सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

प्रेमचंद के फटे जूते

  प्रेमचंद का एक चित्र मेरे सामने है, पत्नी के साथ फ़ोटो खिंचा रहे हैं. सिर पर किसी मोटे कपड़े की टोपी, कुरता और धोती पहने हैं. कनपटी चिपकी है, गालों की हड्डियां उभर आई हैं, पर घनी मूंछें चेहरे को भरा-भरा बतलाती हैं. पांवों में केनवस के जूते हैं, जिनके बंद बेतरतीब बंधे हैं. लापरवाही से उपयोग करने पर बंद के सिरों पर की लोहे की पतरी निकल जाती है और छेदों में बंद डालने में परेशानी होती है. तब बंद कैसे भी कस लिए जाते हैं. दाहिने पांव का जूता ठीक है, मगर बाएं जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अंगुली बाहर निकल आई है. मेरी दृष्टि इस जूते पर अटक गई है. सोचता हूं-फ़ोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी-इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है. यह जैसा है, वैसा ही फ़ोटो में खिंच जाता है. मैं चेहरे की तरफ़ देखता हूं. क्या तुम्हें मालूम है, मेरे साहित्यिक पुरखे कि तुम्हारा जूता फट गया है और अंगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हें इसका ज़रा भी अहसास नहीं है? ज़रा लज्जा, संकोच या झेंप नहीं है? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि धोती को थोड़ा न...

Indo China war when India defeated China

 

1965 में सगत सिंह की जिद से नाथू-ला पर चीनियों का कब्जा नहीं हो पाया था, जिसके कारण भारतीय सेना को टैक्टिकल एडवांटेज मिली हुई थी। चीनी चाह कर भी आगे नहीं बढ़ सकते थे। चीनियों ने बंदूक की जगह लाउडस्पीकर का सहारा लिया। वे लाउडस्पीकर पर हिंदी और अंग्रेजी में भारतीय सैनिकों को 1962 की हार की याद दिलाते, उनके कपड़ों, कम सुविधाओं, कम वेतन को लेकर ताने मारते। कहते कि देखो, तुम्हारे अफसर तो मजे में एसी ऑफिसों में बैठे रहते हैं, और तुम्हें यहां मरने के लिए भेज दिया गया है। 


सगत सिंह ने लाउडस्पीकर का जवाब लाउडस्पीकर से दिया। उन्होंने मैंडेरियन चाइनीज में रिकॉर्डेड मैसेज प्रसारित करने शुरू कर दिए। वो भी लगातार, लूप में। 


बात इतनी ही होती तो कोई दिक्कत नहीं थी। पर चीनी जब-तब दौरे पर निकली छोटी फौजी टुकड़ियों (पेट्रोलिंग पार्टीज) से बदसलूकी करते। एक बार तो छिपकर उन्होंने गोली भी चला दी जिससे 17 असम राइफल्स के दो जवान मारे गए। सीमा निर्धारित तो थी नहीं। चीनियों का कहना था कि ये टुकड़ी चीनी क्षेत्र में घुस आई थी।


सगत सिंह ने रोज-रोज की इस चिकचिक से परेशान होकर कोर्प्स कमांडर से बात की। लेफ्टिनेंट जनरल जे. एस. अरोड़ा ने उन्हें सलाह दी कि तुम बॉर्डर पर पैदल-पैदल चलो। अगर चीनियों ने कोई बवाल नहीं किया, तो इसका मतलब होगा कि वो उस जमीन को भारतीय मान रहे हैं। अगर सब ठीक रहा, तो जहां-जहां तुम चले होगे, वहां तार-बाड़, फेंस लगवा दो। सीमा का स्पष्ट निर्धारण हो जाएगा। 


सगत सिंह ने बिलकुल यही किया। जब वे बॉर्डर पर चल रहे थे, दूसरी तरफ उनके साथ-साथ चीनी अफसर एक कैमरामैन के साथ चल रहा था। हालांकि वह कुछ बोला नहीं। 


