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प्रेमचंद के फटे जूते

  प्रेमचंद का एक चित्र मेरे सामने है, पत्नी के साथ फ़ोटो खिंचा रहे हैं. सिर पर किसी मोटे कपड़े की टोपी, कुरता और धोती पहने हैं. कनपटी चिपकी है, गालों की हड्डियां उभर आई हैं, पर घनी मूंछें चेहरे को भरा-भरा बतलाती हैं. पांवों में केनवस के जूते हैं, जिनके बंद बेतरतीब बंधे हैं. लापरवाही से उपयोग करने पर बंद के सिरों पर की लोहे की पतरी निकल जाती है और छेदों में बंद डालने में परेशानी होती है. तब बंद कैसे भी कस लिए जाते हैं. दाहिने पांव का जूता ठीक है, मगर बाएं जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अंगुली बाहर निकल आई है. मेरी दृष्टि इस जूते पर अटक गई है. सोचता हूं-फ़ोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी-इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है. यह जैसा है, वैसा ही फ़ोटो में खिंच जाता है. मैं चेहरे की तरफ़ देखता हूं. क्या तुम्हें मालूम है, मेरे साहित्यिक पुरखे कि तुम्हारा जूता फट गया है और अंगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हें इसका ज़रा भी अहसास नहीं है? ज़रा लज्जा, संकोच या झेंप नहीं है? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि धोती को थोड़ा न...

बच्चे और कार्टून ।।A blogpost by Abiiinabu ।।

  बच्चे और कार्टून Modern Day cartoons

    आज ऑफिस से घर आ रहा था, तो सीढ़ियां चढ़ते हुए पडोसी के टीवी की आवाज बहार से सुनी, किसी भारतीय अभिनेता की आवाज़ में कोई कार्टूनि आवाज लग रही थी। मैं उनके बच्चे को जनता हूँ, शर्त लगा के कह सकता हूँ कि कोई कार्टून ही चल रहा होगा।  ऐसे ही आते आते मन में सवाल आये कि हमारा बचपन शायद अच्छा था।  मैं कोई नई बात नहीं कर रहा हूँ।  अगर आप यह ब्लॉग पढ़ रहे हैं और आपकी उम्र 20 वर्ष या उससे ज़्यादा है, तब तो आप निश्चित ही मेरी बात सही मान रहे होंगे।  और यदि आप प्रौढ़ावस्था में पहुँच चुके हैं तब तो आप निश्चित रूप से कभी न कभी हम सबसे ही परेशान रहे होंगे।  मैं आज एक विश्लेषण करना चाहता हूँ, मैं ये जानना चाहता हूँ कि हमारे बचपन में जो  Cartoon आते थे वो हमको तब ज़्यादा सिखाते थे या आजकल जो कार्टून बच्चों को दिखाए जाते हैं उनसे उनका विकास हो रहा है?

    यदि मैं ठीक हूँ तो जो लोग 90s में पैदा हुए हैं उनके लिए 2007 तक, जब तक भारत में एंटरटेनमेंट के नाम पर सिर्फ और सिर्फ टीवी ही था। उस समय के कार्टून बच्चों को अधिक स्मार्ट, सेंसिटिव औइर लाइफ लेसंस सिखाते थे । टॉम एंड जेरी किसे याद नहीं है, टॉम और जेरी के बीच कि खट्टी मीठी लड़ाई हम सबको गुदगुदाती ही हैं।  लेकिन आप में से कितने लोगों ने ये नोटिस किया कि उस आपस कि लड़ाई में यदि कोई बहार का आ जाता था  तो चाहे टॉम कि जगह लेने या फिर जेरी लेने वो दोनों उसको अपनी लड़ाई भुला कर मार भागते थे।  कई बार टॉम को बिल्ली होते हुए भी जेरी को जो चूहा था, उसको न पकड़ पाने कि वजह से बहार निकलना पड़ा लेकिन जेरी ने उसकी जगह आये दुसरे बिल्ले को उस घर में टिकने नहीं दिया।  वो तब तक शरारत करता था, कुछ ऐसी जुगत लगाता था कि मालिक को टॉम को वापिस लाना ही पड़ता था।  अगर आप लोग अब भी नहीं समझे तो ये चूहे बिल्ली कि लड़ाई हमको ये सिखाती है कि घर के अंदर भले ही कितना भी लड़ लो, लेकिन आपकी आपसी लड़ाई में किसी बहार वाले को घर के भीतर आने मत दो और यदि वो घुसने कि कोशिश करे तो, आपसी लड़ाई भुला कर उसका मुकाबला करो।  लेकिन ये कार्टून बंद कर दिया गया। अब क्यों किया गया ये एक अलग बहस का विषय है लेकिन ये लिस्ट यहीं ख़तम नहीं होती।

