करने शुरू कर दिए। वो भी लगातार, लूप में। 


बात इतनी ही होती तो कोई दिक्कत नहीं थी। पर चीनी जब-तब दौरे पर निकली छोटी फौजी टुकड़ियों (पेट्रोलिंग पार्टीज) से बदसलूकी करते। एक बार तो छिपकर उन्होंने गोली भी चला दी जिससे 17 असम राइफल्स के दो जवान मारे गए। सीमा निर्धारित तो थी नहीं। चीनियों का कहना था कि ये टुकड़ी चीनी क्षेत्र में घुस आई थी।


सगत सिंह ने रोज-रोज की इस चिकचिक से परेशान होकर कोर्प्स कमांडर से बात की। लेफ्टिनेंट जनरल जे. एस. अरोड़ा ने उन्हें सलाह दी कि तुम बॉर्डर पर पैदल-पैदल चलो। अगर चीनियों ने कोई बवाल नहीं किया, तो इसका मतलब होगा कि वो उस जमीन को भारतीय मान रहे हैं। अगर सब ठीक रहा, तो जहां-जहां तुम चले होगे, वहां तार-बाड़, फेंस लगवा दो। सीमा का स्पष्ट निर्धारण हो जाएगा। 


सगत सिंह ने बिलकुल यही किया। जब वे बॉर्डर पर चल रहे थे, दूसरी तरफ उनके साथ-साथ चीनी अफसर एक कैमरामैन के साथ चल रहा था। हालांकि वह कुछ बोला नहीं। 


सगत सिंह ने फेंस लगाने का ऑर्डर दे दिया। 20 अगस्त 1967 से काम शुरू हो गया। चीनियों ने भारतीयों से काम रोकने को कहा, पर कोई रुका नहीं। चीनी कुढ़ते रहे, भारतीय लगे रहे। 6 सितंबर को 2 ग्रेनेडियर की पेट्रोलिंग पार्टी को चीनियों ने घेर लिया, और धमकी दी। अगले दिन उन्होंने तार-बाड़ को तोड़ने की कोशिश भी की। 10 सितंबर तक काम लगभग पूरा हो चुका था। निर्णय लिया गया कि चीनी उतावले हो चले हैं। उनके द्वारा कोई एक्शन लेने से पहले काम पूरा कर लिया जाए। अगले दिन जितने भी उपलब्ध सैनिक थे, सभी को काम पर लगा दिया गया। उनकी सुरक्षा के लिए 18 राजपूत को बुलाया गया।


जब सुबह काम शुरू हुआ, चीनियों ने बदसलूकी शुरू कर दी। बात बढ़ते-बढ़ते बहुत बढ़ गई। 2 ग्रेनेडियर के कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल राय सिंह यादव मुंहजबानी लड़ाई में चीनियों की ऐसी-तैसी कर रहे थे। हालांकि सगत सिंह ने उन्हें वापस बंकर में आने को कहा, पर वर्षों से चीनियों की दादागिरी सहते आ रहे भारतीय अफसरों और सैनिकों का गुस्सा फूट पड़ा था। 


अचानक ही चीनियों ने गोलियां चलानी शुरू कर दी। फेन्स पर काम कर रहे कई सैनिक मारे गए। मरने वालों में राय सिंह यादव भी थे (बुरी तरह घायल, सैनिकों ने समझा कि वे मारे गए)। अपने अफसर को गिरता देख ग्रेनेडियर्स पागल हो उठे। वे अपने खड्डों (ट्रेंच) से बाहर निकल आये और कैप्टन पी. एस. डागर के नेतृत्व में चीनियों पर हमला बोल दिया।


1962 की जंग में हुई शर्मनाक हार और वर्षों से चीनी प्रोपेगैंडा, चीनियों के महाशक्तिशाली होने के विश्वास के कारण, और अपने अफसर को बस यूहीं मरते देख कुछ ग्रेनेडियर्स अपनी पोस्ट छोड़ पीछे हटने लगे थे। यह देख खुद सगत सिंह स्टेनगन लेकर बाहर निकल आये और सैनिकों को उनका फर्ज, उनके अफसर का बलिदान याद दिला कर, उन्हें वापस अपने ट्रेंचों में भेजा। 


18 राजपूत के कुछ सैनिक और इंजीनियर भी मारे गए थे, मारे जा रहे थे। 18 राजपूत के कमांडर मेजर हरभजन सिंह को समझ आ गया कि जब तक चीनी बंकर को नहीं उड़ाया जाता, भारतीय सैनिक मरते रहेंगे। उन्होंने अपने सैनिकों को देख हुक्म दिया कि चीनी बंकर में घुसकर चीनियों को खत्म कर दिया जाए, और खुद बाहर निकलकर चीनियों की ओर बढ़ने लगे। 


इस कोशिश में कई सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए, जिनमें मेजर हरभजन और कैप्टन पृथ्वी सिंह डागर भी शामिल थे। लेकिन उनके जोश ने भारतीय सैनिकों को चीनियों के बंकरों तक पहुंचा दिया था। बंकरों में घुसकर बन्दूक की संगीनों से चीनियों की अतड़ियाँ निकाल ली गई। 