सगत सिंह ने फेंस लगाने का ऑर्डर दे दिया। 20 अगस्त 1967 से काम शुरू हो गया। चीनियों ने भारतीयों से काम रोकने को कहा, पर कोई रुका नहीं। चीनी कुढ़ते रहे, भारतीय लगे रहे। 6 सितंबर को 2 ग्रेनेडियर की पेट्रोलिंग पार्टी को चीनियों ने घेर लिया, और धमकी दी। अगले दिन उन्होंने तार-बाड़ को तोड़ने की कोशिश भी की। 10 सितंबर तक काम लगभग पूरा हो चुका था। निर्णय लिया गया कि चीनी उतावले हो चले हैं। उनके द्वारा कोई एक्शन लेने से पहले काम पूरा कर लिया जाए। अगले दिन जितने भी उपलब्ध सैनिक थे, सभी को काम पर लगा दिया गया। उनकी सुरक्षा के लिए 18 राजपूत को बुलाया गया।


जब सुबह काम शुरू हुआ, चीनियों ने बदसलूकी शुरू कर दी। बात बढ़ते-बढ़ते बहुत बढ़ गई। 2 ग्रेनेडियर के कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल राय सिंह यादव मुंहजबानी लड़ाई में चीनियों की ऐसी-तैसी कर रहे थे। हालांकि सगत सिंह ने उन्हें वापस बंकर में आने को कहा, पर वर्षों से चीनियों की दादागिरी सहते आ रहे भारतीय अफसरों और सैनिकों का गुस्सा फूट पड़ा था। 


अचानक ही चीनियों ने गोलियां चलानी शुरू कर दी। फेन्स पर काम कर रहे कई सैनिक मारे गए। मरने वालों में राय सिंह यादव भी थे (बुरी तरह घायल, सैनिकों ने समझा कि वे मारे गए)। अपने अफसर को गिरता देख ग्रेनेडियर्स पागल हो उठे। वे अपने खड्डों (ट्रेंच) से बाहर निकल आये और कैप्टन पी. एस. डागर के नेतृत्व में चीनियों पर हमला बोल दिया।


1962 की जंग में हुई शर्मनाक हार और वर्षों से चीनी प्रोपेगैंडा, चीनियों के महाशक्तिशाली होने के विश्वास के कारण, और अपने अफसर को बस यूहीं मरते देख कुछ ग्रेनेडियर्स अपनी पोस्ट छोड़ पीछे हटने लगे थे। यह देख खुद सगत सिंह स्टेनगन लेकर बाहर निकल आये और सैनिकों को उनका फर्ज, उनके अफसर का बलिदान याद दिला कर, उन्हें वापस अपने ट्रेंचों में भेजा। 


18 राजपूत के कुछ सैनिक और इंजीनियर भी मारे गए थे, मारे जा रहे थे। 18 राजपूत के कमांडर मेजर हरभजन सिंह को समझ आ गया कि जब तक चीनी बंकर को नहीं उड़ाया जाता, भारतीय सैनिक मरते रहेंगे। उन्होंने अपने सैनिकों को देख हुक्म दिया कि चीनी बंकर में घुसकर चीनियों को खत्म कर दिया जाए, और खुद बाहर निकलकर चीनियों की ओर बढ़ने लगे। 


इस कोशिश में कई सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए, जिनमें मेजर हरभजन और कैप्टन पृथ्वी सिंह डागर भी शामिल थे। लेकिन उनके जोश ने भारतीय सैनिकों को चीनियों के बंकरों तक पहुंचा दिया था। बंकरों में घुसकर बन्दूक की संगीनों से चीनियों की अतड़ियाँ निकाल ली गई। 


मेजर और कैप्टन जैसे अफसरों के वीरगति को प्राप्त हो जाने के कारण छिटपुट लड़ाई एक पूर्ण युद्ध में बदल गई थी। यह युद्ध तीन दिन चला। सगत सिंह ने क्यांगनोसा-ला से मध्यम दूरी तक मार करने वाली तोपें मंगवा ली। दो साल पहले जिस पोस्ट को सगत सिंह ने खाली करने से मना कर दिया था, वहाँ ये तोपें लगाई गई और चीनियों को चुन-चुन कर मारा गया। अगर यह पोस्ट भारतीय कब्जे में न होती तो शायद 1962 वाला हाल हुआ होता। 


