सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कर्म फल तो भोगना ही पड़ेगा

 महाभारत के भयंकर नरसंहार के बाद पुत्र-वियोग में तड़पती गांधारी जब श्रीकृष्ण को शाप देने के लिए आगे बढ़ती हैं, तब श्रीकृष्ण शांत स्वर में कहते हैं— माते!  मैं शोक, मोह और पीड़ा—इन सबसे परे हूँ, न मुझे विजय का गर्व है, न पराजय का विषाद, न मुझे सम्मान बाँधता है, न अपमान। न जीवन, न मृत्यु—किसी में मैं आबद्ध नहीं हूँ। मैं न सत्य में बँधा हूँ, न असत्य में.. काल और महाकाल—दोनों मेरे अधीन हैं; मैं उन्हीं के माध्यम से अपने कार्य सिद्ध कराता हूँ। हे माता, यह युद्ध अवश्यम्भावी था। जो चले गए हैं, उनके लिए विलाप मत करो। जो शेष हैं—उन्हें स्वीकारो। वर्तमान को अपनाओ, क्योंकि अतीत का शोक ही दुख का मूल है.. कृष्ण की वाणी सुनकर गांधारी विलाप करती हुई कह उठती हैं.. कृष्ण…! तुम यह सब कह सकते हो, क्योंकि तुम माँ नहीं हो। तुम क्या जानो एक माँ की ममता क्या होती है? तुम क्या समझो पुत्र-शोक की असहनीय पीड़ा? तुम मोह-त्याग और ज्ञान की बातें करते हो, तो जाओ—अपनी माता देवकी से पूछो कि पुत्र-वियोग क्या होता है! पूछना उनसे— कैसा लगता था जब कंस एक-एक कर उसके कलेजे के टुकड़े छीन लेता था.. जब उसका दूध उतरता थ...

Religious Norrowness: My Views

Ahamadiya


पाकिस्तान में अहमदिया कम्यूनिटी भी मुसलमान ही हैं, लेकिन उनके पूजा पद्धति के कारण शिया और सुन्नी उन्हें मुसलमान नहीं मानते। प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक में भी पूजा पद्धति को लेकर ही लड़ाई हुई है। बौद्धों के महायान और हीनयान में भी उपासना पद्धति को लेकर ही विभाजन हुआ था। जैनों के दिगंबर और श्वेतांबर में भी यही भेद था। 


लोग आज सनातन के पूजा पद्धति को एकरूप मानने लगे हैं लेकिन लोग भूल गए हैं की कुछ सदी पहले तक सनातन में भी शैव, शाक्त, वैष्णव, कर्मकांडी का विभाजन था। विष्णु की पूजा करने वाले शिव को त्याज्य मानते थे, कोई देवी की पूजा करते थे तो कोई इंद्र सूर्य यम अग्नि जैसे वैदिक देवताओं की। इतिहास में कई बार तो इसके लिए युद्ध और उत्पीड़न तक हुआ है। लेकिन समय के चक्र और सनातन के समन्वयि व्यवहार की वजह से ये सभी देवता सबके कॉमन देवता हो गए और सब लोग सभी देवताओं की पूजा करने लग गए। लेकिन फिर भी स्थान विशेष पर अलग अलग देवताओं की महत्ता बरकरार रही। 


इतिहास में मैथिल मूल रूप से शैव एवम शाक्त ही रहे हैं। ऐतिहासिक रूप से राम एवं कृष्ण की पूजा यहां अपेक्षाकृत कम ही हुई। उत्तरी भारत में गंगा और हिमालय मध्य के बेल्ट को यदि आप देखें तो यह सनातन के अलग-अलग पूजा पद्धतियों का क्षेत्र रहा है। ये पैटर्न आपको मैप देखने पे साधारण तौर पर ही दिख जाएगा। ब्रज कृष्ण का, अवध राम का, काशी महादेव का, मिथिला महादेव एवम शक्ति का, बंगाल-आसाम शक्ति (दुर्गा-काली) का। ऐतिहासिक रूप से ही शिव मंदिर मिथिला के गांव-गांव में रहा है। गांव-गांव में दुर्गा, काली, सरस्वती की पूजा होती रही है। शैव और शाक्त परंपरा का प्रभाव यहां के भोजन पर भी है, वैष्णव परंपरा के तरह मांसाहार यहां के भोजन में त्याज्य नहीं है। यहां तक मैथिल ब्राह्मण भी मांसाहार करते हैं। यहां के संगीत एवं साहित्य पर शैव एवम शाक्त परंपरा का ही प्रभाव है। मैथिली में यदि पारंपरिक गीतों एवम भजनों को गौर करें तो सर्वाधिक भजन भोला बाबा का नचारी, महेशवाणी अथवा जगदम्बा का गीत ही मिलेगा। इसके उल्टा राम अथवा कृष्ण पर लिखा कोई बेहद पुराना मैथिली भजन शायद ही आपको मिले। 


