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Madness for Iphone

​ *आखिर जा कहां रहा है हमारा समाज..* महाराष्ट्र के निम्न मध्यम वर्गीय मां-बाप ने अपनी इकलौती संतान को जैसे-तैसे पाल पोसकर 18 साल का किया। अब उस बेटे को आईफोन की सनक जग गई, पहाड़ के किनारे खड़े होकर 3 घंटे का फुल वोल्टेज ड्रामा चला। संभवतः सभी को लगा होगा कि ड्रामा कर रहा है, इसी बीच बाप सामने आया, शायद उसे अपने भावनात्मक और शारीरिक बल पर भरोसा रहा होगा, कि या तो मैं अपने बेटे को प्यार/डांट से मना/धमका लूंगा, नहीं तो ताकत का प्रयोग करके उसे किनारे से खींच लाऊंगा। बाप का दांव गलत साबित हुआ, बेटा उसकी उम्मीद से ज्यादा भावनात्मक रूप से ढीट और बलशाली था, खींचा-तानी में बेटे का बैलेंस बिगड़ा, गिरते बेटे ने वही किया जो वो पिछले 18 साल से करता आ रहा था, (बाप का सपोर्ट लेना), और उसने सपोर्ट लेने के चक्कर में अपने साथ बाप को भी खाई में खींच लिया। मां जो पहले ही बेटे को मनाने के लिए अपना मंगलसूत्र देने की पेशकश कर रही थी, इस दृश्य को देखकर कुछ समझ नहीं सकी, और बदहवासी में 1-2 सेकंड बाद उसने भी खाई में जंप लगा दी। पूरा परिवार एक आईफोन की सनक में कॉल के ग्रास में चले गए।। गलती किसकी है: 1. आईफोन के...

Religious Norrowness: My Views

Ahamadiya


पाकिस्तान में अहमदिया कम्यूनिटी भी मुसलमान ही हैं, लेकिन उनके पूजा पद्धति के कारण शिया और सुन्नी उन्हें मुसलमान नहीं मानते। प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक में भी पूजा पद्धति को लेकर ही लड़ाई हुई है। बौद्धों के महायान और हीनयान में भी उपासना पद्धति को लेकर ही विभाजन हुआ था। जैनों के दिगंबर और श्वेतांबर में भी यही भेद था। 


लोग आज सनातन के पूजा पद्धति को एकरूप मानने लगे हैं लेकिन लोग भूल गए हैं की कुछ सदी पहले तक सनातन में भी शैव, शाक्त, वैष्णव, कर्मकांडी का विभाजन था। विष्णु की पूजा करने वाले शिव को त्याज्य मानते थे, कोई देवी की पूजा करते थे तो कोई इंद्र सूर्य यम अग्नि जैसे वैदिक देवताओं की। इतिहास में कई बार तो इसके लिए युद्ध और उत्पीड़न तक हुआ है। लेकिन समय के चक्र और सनातन के समन्वयि व्यवहार की वजह से ये सभी देवता सबके कॉमन देवता हो गए और सब लोग सभी देवताओं की पूजा करने लग गए। लेकिन फिर भी स्थान विशेष पर अलग अलग देवताओं की महत्ता बरकरार रही। 


इतिहास में मैथिल मूल रूप से शैव एवम शाक्त ही रहे हैं। ऐतिहासिक रूप से राम एवं कृष्ण की पूजा यहां अपेक्षाकृत कम ही हुई। उत्तरी भारत में गंगा और हिमालय मध्य के बेल्ट को यदि आप देखें तो यह सनातन के अलग-अलग पूजा पद्धतियों का क्षेत्र रहा है। ये पैटर्न आपको मैप देखने पे साधारण तौर पर ही दिख जाएगा। ब्रज कृष्ण का, अवध राम का, काशी महादेव का, मिथिला महादेव एवम शक्ति का, बंगाल-आसाम शक्ति (दुर्गा-काली) का। ऐतिहासिक रूप से ही शिव मंदिर मिथिला के गांव-गांव में रहा है। गांव-गांव में दुर्गा, काली, सरस्वती की पूजा होती रही है। शैव और शाक्त परंपरा का प्रभाव यहां के भोजन पर भी है, वैष्णव परंपरा के तरह मांसाहार यहां के भोजन में त्याज्य नहीं है। यहां तक मैथिल ब्राह्मण भी मांसाहार करते हैं। यहां के संगीत एवं साहित्य पर शैव एवम शाक्त परंपरा का ही प्रभाव है। मैथिली में यदि पारंपरिक गीतों एवम भजनों को गौर करें तो सर्वाधिक भजन भोला बाबा का नचारी, महेशवाणी अथवा जगदम्बा का गीत ही मिलेगा। इसके उल्टा राम अथवा कृष्ण पर लिखा कोई बेहद पुराना मैथिली भजन शायद ही आपको मिले। 