कुल 65 भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। चीनियों का आधिकारिक आंकड़ा 300 था, जो सम्भवतः वास्तविक संख्या से बहुत कम था। 


फौजियों की मौत ने देश को खून के आंसू रुलाए, पर 65 वीरों के बलिदान और 145 घायलों ने देश को वह दे दिया था जो उससे कुछ सालों पहले छीनकर कुचल दिया गया था। 


1962 में जिस चीनी ड्रैगन ने अपने मुख की ज्वाला से हमें दग्ध किया था, 1967 में उस ड्रैगन को पूँछ से पकड़कर घुमाकर पटक दिया गया था। 


1967 के बाद आज तक चीनियों की हिम्मत नहीं हुई कि वे एक गोली भी चला सकें। 


#सगत_सिंह 3


(फोटो में नाथू-ला की लड़ाई के बाद सगत सिंह जी पूर्वी कमान के आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल मानेकशॉ के बाएं।)

टिप्पणियाँ

Best From the Author

Australia पर India की विजय मात्र एक Test Match में जीत नहीं है

जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मार जाता है उपरोक्त पंक्तियों का टिम पैन से कोई लेना देना नहीं है एवम् Never mess with an Indian इस पंक्ति का ऋषभ पंत से कुछ लेना देना नहीं है लेना देना तो रिकी पॉन्टिंग साहेब का है, जिन्होंने और जिनके चेलों ने एक अकेले से नहीं पूरी टीम से भसड़ लेली, फिर क्या होना था.                                फिर इतिहास रचा गया, ऐसा इतिहास जिसमे underdog समझी जाने वाली टीम जिसके आधे खिलाड़ी डेब्यू कर रहे थे, और इसी के साथ कह के लूंगा वाला गाना भारतीय चेंज रूम में बजा कर, ऑस्ट्रेलिया को आज दूसरी बार ये दिखला दिया कि भारतीय रणबांकुरे आखिर क्यों इतने ऐतिहासिक हैं।                                      पिछली बार जब पहली पारी में अच्छा प्रदर्शन ना कर पाने के एवज में ऑस्ट्रेलियाई टीम ने भीख के रूप में फॉलोऑन दिया, तो उनके लिए ये महज और अधिक अपमान देने का या यूं कहे...

The History of Gujarati Calendar

प्राचीन काल से ही हिंदुओं द्वारा भारत में दो प्रकार की कालानुक्रमिक प्रणालियों का उपयोग किया जाता रहा है। पहले को किसी ऐतिहासिक घटना से गणना करने के लिए वर्षों की आवश्यकता होती है। दूसरा किसी खगोलीय पिंड की स्थिति से गणना शुरू करता है। समय-समय पर और भारत के विभिन्न हिस्सों में एक ऐतिहासिक घटना की गणना अलग-अलग रही है। गुजरात, दक्षिण के कुछ हिस्से और आसपास के क्षेत्र में आमतौर पर इस्तेमाल की जाने वाली सबसे हालिया ऐतिहासिक घटना विक्रम युग (58 ईसा पूर्व) है। शकों पर राजा विक्रमादित्य की ऐतिहासिक जीत के बाद विक्रम युग की स्थापना हुई। इस युग में गिने जाने वाले वर्षों को आमतौर पर विक्रमसंवत या केवल संवत शब्द से दर्शाया जाता है। वे बरसों बीत चुके हैं। उत्तर में प्रथा हर साल चैत्र (मार्च-अप्रैल) से शुरू होती है और हर महीने पूर्णिमा से। लेकिन दक्षिण के कुछ हिस्सों में और गुजरात में साल की शुरुआत कार्तिक (अक्टूबर-नवंबर) से होती है और महीनों की शुरुआत अमावस्या से होती है। शक, या शालिवाहन युग (78 ईस्वी) अभी भी भारत के कुछ हिस्सों में उपयोग किया जाता है। खगोलीय पिंडों से समय की गणना मे...

