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Suicide Fruiting

इस साल बाज़ार में जितने जामुन दिखाई दे रहे हैं, उतने मैंने पिछले दो दशकों में कभी नहीं देखे। ​जामुन के अक्षरशः ढेर लग रहे हैं (नीचे गिर रहे हैं)। जिन पेड़ों पर पिछले साल इक्का-दुक्का फल आए थे, वे पेड़ भी इस बार जामुन से पटे पड़े हैं। जहाँ फल आए थे, वहाँ अब उन का अंबार लगना शुरू हो गया है। ​आखिर यह सब क्या चल रहा है? ​हमारी दादी/नानी हमेशा कहती थीं कि, "जिस गर्मियों में जामुन के ऐसे ढेर लगते हैं, उस साल सूखा पड़ता है।" ​बुजुर्गों का यह पारंपरिक ज्ञान वनस्पति विज्ञान (Botany) के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बिल्कुल सही और सटीक है। विज्ञान में इस दिलचस्प और उतनी ही चौंकाने वाली प्रक्रिया को "मास्टिंग" (Masting) या "स्ट्रेस फ्रूटिंग" (Stress Fruiting) कहा जाता है। ​पेड़ों द्वारा खुद को खत्म करके ज्यादा से ज्यादा फल देने के इस आखिरी प्रयास को कभी-कभी "सुसाइड फ्रूटिंग" (Suicide Fruiting) या "बंपर क्रॉप" भी कहा जाता है। ​यह असल में क्या है और इसके पीछे का विज्ञान क्या कहता है, आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं: ​१. 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट' (अस्ति...

हाइफा युद्ध ! क्या है भारत इजराइल की दोस्ती का ऐतिहासिक राज़ ? Battle of Haifa, A blogpost by Abiiinabu

हाइफा युद्ध !  क्या है भारत इजराइल की दोस्ती का ऐतिहासिक राज़ ? Battle of Haifa

हाल ही में 23 सितंबर को Haifa के युद्ध गई 103 वीं सालगिरह मनाई गई हैं। इस युद्ध का Indiaऔर Israel के अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर बहुत ही गहरा प्रभाव है। जिसने इजरायल को एक यहूदी राष्ट्र बनाने में मदद की थी, और इसी युद्ध के कारण भारत और इजरायल के संबंध इतने गहरे और गहरे होते जा रहे हैं। इतिहास की किताबों में खोलकर देखें तो भारत और इजराइल कई वर्षों से एक दूसरे के परम मित्र बनें रहे हैं। इन संबंधों की इतनी सर गर्मी की वजह हाइफा का युद्ध भी है। जो आज से 103 साल पहले इजराइल के हाइफा शहर में लड़ा गया था। आखिर इस युद्ध की वजह क्या थी? और इसमें भारत का क्या संबंध है? इसी विषय पर आज की चर्चा शुरू करते हैं।    

    वर्ष 1918 मैं तात्कालिक Ottomon Empire का एक राज्य फ़िलिस्तीन हुआ करता था।इस फिलिस्तीनी राज्य में समुद्र के किनारे एक शहर था, जिसका नाम था हाइफ़ा । इसी Haifa शहर को ऑटोमन साम्राज्य से आजादी दिलाने के लिए ब्रिटिश इंडियन आर्मी ने प्रथम विश्वयुद्ध में शत्रुपक्ष के विरुद्ध युद्ध किया था। शत्रु पक्ष जिसमें ऑटोमन साम्राज्य की थल सेना जर्मन सेना और एस्ट्रो हंगेरियन आर्मी सम्मिलित रूप से हाइफा शहर की रक्षा कर रही थी, से युद्ध करते हुए ब्रिटिश भारतीय सेना ने 400 सालों की गुलामी से हाइफा शहर को मुक्त कराया।हाइफा की इस लड़ाई को इतिहास का अंतिम गौरवपूर्ण घुड़सवार युद्ध भी कहा जाता है। “The Last Great Cavalry Campaign in History”.

  • कैवेलरी क्या होती है?

कैवेलरी का अर्थ होता है - घुड़सवार सैनिक। एक घुड़सवार सैनिक का, सबसे मुख्य हथियार 12-15 फिट लम्बा भाला होता है। जिसे Lance भी कहते हैं। इसलिए कैवेलरी  को प्रायः Lancers भी कहा जाता है।

      प्रथम विश्व में अंग्रेजों की तरफ से भारतीय सेना के कई सैनिकों ने हिस्सा लिया। हाइफा के युद्ध में भाग लेने वाले सैनिकों में

15th इम्पीरियल सर्विस की कैवेलरी ब्रिगेड में, 5th कैवेलरी डिवीज़न और डेजर्ट माउंटेड कॉर्प्स के साथ हिस्सा लिया था। 

15th इम्पीरियल सर्विस की कैवेलरी ब्रिगेड तीन भारतीय प्रिंसली स्टेट-

जोधपुर, हैदराबाद और मैसूर की संयुक्त थल सेना से मिलकर बनी थी। 


  • हाइफा शहर इतना महत्वपूर्ण क्यों है? 