मेजर और कैप्टन जैसे अफसरों के वीरगति को प्राप्त हो जाने के कारण छिटपुट लड़ाई एक पूर्ण युद्ध में बदल गई थी। यह युद्ध तीन दिन चला। सगत सिंह ने क्यांगनोसा-ला से मध्यम दूरी तक मार करने वाली तोपें मंगवा ली। दो साल पहले जिस पोस्ट को सगत सिंह ने खाली करने से मना कर दिया था, वहाँ ये तोपें लगाई गई और चीनियों को चुन-चुन कर मारा गया। अगर यह पोस्ट भारतीय कब्जे में न होती तो शायद 1962 वाला हाल हुआ होता। 


कुल 65 भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। चीनियों का आधिकारिक आंकड़ा 300 था, जो सम्भवतः वास्तविक संख्या से बहुत कम था। 


फौजियों की मौत ने देश को खून के आंसू रुलाए, पर 65 वीरों के बलिदान और 145 घायलों ने देश को वह दे दिया था जो उससे कुछ सालों पहले छीनकर कुचल दिया गया था। 


1962 में जिस चीनी ड्रैगन ने अपने मुख की ज्वाला से हमें दग्ध किया था, 1967 में उस ड्रैगन को पूँछ से पकड़कर घुमाकर पटक दिया गया था। 


1967 के बाद आज तक चीनियों की हिम्मत नहीं हुई कि वे एक गोली भी चला सकें। 


#सगत_सिंह 3


(फोटो में नाथू-ला की लड़ाई के बाद सगत सिंह जी पूर्वी कमान के आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल मानेकशॉ के बाएं।)

टिप्पणियाँ

Best From the Author

Not demonic, just introverted! आसुरी नहीं, अंतर्मुखी!

मैं 27 मूल नक्षत्रों, शनिवार और 22 तारीख को जन्मा व्यक्ति हूँ — एक ऐसा जन्म‑संयोग जो न सिर्फ़ मेरी तिथि बताता है, बल्कि मेरे भीतर की गहराई, द्वंद्व और अस्थिरता का भी संकेत देता है। राहु के प्रबल और दूरदर्शी प्रभाव ने मेरे व्यक्तित्व को सीधे, सरल और सतही नहीं रहने दिया; मैं विचारों की उस गहरी खाई में अक्सर भटक जाता हूँ, जहाँ हर बात बस बाहरी रूप नहीं, बल्कि भीतरी अर्थ भी धरती होता है। मैं हर निर्णय के पीछे छिपे संभावित नतीजों, अनजाने खतरों और छिपी हुई उम्मीदों को भी देखने का आदी हूँ।   कभी‑कभी लोग मेरे कार्यों, अभिव्यक्ति और निर्णयों को असामान्य, अत्यंत गहन या यहाँ तक कि “आसुरी” समझने लगते हैं, क्योंकि मेरी सोच उनकी सामान्य धारणाओं की रेखाओं से बाहर निकल जाती है। पर यह आसुरी नहीं, बस एक टूटी हुई, खुरदरी और अत्यंत ईमानदार आत्मा की आवाज़ है, जो दिखावे की दुनिया से थक चुकी है और अपने सच्चे रूप में जीना चाहती है। मैं जब भी बोलता हूँ, तो बस शब्द नहीं बोलता, बल्कि उसके पीछे समा दर्द, संघर्ष, अनुभव और उम्मीदों को भी लाता हूँ।   मेरी पहचान में ग्रहों का भी बड़ा हाथ है। जब ग्रह ही वही है...

अफगानी तालिबान एवं ISIS के झंडों पर आखिर लिखा क्या होता है? What is written on New flag of Afghanistan & ISIS flag? A blogpost by Abiiinabu

अफगानी तालिबान एवं ISIS के झंडों पर आखिर लिखा क्या होता है? What is written on New flag of Afghanistan & ISIS flag? ISIS ke jhande pr kya likha hota hai? जिहाद के काले झंडे ISIS , ALQEIDA और कई अन्य इस्लामिक चरमपंथी संगठनों द्वारा समय-समय पर प्रदर्शित किए जाते हैं, और युद्ध के समय पर प्रदर्शित किए जाते रहे हैं। लेकिन यही झंडे बाहर की दुनिया में एक अजीब खौफ और उत्सुकता भी पैदा करते रहे हैं. इस्लामिक ध्वज, उसका रंग, उसकी भाषा, उसके निशान और यहां तक कि झंडों के ऊपर लिखी धार्मिक सूक्तियां भी बाहरी दुनिया को अपनी और आकर्षित करने में सफल रही हैं। Isis Flag       लेकिन यह चरमपंथी संगठन जिस ध्वज का प्रदर्शन करके चरमपंथ की नई परिभाषा एवं कट्टरवाद को प्रदर्शित करते रहे हैं उसका इतिहास उसके वर्तमान परिपेक्ष से बिल्कुल जुदा है। इतिहास को जानने वाले यहां तक कहते हैं कि इस झंडे का उपयोग केवल व्यक्तिगत चरमपंथ को बढ़ावा देने, एवं स्वार्थ सिद्धि के लिए ही अधिकतर हुआ है। आतंकवादी संगठन इसे अपने तरीके से तोड़ मरोड़ कर पेश करते हैं और केवल अपने स्वार्थ के लिए इसका उपयोग करते हैं यह...