    डोरेमोन और Shinchan जैसे Cartoon हमको दोस्ती का सही मतलब सिखाते थे। डोरेमोन के नए नए आविष्कार और शिनचैन की शरारतें हमको अपना बचपन खुल कर मुस्कुराने की  सीख देती थी।  पोकेमोन और Digimon जैसे कार्टून हमको सिखाते थे कि ज़िन्दगी में बस जीतना ही ज़रूरी नहीं होता, हारना भी उतना ही ज़रूरी होता है।  साथ ही साथ इंसानों का अपने आसपास के जानवरों से लगाव इसकी एक अलग सीख थी।  ऐश केचुम और पिकाचु जैसी दोस्ती न कभी देखि गई न और शायद देखने को मिलेगी।  ऐश एक विश्व विजेता मास्टर बनना चाहता था लेकिन उस कार्टून में सबसे अच्छी बात ये लगी मुझे, कि उन्होंने ऐश को जीतने से ज़्यादा बार हारते हुए दिखाया।  सिर्फ ये दिखाने के लिए कि जीवन में हार जीत से ज़्यादा ज़रूरी है। क्यूंकि उसी से हमे जीत का असली मतलब पता चलता है।

    ऐसा नहीं है कि पहले के Cartoon केवल जीवन जीने का तरीका सिखाते थे, वो ये सिखाते थे कि लाइफ की परेशानियों को सच में कैसे झेलना है और अगर ना झेल पा रहे तो सीखना कैसे है। पोकेमोन सिर्फ जीवन जीने का अंदाज नहीं सीखत्ता वो साथ साथ में सिखाता है किजानवरों का विकास कैसे होता है। वो सिखाता है कि विकसित होने के लिए आपको परेशानियां उठानी पड़ती हैं, आपको म्हणत करनी पड़ती है।  सिर्फ पोकेमोन ही क्यों आप नरुटो देख लो, या ड्रैगन बॉल ज़ी देख लो आप ये समझ जाओगे कि जिंदगी ने मिनट करने से हम, अपने स्टार को कितना आगे बढ़ा सकते हैं।  ऐसे ढेरों उदाहरण भरे पड़े हैं, अगर सबके बारे में बताने लघु तो शायद ब्लॉग और समय दोनों कि सीमा पार हो जाएगी। लेकिन आज कल के कार्टून बच्चों को फूहड़ता, रंगभेद ( मोठे पतले का अंतर, काले गोर का भेद, अमीर गरीब की समस्या, बॉय शेमिंग) जैसी चीज़ें दिखा रहा है। और बच्चे जो देखते हैं वही करने की कोशिश करते हैं।  वो आपका और मेरा खा नहीं मानेंगे वो वही करेंगे जो वो अपने आस पास देख रहे हैं।  छोटी बच्ची अपनी मान को श्रृंगार करते देखती है, इसीलिए मौका पाकर वो भी शरणकार करना चाहती है।  बच्चे अपने पिता को शेव करते देखते हैं, इसलिए वो खाली होते ही शेविंग क्रीम अपने चेहरे पर लगा लेते हैं।  सोच कर देखिये अगर बच्चे अपने आस पास ये सब देखेंगे तो वो कैसा बनने की कोशिश करेंगे ? मैं ज़्यादा कुछ नहीं कहूंगा लेकिन जाते जाते आपसे ये ज़रूर पूछूं की आपने सबसे पहले DNA नामक शब्द कब सुना था ? मेरे साथ वाले ने शायद नौवीं कक्षा में और उससे पहले वालों ने शायद उसके बाद।  अब अगर मैं आपको बताऊ की एक कार्टून बच्चों को डीएनए के बारे में समझने के साथ साथ उसकी इंजीनियरिंग कैसे करते हैं ये समझा रहा हो तो क्या आप चौकेंगे नहीं? लेकिन मुझे बहुइट अच्छी तरह याद है ( दरअसल यही मेरी समस्या है कि मुझे चीज़ें याद रह जाती हैं) जब मैं छठवीं में था तो एक कार्टून उस समय आना शुरू हुआ था नाम था बेन टेन। कहानी ऐसी घडी के बारे में थी जिसको डीएनए लॉकिंग के ज़रिये बनाया गया था और ब्रह्माण्ड में मौजूद किसी भी नए जीव का DNA अपने अंदर कॉपी कर लेती थी और धारक को उसका रूप धरने की शक्ति प्रदान करती थी। है न मजेदार और आश्चर्यजनक? अब सोचिये मुझे ये बार कक्षा छह में पता चल गई थी अपने साथ वालों से पूरे तीन साल पहले।  और जब ये पाठ स्कूल में पढ़ाया जा रहा था तो मुझे सब समझ में आ रहा था जबकि मेरे बगल वाला मेरा मुँह देख रहा था।  इसका फायदा क्या हुआ वो मैं आपको पफिर कभी बताऊंगा जब आप मुझसे पूछेंगे।

    लेकिंन इतनी छोटी उम्र ये ये सब, डीएनए आज भी सबसे काम्प्लेक्स टॉपिक्स में से एक माना जाता है और उसको बच्चो को सीखने के ये नायाब तरीका, मतलब कमाल ही है। आपके बच्चे क्या देख रहे हैं ये देखिये, उसमे क्या दिखाया जा रहा है ये देखिये कार्टून सिर्फ बच्चों के लिए नहीं होता, ऐसा मानिये क्यूंकि यदि नहीं मानेंगे तो शायद आपका आज के किसी कार्टून किरदार की तरह या तो लड्डू, या समोसा या फिर किसी और खाने वाली चीज़ को ही जीवन का सार समझेगा और दुनिया के समझदार होने की भोंदू और कुंद ही बनेगा। 

-Abiiinabu

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