The Metamorphosis book review

समाज लोगों से प्यार तब तक करता है, जब तक वे उसके लिए उपयोगी रहते हैं।   और जैसे ही कोई व्यक्ति उपयोगी होना बंद कर देता है—उसका अस्तित्व भी असहज हो जाता है।   यही वास्तविक भयावहता है काफ्का के "द मेटामॉर्फोसिस" की। ग्रेगर साम्सा रातों‑रात कोई राक्षस नहीं बन जाता।   वह बस एक ऐसा इंसान बन जाता है जो अब काम नहीं कर सकता, कमाई नहीं कर सकता,   परिवार की उम्मीदों को पूरा नहीं कर सकता,   और समाज की उस "सामान्य" दुनिया में फिट नहीं बैठता जो हम सबको थोप देती है।   और अचानक—   उसका अपना कमरा छोटा लगने लगता है,   घर की बातचीत में ठंडक घर कर जाती है,   और वही परिवार जिसने कभी उस पर अपेक्षाएँ और निर्भरता रखी थी,   धीरे‑धीरे उसके बिना जीना सीख जाता है।   काफ्का हमें दिखाते हैं कि   समाज अक्सर मानवता की कीमत नहीं,   बस उत्पादकता की कीमत चुकता है।   जैसे ही कोई व्यक्ति कमज़ोर होता है, बेरोज़गार होता है,   दुखी, अलग, टूटा हुआ—   तो वह बस एक बोझ बन जाता है।   किसी इंसान की जगह एक “समस्या” बन जाता है।   यह सच्चाई हम आ...

The 2025 Knowledge Stack

  The 2025 Knowledge Stack I read 34 books in 2025. If I had to distill those thousands of pages into 4 life-changing lessons, this is what they would be. 📚👇 1. On Wealth & Wisdom: "The Almanack of Naval Ravikant" This wasn't just a book; it was a manual for the modern world. The biggest takeaway? "Specific knowledge" is your superpower. Build skills that feel like play to you but look like work to others. 2. On Strategy: "Lanka ka Yuddh" by Amish Tripathi ⚔️ A masterclass in how leadership and strategy are inseparable from ethics. It’s a reminder that how you win matters just as much as the win itself. 3. On Mindset: "The Courage to Be Disliked" 🧠 A radical lesson in emotional freedom. Most of our stress comes from trying to meet others' expectations. Real growth starts when you have the courage to be your authentic self, regardless of the "likes". 4. On Discipline: "Make Your Bed" by Admiral William H. McRaven...

Suicide Fruiting

इस साल बाज़ार में जितने जामुन दिखाई दे रहे हैं, उतने मैंने पिछले दो दशकों में कभी नहीं देखे। ​जामुन के अक्षरशः ढेर लग रहे हैं (नीचे गिर रहे हैं)। जिन पेड़ों पर पिछले साल इक्का-दुक्का फल आए थे, वे पेड़ भी इस बार जामुन से पटे पड़े हैं। जहाँ फल आए थे, वहाँ अब उन का अंबार लगना शुरू हो गया है। ​आखिर यह सब क्या चल रहा है? ​हमारी दादी/नानी हमेशा कहती थीं कि, "जिस गर्मियों में जामुन के ऐसे ढेर लगते हैं, उस साल सूखा पड़ता है।" ​बुजुर्गों का यह पारंपरिक ज्ञान वनस्पति विज्ञान (Botany) के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बिल्कुल सही और सटीक है। विज्ञान में इस दिलचस्प और उतनी ही चौंकाने वाली प्रक्रिया को "मास्टिंग" (Masting) या "स्ट्रेस फ्रूटिंग" (Stress Fruiting) कहा जाता है। ​पेड़ों द्वारा खुद को खत्म करके ज्यादा से ज्यादा फल देने के इस आखिरी प्रयास को कभी-कभी "सुसाइड फ्रूटिंग" (Suicide Fruiting) या "बंपर क्रॉप" भी कहा जाता है। ​यह असल में क्या है और इसके पीछे का विज्ञान क्या कहता है, आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं: ​१. 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट' (अस्ति...