Suicide Fruiting

इस साल बाज़ार में जितने जामुन दिखाई दे रहे हैं, उतने मैंने पिछले दो दशकों में कभी नहीं देखे। ​जामुन के अक्षरशः ढेर लग रहे हैं (नीचे गिर रहे हैं)। जिन पेड़ों पर पिछले साल इक्का-दुक्का फल आए थे, वे पेड़ भी इस बार जामुन से पटे पड़े हैं। जहाँ फल आए थे, वहाँ अब उन का अंबार लगना शुरू हो गया है। ​आखिर यह सब क्या चल रहा है? ​हमारी दादी/नानी हमेशा कहती थीं कि, "जिस गर्मियों में जामुन के ऐसे ढेर लगते हैं, उस साल सूखा पड़ता है।" ​बुजुर्गों का यह पारंपरिक ज्ञान वनस्पति विज्ञान (Botany) के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बिल्कुल सही और सटीक है। विज्ञान में इस दिलचस्प और उतनी ही चौंकाने वाली प्रक्रिया को "मास्टिंग" (Masting) या "स्ट्रेस फ्रूटिंग" (Stress Fruiting) कहा जाता है। ​पेड़ों द्वारा खुद को खत्म करके ज्यादा से ज्यादा फल देने के इस आखिरी प्रयास को कभी-कभी "सुसाइड फ्रूटिंग" (Suicide Fruiting) या "बंपर क्रॉप" भी कहा जाता है। ​यह असल में क्या है और इसके पीछे का विज्ञान क्या कहता है, आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं: ​१. 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट' (अस्ति...

Tyagpatra by Jainendra Book Review

 त्यागपत्र: एक अंतर्मुखी पीड़ा की कहानी जैनेंद्र कुमार का उपन्यास 'त्यागपत्र' भारतीय साहित्य में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह उपन्यास मृणाल की कहानी है, जो अपने पति प्रमोद के द्वारा त्याग दी जाती है। कहानी मृणाल के अंतर्मुखी पीड़ा, सामाजिक बंधनों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संघर्ष को दर्शाती है। जैनेंद्र कुमार की लेखन शैली सरल और गहरी है। उन्होंने मृणाल के मन की उलझनों और भावनात्मक जटिलताओं को बहुत ही संवेदनशील तरीके से चित्रित किया है। कहानी में सामाजिक रूढ़ियों और व्यक्तिगत इच्छाओं के बीच का द्वंद्व स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। मृणाल का त्यागपत्र केवल एक शारीरिक त्यागपत्र नहीं है, बल्कि यह उसके आंतरिक संघर्ष और मुक्ति की खोज का प्रतीक है। उपन्यास में प्रमोद का चरित्र भी जटिल है। वह एक ऐसे व्यक्ति के रूप में दिखाया गया है जो सामाजिक दबावों और अपनी कमजोरियों के कारण मृणाल को त्याग देता है। यह उपन्यास उस समय के समाज में महिलाओं की स्थिति और उनके संघर्षों पर प्रकाश डालता है। 'त्यागपत्र' एक ऐसा उपन्यास है जो पाठक को सोचने पर मजबूर करता है। यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सामाजि...

सूफी संतों और शायरों की पोषित धरती बदायूं

एक समय था जब ऐतिहासिक शहर बदायूं (जिसे बदायूं भी कहा जाता है और बदायूं भी कहा जाता है), रोहिलखंड क्षेत्र के केंद्र में, तीन चीजों के लिए जाना जाता था: पीर, कवि और पेरा। 13वीं सदी के सूफी संत, निजामुद्दीन औलिया का जन्म यहीं हुआ था और दो प्रमुख दरगाहों को छोटे सरकार और बड़ी सरकार के नाम से जाना जाता है, जिसमें दूर-दूर से हजारों लोग आते थे। यहां बनाया गया पेरा - विशेष रूप से मम्मन खान हलवाई के मीठे दूध से, उसके सुनहरे-भूरे रंग तक उबाला गया, कुछ दानेदार अवशेषों को डिस्क में संपीड़ित किया जा सकता था और पाउडर चीनी के साथ छिड़का जा सकता था - एक 'पेरा बेल्ट' में अपने प्रशंसकों का उचित हिस्सा खींचा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का घेरा। लेकिन यह सूफियों, कवियों और पत्रों के पुरुषों और महिलाओं ने वास्तव में, इस अन्यथा गैर-वर्णनात्मक, धूल भरे, छोटे शहर को मानचित्र पर रखा था। यह एक बार कहा गया था, केवल आंशिक रूप से मजाक में, कि यदि आप इस शहर में कहीं भी एक व्यस्त चौराहे पर एक कंकड़ फेंकते हैं, तो यह निश्चित रूप से एक कवि को मारा जाएगा - या दो! सोत नदी के किनारे बसे इस छोटे से शहर के बारे में कुछ थ...