सच तो यह है की सीता को दुबारा त्यागने के कारण राम को मैथिल कभी माफ ही नहीं कर पाए। स्नेहलता लिखित कुंज बिहारी के गाए रामसिया विवाह गीत से पहले मिथिला के विवाह में शायद ही कोई गीत रामसीता विवाह से संबंधित बजता था। विध विधान में भी गौरी पूजने, शंकर परिक्रमा सहित शिव-पार्वती विवाह से संबंधित विधान अधिक उपयोग किया जाता है। राम मिथिला के लिए एक दुखती रग थे, एक ऐसा जमाय जो हमारे सिया धिया संग न्याय नहीं कर सका। कहा जाता है की सीता पूनर्तेजन के बाद मैथिलों ने अपनी बेटी का नाम सीता रखना बंद कर दिया था की कहीं उसका भाग्य भी सीता की तरह वनवासिनी वाला ना हो जाए, मैथिलों ने अवध की तरफ अपनी बेटी ब्याहनी बंद कर दी थी। पढ़ने में आश्चर्य लग सकता है लेकिन 2 सदी पहले तक मिथिला के गांवों में राम मंदिर लगभग नहीं के बराबर था। तुलसीदास के रामचरितमानस के लोकप्रियता के बाद 18 वीं- 19 वीं शताब्दी में अयोध्या के तरफ से रामनामी संतों का रामनाम प्रचार में आना-जाना शुरू हुआ, उन्होंने शिष्य बनाए, रामनाम मंत्र दिया, रामनामी कंठी बांधनी शुरू की। उनके साथ ही मिथिला में अष्ट्याम और नवाह की परंपरा आई। इस दरम्यान ही मिथिला में राम के मंदिरों का निर्माण का कार्य शुरू हुआ। फिर भी लोगों ने विष्णु रूप में राम मंदिर नहीं बल्कि रामजानकी मंदिर बनवाया। बाद के 19 वीं-20 वीं सदी में रामलीला मंचन का कार्यक्रम वृहत्तर रूप लेता गया और फिर टीवी आने के बाद रामानंद सागर के रामायण सीरियल ने इसको और बढ़ाया। देश में राम के नाम पर हो राजनीति का भी प्रभाव हुआ और इन क्रमागत चरणों का परिणाम है की आज मिथिला भी पूजन पद्धति में देश के लगभग समतल ही दिखता है। 


मिथिला में ऐतिहासिक रूप से प्रसिद्ध कोई भी मंदिर का नाम सोचिए, गौर कीजिए वो महादेव अथवा देवी मंदिर ही होगा। 


मान लीजिए, 15 वर्ष की उम्र में मैंने शाकाहार अपना लिया था, पिछले डेढ़ दशक में मैंने मांसाहार नहीं किया है लेकिन मैं ये नहीं कह सकता की तंत्र पूजा पद्धति में बलि प्रथा गलत है या नहीं होना चाहिए। अपने विश्वास अथवा बिलीफ को किसी और पे थोपना सनातन विचार नहीं है। यह अब्राहमिक थॉट है की जिस चीज को मैं मानता हूं केवल वही सही है और सबको वही करना चाहिए। 


ख़बर आई है की दरभंगा में श्मशान भूमि पर बने मां काली के प्रसिद्ध तंत्र मंदिर श्यामा मंदिर में बलि पर रोक लगा दी गई है। कहा जा रहा है की यह बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद के आदेश पर किया गया है। यह एक भयावह बात है की श्मशान भूमि पर तंत्र उपासना के लिए बने काली के मंदिर पर भी बलि की रोक लगाई है। वो काली जो शक्ति का उग्र स्वरूप है, जिन्होंने रक्तबीज का रक्त और मांस खाया था, उन्हें भी वैष्णव बनाने का प्रयास हो रहा है। तंत्र में काली की पूजा कहीं मत्स्य और मांस के हो ? यह संभव ही नहीं है। मद्य, मांस, मदिरा, मत्स्य और मैथुन ये तंत्र के पंचमकार माने गए हैं। इनके साधना के अतिरिक्त तंत्र साधना संभव ही नहीं है। 

Kali maa


आपको वैष्णव बनना है, आप विष्णु मंदिर जाइए, शिव मंदिर जाइए, गणेश-हनुमान अथवा कोई भी वैदिक या पौराणिक देवता का मंदिर जाइए। ये कौन सी बात हुई की चूंकि आप वैष्णव हैं और आपको देवी मंदिर भी जाना है और इसलिए आप देवी को भी वैष्णव कर देंगे ? ये तो उतना ही खतरनाक है की जैसे सुन्नी कहें की अहमदिया भी सुन्नी हो जाएं।

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