समाज लोगों से प्यार तब तक करता है, जब तक वे उसके लिए उपयोगी रहते हैं। और जैसे ही कोई व्यक्ति उपयोगी होना बंद कर देता है—उसका अस्तित्व भी असहज हो जाता है। यही वास्तविक भयावहता है काफ्का के "द मेटामॉर्फोसिस" की। ग्रेगर साम्सा रातों‑रात कोई राक्षस नहीं बन जाता। वह बस एक ऐसा इंसान बन जाता है जो अब काम नहीं कर सकता, कमाई नहीं कर सकता, परिवार की उम्मीदों को पूरा नहीं कर सकता, और समाज की उस "सामान्य" दुनिया में फिट नहीं बैठता जो हम सबको थोप देती है। और अचानक— उसका अपना कमरा छोटा लगने लगता है, घर की बातचीत में ठंडक घर कर जाती है, और वही परिवार जिसने कभी उस पर अपेक्षाएँ और निर्भरता रखी थी, धीरे‑धीरे उसके बिना जीना सीख जाता है। काफ्का हमें दिखाते हैं कि समाज अक्सर मानवता की कीमत नहीं, बस उत्पादकता की कीमत चुकता है। जैसे ही कोई व्यक्ति कमज़ोर होता है, बेरोज़गार होता है, दुखी, अलग, टूटा हुआ— तो वह बस एक बोझ बन जाता है। किसी इंसान की जगह एक “समस्या” बन जाता है। यह सच्चाई हम आ...
21 दिसंबर से 27 दिसंबर का समय गुरु परिवार और
उनके सहयोगियों के बलिदान को याद करने का समय है…
पुराने बुजुर्ग बताते हैं कि- पहले पंजाब में 21 दिसंबर से लेकर 27 दिसम्बर तक का समय “शोक सप्ताह” के रूप में मनाया जाता था. इस पूरे सप्ताह कोई खुशियाँ नहीं मनाता था. सादा भोजन करते थे, जमीन पर सोते थे और गुरु परिवार के बलिदान को याद करते थे.
ऐसा इसलिए किया जाता था कि – वे लोग गुरु गोविन्द सिंह , उनके परिवार और उसके साथियों के संघर्ष को समझ सकें.
21 दिसंबर को गुरु गोबिंद सिंह को आनंदपुर साहब किला छोड़ना पडा था. उनकी माँ (माता गुजरी) और छोटे साहबजादे उनसे बिछड़ गए थे
22 दिसंबर को बड़े साहबजादे (बाबा अजीत सिंह और बाबा जुझार सिंह) बलिदान हो गए थे. गुरु गोविन्द सिंह स्वयं घायल हो गए थे. उनके अनेकों साथी भी बलिदान हो गए थे. 23 दिसंबर को गुरु गोविन्द सिंह की माता और छोटे साहबजादे गिरफ्तार कर लिए गए थे.
उनको इस्लाम कबूलने को कहा गया और इस्लाम कबूल न करने पर तीन दिन तक भूखा प्यासा रखा गया और 26 दिसंबर को जिन्दा दीवार में चुनवा दिया गया. ये द्रश्य देखकर माता गुजरी ने भी प्राण त्याग दिए. मुगलों का जुल्म इतने पर भी नहीं रुका.
छोटे साहबजादों को चोरी से गर्म दूध पिलाने वाले मोती राम मेहरा के परिवार को कोल्हू में पेरकर मार दिया गया. छोटे साहबजादों का संस्कार नहीं करने दे रहे थे. जमीन पर सोने की मोहरें बिछाकर सरकार को देने की शर्त रखी, जिसे दीवान टोडरमल ने पूरा किया.
27 नबम्बर को शेर बहादुर खान, बीबी अनूप कौर सहित रोपड़ – मोरिंडा की अनेकों महिलाओं को पकड़कर मलेरकोटला ले गया था जहाँ बाद में अपनी इज्जत बचाने के लिए बीबी अनूप कौर ने जान दे दी थी और जिनका बदला बन्दा बहादुर ने लिया था
उन सबके त्याग और बलिदान को याद करने के लिए पंजाबी लोग खुद भी भौतिक सुखों से दूर रहा करते थे. लेकिन अब आज हम, उस बलिदान को भूल चुके हैं. आजकल यह सप्ताह क्रिसमस की खुशिया मनाने का सप्ताह बन चूका है.
जगह जगह बाजार सज जाते हैं. बड़े बड़े मॉल में रौनक बढ़ जाती है. लोग अपने बच्चों को जोकर जैसे कपडे पहनाकर बड़े खुश होकर घूमते हैं. अब यह सप्ताह छुट्टियाँ मनाने का सप्ताह बन चूका है. यह सप्ताह अब शोक के बजाय मनोरंजन वाला सप्ताह बन गया है.
हम लोगों को गुरु परिवार के बलिदान की याद दिलाने का प्रयास करते हैं. साथ ही आपसे निवेदन करते हैं कि- इस अवसर पर फतेहगढ़ साहब, चमकौर साहब, चप्पदचिडी जैसी जगहों पर अपने बच्चों को घुमाने लेकर जाइए और उन्हें बताइये की हम जोकरों के नहीं सनातनी वीरों के वंशज है।
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