*आखिर जा कहां रहा है हमारा समाज..* महाराष्ट्र के निम्न मध्यम वर्गीय मां-बाप ने अपनी इकलौती संतान को जैसे-तैसे पाल पोसकर 18 साल का किया। अब उस बेटे को आईफोन की सनक जग गई, पहाड़ के किनारे खड़े होकर 3 घंटे का फुल वोल्टेज ड्रामा चला। संभवतः सभी को लगा होगा कि ड्रामा कर रहा है, इसी बीच बाप सामने आया, शायद उसे अपने भावनात्मक और शारीरिक बल पर भरोसा रहा होगा, कि या तो मैं अपने बेटे को प्यार/डांट से मना/धमका लूंगा, नहीं तो ताकत का प्रयोग करके उसे किनारे से खींच लाऊंगा। बाप का दांव गलत साबित हुआ, बेटा उसकी उम्मीद से ज्यादा भावनात्मक रूप से ढीट और बलशाली था, खींचा-तानी में बेटे का बैलेंस बिगड़ा, गिरते बेटे ने वही किया जो वो पिछले 18 साल से करता आ रहा था, (बाप का सपोर्ट लेना), और उसने सपोर्ट लेने के चक्कर में अपने साथ बाप को भी खाई में खींच लिया। मां जो पहले ही बेटे को मनाने के लिए अपना मंगलसूत्र देने की पेशकश कर रही थी, इस दृश्य को देखकर कुछ समझ नहीं सकी, और बदहवासी में 1-2 सेकंड बाद उसने भी खाई में जंप लगा दी। पूरा परिवार एक आईफोन की सनक में कॉल के ग्रास में चले गए।। गलती किसकी है: 1. आईफोन के...
प्रशांत महासागर के हज़ारों फीट की ऊंचाई पर एक एयरबस 380 सैकड़ों यात्रियों के साथ उड़ रही थी। अचानक दो फाइटर प्लेन आसमान में दिखाई दिए और इस जहाज़ की तरफ उड़ने लगे। जब रेडियो संपर्क हुआ तो लड़ाकू विमान के एक युवा पायलट ने एयरबस के बुजुर्ग पायलट से कहा, 'कितनी बोरिंग फ्लाइट है तुम्हारी। देखो, मैं आपकी इस उड़ान को दिलचस्प बना देता हूँ!
यह कहने के बाद, उसने अचानक गति पकड़ ली और एयरबस के चारों ओर तब तक कलाबाज़ियाँ दिखाता रहा,जब तक समुद्र का स्तर निकट नहीं आया, वहां से यह ऊपर गया, साउंड बैरियर को तोड़ दिया, मुड़ गया और एयरबस की तरफ आ गया। उत्तेजित स्वर में उसने फिर पूछा कैसा लगा?
एयरबस पायलट ने कहा कि यह कुछ भी नहीं है। अब आप देखिए मैं क्या दिखाता हूं। दोनों युद्धपोत देखने लगे। समय बीत रहा था लेकिन विमान सीधा उड़ रहा था। काफी समय बाद एयरबस के सीनियर पायलट का एक रेडियो संदेश आया जिसमें पूछा गया कि आपको कैसा लगा? युवा फाइटर पायलट ने कहा, "लेकिन बॉस, आपने क्या किया है?" ?
एयरबस के पायलट ने कहा, मैं बाथरूम गया था। रास्ते में कुछ लोगों से बातचीत हुई। फिर मैंने शांति से खड़े होकर चॉकलेट कॉफी पी और अब मैं वापस आ गया हूं। क्या आप यह कर सकते हैं?
नौजवानी का दौर बस ऐसे ही होता है। दूसरों के वाह-वाह के पीछे तमाशा दिखाना तमाशा बन जाता है। जब यह दौर बीत जाता है, तब पता चलता है कि उन लोगों को प्रभावित करने की कोशिश में कितना समय बर्बाद हुआ, जिनकी कोई अहमियत नहीं थी।
अपनी ऊर्जा, अपनी तवानाई संभालकर रखने वाले के कम से कम कल के पछतावे कम होते।
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