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Suicide Fruiting

इस साल बाज़ार में जितने जामुन दिखाई दे रहे हैं, उतने मैंने पिछले दो दशकों में कभी नहीं देखे। ​जामुन के अक्षरशः ढेर लग रहे हैं (नीचे गिर रहे हैं)। जिन पेड़ों पर पिछले साल इक्का-दुक्का फल आए थे, वे पेड़ भी इस बार जामुन से पटे पड़े हैं। जहाँ फल आए थे, वहाँ अब उन का अंबार लगना शुरू हो गया है। ​आखिर यह सब क्या चल रहा है? ​हमारी दादी/नानी हमेशा कहती थीं कि, "जिस गर्मियों में जामुन के ऐसे ढेर लगते हैं, उस साल सूखा पड़ता है।" ​बुजुर्गों का यह पारंपरिक ज्ञान वनस्पति विज्ञान (Botany) के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बिल्कुल सही और सटीक है। विज्ञान में इस दिलचस्प और उतनी ही चौंकाने वाली प्रक्रिया को "मास्टिंग" (Masting) या "स्ट्रेस फ्रूटिंग" (Stress Fruiting) कहा जाता है। ​पेड़ों द्वारा खुद को खत्म करके ज्यादा से ज्यादा फल देने के इस आखिरी प्रयास को कभी-कभी "सुसाइड फ्रूटिंग" (Suicide Fruiting) या "बंपर क्रॉप" भी कहा जाता है। ​यह असल में क्या है और इसके पीछे का विज्ञान क्या कहता है, आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं: ​१. 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट' (अस्ति...

क्रिसमस सप्ताह का काला भारतीय इतिहास Christmas Guru Gobind Singh

21 दिसंबर से 27 दिसंबर का समय गुरु परिवार और
उनके सहयोगियों के बलिदान को याद करने का समय है…

पुराने बुजुर्ग बताते हैं कि- पहले पंजाब में 21 दिसंबर से लेकर 27 दिसम्बर तक का समय “शोक सप्ताह” के रूप में मनाया जाता था. इस पूरे सप्ताह कोई खुशियाँ नहीं मनाता था. सादा भोजन करते थे, जमीन पर सोते थे और गुरु परिवार के बलिदान को याद करते थे.

ऐसा इसलिए किया जाता था कि – वे लोग गुरु गोविन्द सिंह , उनके परिवार और उसके साथियों के संघर्ष को समझ सकें. 

21 दिसंबर को गुरु गोबिंद सिंह को आनंदपुर साहब किला छोड़ना पडा था. उनकी माँ (माता गुजरी) और छोटे साहबजादे उनसे बिछड़ गए थे

22 दिसंबर को बड़े साहबजादे (बाबा अजीत सिंह और बाबा जुझार सिंह) बलिदान हो गए थे. गुरु गोविन्द सिंह स्वयं घायल हो गए थे. उनके अनेकों साथी भी बलिदान हो गए थे. 23 दिसंबर को गुरु गोविन्द सिंह की माता और छोटे साहबजादे गिरफ्तार कर लिए गए थे.

उनको इस्लाम कबूलने को कहा गया और इस्लाम कबूल न करने पर तीन दिन तक भूखा प्यासा रखा गया और 26 दिसंबर को जिन्दा दीवार में चुनवा दिया गया. ये द्रश्य देखकर माता गुजरी ने भी प्राण त्याग दिए. मुगलों का जुल्म इतने पर भी नहीं रुका.

छोटे साहबजादों को चोरी से गर्म दूध पिलाने वाले मोती राम मेहरा के परिवार को कोल्हू में पेरकर मार दिया गया. छोटे साहबजादों का संस्कार नहीं करने दे रहे थे. जमीन पर सोने की मोहरें बिछाकर सरकार को देने की शर्त रखी, जिसे दीवान टोडरमल ने पूरा किया.

27 नबम्बर को शेर बहादुर खान, बीबी अनूप कौर सहित रोपड़ – मोरिंडा की अनेकों महिलाओं को पकड़कर मलेरकोटला ले गया था जहाँ बाद में अपनी इज्जत बचाने के लिए बीबी अनूप कौर ने जान दे दी थी और जिनका बदला बन्दा बहादुर ने लिया था

उन सबके त्याग और बलिदान को याद करने के लिए पंजाबी लोग खुद भी भौतिक सुखों से दूर रहा करते थे. लेकिन अब आज हम, उस बलिदान को भूल चुके हैं. आजकल यह सप्ताह क्रिसमस की खुशिया मनाने का सप्ताह बन चूका है.

जगह जगह बाजार सज जाते हैं. बड़े बड़े मॉल में रौनक बढ़ जाती है. लोग अपने बच्चों को जोकर जैसे कपडे पहनाकर बड़े खुश होकर घूमते हैं. अब यह सप्ताह छुट्टियाँ मनाने का सप्ताह बन चूका है. यह सप्ताह अब शोक के बजाय मनोरंजन वाला सप्ताह बन गया है.
हम लोगों को गुरु परिवार के बलिदान की याद दिलाने का प्रयास करते हैं. साथ ही आपसे निवेदन करते हैं कि- इस अवसर पर फतेहगढ़ साहब, चमकौर साहब, चप्पदचिडी जैसी जगहों पर अपने बच्चों को घुमाने लेकर जाइए और उन्हें बताइये की हम जोकरों के नहीं सनातनी वीरों के वंशज है।

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