इस साल बाज़ार में जितने जामुन दिखाई दे रहे हैं, उतने मैंने पिछले दो दशकों में कभी नहीं देखे। जामुन के अक्षरशः ढेर लग रहे हैं (नीचे गिर रहे हैं)। जिन पेड़ों पर पिछले साल इक्का-दुक्का फल आए थे, वे पेड़ भी इस बार जामुन से पटे पड़े हैं। जहाँ फल आए थे, वहाँ अब उन का अंबार लगना शुरू हो गया है। आखिर यह सब क्या चल रहा है? हमारी दादी/नानी हमेशा कहती थीं कि, "जिस गर्मियों में जामुन के ऐसे ढेर लगते हैं, उस साल सूखा पड़ता है।" बुजुर्गों का यह पारंपरिक ज्ञान वनस्पति विज्ञान (Botany) के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बिल्कुल सही और सटीक है। विज्ञान में इस दिलचस्प और उतनी ही चौंकाने वाली प्रक्रिया को "मास्टिंग" (Masting) या "स्ट्रेस फ्रूटिंग" (Stress Fruiting) कहा जाता है। पेड़ों द्वारा खुद को खत्म करके ज्यादा से ज्यादा फल देने के इस आखिरी प्रयास को कभी-कभी "सुसाइड फ्रूटिंग" (Suicide Fruiting) या "बंपर क्रॉप" भी कहा जाता है। यह असल में क्या है और इसके पीछे का विज्ञान क्या कहता है, आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं: १. 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट' (अस्ति...
प्रशांत महासागर के हज़ारों फीट की ऊंचाई पर एक एयरबस 380 सैकड़ों यात्रियों के साथ उड़ रही थी। अचानक दो फाइटर प्लेन आसमान में दिखाई दिए और इस जहाज़ की तरफ उड़ने लगे। जब रेडियो संपर्क हुआ तो लड़ाकू विमान के एक युवा पायलट ने एयरबस के बुजुर्ग पायलट से कहा, 'कितनी बोरिंग फ्लाइट है तुम्हारी। देखो, मैं आपकी इस उड़ान को दिलचस्प बना देता हूँ!
यह कहने के बाद, उसने अचानक गति पकड़ ली और एयरबस के चारों ओर तब तक कलाबाज़ियाँ दिखाता रहा,जब तक समुद्र का स्तर निकट नहीं आया, वहां से यह ऊपर गया, साउंड बैरियर को तोड़ दिया, मुड़ गया और एयरबस की तरफ आ गया। उत्तेजित स्वर में उसने फिर पूछा कैसा लगा?
एयरबस पायलट ने कहा कि यह कुछ भी नहीं है। अब आप देखिए मैं क्या दिखाता हूं। दोनों युद्धपोत देखने लगे। समय बीत रहा था लेकिन विमान सीधा उड़ रहा था। काफी समय बाद एयरबस के सीनियर पायलट का एक रेडियो संदेश आया जिसमें पूछा गया कि आपको कैसा लगा? युवा फाइटर पायलट ने कहा, "लेकिन बॉस, आपने क्या किया है?" ?
एयरबस के पायलट ने कहा, मैं बाथरूम गया था। रास्ते में कुछ लोगों से बातचीत हुई। फिर मैंने शांति से खड़े होकर चॉकलेट कॉफी पी और अब मैं वापस आ गया हूं। क्या आप यह कर सकते हैं?
नौजवानी का दौर बस ऐसे ही होता है। दूसरों के वाह-वाह के पीछे तमाशा दिखाना तमाशा बन जाता है। जब यह दौर बीत जाता है, तब पता चलता है कि उन लोगों को प्रभावित करने की कोशिश में कितना समय बर्बाद हुआ, जिनकी कोई अहमियत नहीं थी।
अपनी ऊर्जा, अपनी तवानाई संभालकर रखने वाले के कम से कम कल के पछतावे कम होते।
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