    HAIFA शहर इस्राइल का एक पोर्ट सिटी है, जो की समुद्र के किनारे बसा है। जिसकी वजह से यह सेनाओं के यातायात एवं रसद व खाद्य पदार्थों की आवाजाही बड़ी सरलता से कर सकता है। इसी वजह से इसकी अहमियत इतनी अधिक बढ़ जाती है। 


मानचित्र के माध्यम से आप इसकी सामरिक स्थिती को समझ सकते हैं-


  • हाइफा के युद्ध का परिणाम? 

    हाइफा का युद्ध 23 सितम्बर 1918 को लड़ा गया था। जिसमें भारतीय सेना की जीत हुई।

और हाइफा 400 साल से अधिक ऑटोमन साम्राज्य की गुलामी से आजाद हुआ।

इस युद्ध में भारतीय सेना ने मात्र 1 घंटे के अंदर अंदर ऑटोमन साम्राज्य की सेना को धूल चटा दी।

लेकिन जहाँ जंग होती है,वहाँ शहादत भी होती है। इस युद्ध के परिणामस्वरूप

आठ भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए एवं 34 गंभीर रूप से घायल हो गए। ब्रिटिश इम्पेरिअल सेना की

जोधपुर सेना (जिसे जोधपुर लैंसर्स भी कहा जाता है) के सेनापति मेजर दलपत सिंह शेखावत शहीद हो गए। जिन्हें उनकी शहादत के बाद इंडियन ऑर्डर ऑफ मेरि यानी आईओएम से सम्मानित किया गया। 


    हाइफा के युद्ध की याद में ब्रिटिश सरकार ने Leonard Jennings की अगुवाई में तीन मूर्ति स्मारक, तीन मूर्ति चौक एवं तीन मूर्ति भवन बनवाए। ब्रिटिश सरकार में ब्रिटिश आर्मी का जर्नल यही रहता था। तीन मूर्ति भवन में ही रहता था।


आजादी के बाद,तीन मूर्ति भवन।भारत के प्रथम प्रधानमंत्री।पंडित जवाहर लाल नेहरू का आधिकारिक निवास स्थान बना।17 साल के उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल के बाद।उन जब उनकी मृत्यु हो गयी।तब उस घर को म्यूजियम में बदल दिया गया।तीन मूर्ति भवन।एवं तीन मूर्ति चौक। ब्रिटिश इंडियन आर्मी के लैंसर्स के संघटकों को प्रदर्शित करता है।जो जोधपुर, हैदराबाद और मैसूर से संबंधित थे। Israel ने हाइफा में हाइफन युद्ध की याद में भारतीय सेना को समर्पित एक स्मारक बनवाया है।


हाइफा के युद्ध में भाग लेने वाली।15 कैवेलरी बाद में भारतीय सेना की 61 वीं कैवेलरी से प्रतिस्थापित कर दी गयी। जो अपना राइजिंग दिवस।23 सितम्बर को हाइफा युद्ध की विजय के उपलक्ष्य में मनाता है।


  • हाइफा के युद्ध का प्रभाव? 

हाइफा के युद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार द्वारा Jews को उनके अलग राष्ट्र को दिया गया वादा पूरा होता दिखाई पड़ा।

भारत इजरायल के संबंधों पर सकारात्मक प्रभाव भी देखने को मिला।

1999 Indo-pak war, Kargil Warमें इजरायल ने भारत को अत्याधुनिक तकनीक उपलब्ध करवाकर अपना पक्ष भारत की ओर मोड़ दिया।

इजरायल में भारत को दूसरा घर मानते हैं।

इजरायली सेना में अनिवार्य सैन्य सेवा के कुछ सालों बाद इजरायली छुट्टी पर भारत ही आते हैं।

 



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Not demonic, just introverted! आसुरी नहीं, अंतर्मुखी!

मैं 27 मूल नक्षत्रों, शनिवार और 22 तारीख को जन्मा व्यक्ति हूँ — एक ऐसा जन्म‑संयोग जो न सिर्फ़ मेरी तिथि बताता है, बल्कि मेरे भीतर की गहराई, द्वंद्व और अस्थिरता का भी संकेत देता है। राहु के प्रबल और दूरदर्शी प्रभाव ने मेरे व्यक्तित्व को सीधे, सरल और सतही नहीं रहने दिया; मैं विचारों की उस गहरी खाई में अक्सर भटक जाता हूँ, जहाँ हर बात बस बाहरी रूप नहीं, बल्कि भीतरी अर्थ भी धरती होता है। मैं हर निर्णय के पीछे छिपे संभावित नतीजों, अनजाने खतरों और छिपी हुई उम्मीदों को भी देखने का आदी हूँ।   कभी‑कभी लोग मेरे कार्यों, अभिव्यक्ति और निर्णयों को असामान्य, अत्यंत गहन या यहाँ तक कि “आसुरी” समझने लगते हैं, क्योंकि मेरी सोच उनकी सामान्य धारणाओं की रेखाओं से बाहर निकल जाती है। पर यह आसुरी नहीं, बस एक टूटी हुई, खुरदरी और अत्यंत ईमानदार आत्मा की आवाज़ है, जो दिखावे की दुनिया से थक चुकी है और अपने सच्चे रूप में जीना चाहती है। मैं जब भी बोलता हूँ, तो बस शब्द नहीं बोलता, बल्कि उसके पीछे समा दर्द, संघर्ष, अनुभव और उम्मीदों को भी लाता हूँ।   मेरी पहचान में ग्रहों का भी बड़ा हाथ है। जब ग्रह ही वही है...

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