सच तो यह है की सीता को दुबारा त्यागने के कारण राम को मैथिल कभी माफ ही नहीं कर पाए। स्नेहलता लिखित कुंज बिहारी के गाए रामसिया विवाह गीत से पहले मिथिला के विवाह में शायद ही कोई गीत रामसीता विवाह से संबंधित बजता था। विध विधान में भी गौरी पूजने, शंकर परिक्रमा सहित शिव-पार्वती विवाह से संबंधित विधान अधिक उपयोग किया जाता है। राम मिथिला के लिए एक दुखती रग थे, एक ऐसा जमाय जो हमारे सिया धिया संग न्याय नहीं कर सका। कहा जाता है की सीता पूनर्तेजन के बाद मैथिलों ने अपनी बेटी का नाम सीता रखना बंद कर दिया था की कहीं उसका भाग्य भी सीता की तरह वनवासिनी वाला ना हो जाए, मैथिलों ने अवध की तरफ अपनी बेटी ब्याहनी बंद कर दी थी। पढ़ने में आश्चर्य लग सकता है लेकिन 2 सदी पहले तक मिथिला के गांवों में राम मंदिर लगभग नहीं के बराबर था। तुलसीदास के रामचरितमानस के लोकप्रियता के बाद 18 वीं- 19 वीं शताब्दी में अयोध्या के तरफ से रामनामी संतों का रामनाम प्रचार में आना-जाना शुरू हुआ, उन्होंने शिष्य बनाए, रामनाम मंत्र दिया, रामनामी कंठी बांधनी शुरू की। उनके साथ ही मिथिला में अष्ट्याम और नवाह की परंपरा आई। इस दरम्यान ही मिथिला में राम के मंदिरों का निर्माण का कार्य शुरू हुआ। फिर भी लोगों ने विष्णु रूप में राम मंदिर नहीं बल्कि रामजानकी मंदिर बनवाया। बाद के 19 वीं-20 वीं सदी में रामलीला मंचन का कार्यक्रम वृहत्तर रूप लेता गया और फिर टीवी आने के बाद रामानंद सागर के रामायण सीरियल ने इसको और बढ़ाया। देश में राम के नाम पर हो राजनीति का भी प्रभाव हुआ और इन क्रमागत चरणों का परिणाम है की आज मिथिला भी पूजन पद्धति में देश के लगभग समतल ही दिखता है। 


मिथिला में ऐतिहासिक रूप से प्रसिद्ध कोई भी मंदिर का नाम सोचिए, गौर कीजिए वो महादेव अथवा देवी मंदिर ही होगा। 


मान लीजिए, 15 वर्ष की उम्र में मैंने शाकाहार अपना लिया था, पिछले डेढ़ दशक में मैंने मांसाहार नहीं किया है लेकिन मैं ये नहीं कह सकता की तंत्र पूजा पद्धति में बलि प्रथा गलत है या नहीं होना चाहिए। अपने विश्वास अथवा बिलीफ को किसी और पे थोपना सनातन विचार नहीं है। यह अब्राहमिक थॉट है की जिस चीज को मैं मानता हूं केवल वही सही है और सबको वही करना चाहिए। 


ख़बर आई है की दरभंगा में श्मशान भूमि पर बने मां काली के प्रसिद्ध तंत्र मंदिर श्यामा मंदिर में बलि पर रोक लगा दी गई है। कहा जा रहा है की यह बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद के आदेश पर किया गया है। यह एक भयावह बात है की श्मशान भूमि पर तंत्र उपासना के लिए बने काली के मंदिर पर भी बलि की रोक लगाई है। वो काली जो शक्ति का उग्र स्वरूप है, जिन्होंने रक्तबीज का रक्त और मांस खाया था, उन्हें भी वैष्णव बनाने का प्रयास हो रहा है। तंत्र में काली की पूजा कहीं मत्स्य और मांस के हो ? यह संभव ही नहीं है। मद्य, मांस, मदिरा, मत्स्य और मैथुन ये तंत्र के पंचमकार माने गए हैं। इनके साधना के अतिरिक्त तंत्र साधना संभव ही नहीं है। 

Kali maa


आपको वैष्णव बनना है, आप विष्णु मंदिर जाइए, शिव मंदिर जाइए, गणेश-हनुमान अथवा कोई भी वैदिक या पौराणिक देवता का मंदिर जाइए। ये कौन सी बात हुई की चूंकि आप वैष्णव हैं और आपको देवी मंदिर भी जाना है और इसलिए आप देवी को भी वैष्णव कर देंगे ? ये तो उतना ही खतरनाक है की जैसे सुन्नी कहें की अहमदिया भी सुन्नी हो जाएं।

टिप्पणियाँ

Best From the Author

जब रामानुजन ने मजे मजे में दुनिया के सबसे बड़े गणितज्ञ को हैरान कर दिया| Hardy-Ramanujan-Number

जब रामानुजन ने मजे मजे में दुनिया के सबसे बड़े गणितज्ञ को हैरान कर दिया| Hardy-Ramanujan-Number "The Man who Knew The Infiniy"; लेकिन श्रीनिवास रामानुजन तो वह महापुरुष थे जो Infinity से आगे का भी जानते थे।  उन्होंने अपनी शोध एवं पत्र से 3900 से अधिक परिणाम प्राप्त किए। हालांकि जिज्ञासु लोग (जैसे कि मैं) और गणित में मन रमाने वाले उन्हें हार्डी रामानुजन संख्या के लिए भी जानते हैं। आखिर क्या है Hardy-Ramanujan-Number हार्डी रामानुजन संख्या की खोज अचानक से बैठे-बिठाए हो गई थी। हुआ यूं था कि ब्रिटेन के जाने-माने गणितज्ञ GH Hardy अस्वस्थ Ramanujan को अस्पताल में मिलने गए थे। यह किस्सा रामानुजन की जीवनी The Man who knew Infenity में Robert Knaigel लिखते हैं।      हार्डी ने अस्वस्थ रामानुजन को चुटकी लेते हुए कहा कि वह जिस टैक्सी में उनसे मिलने आए हैं, उसका नंबर अंत में 1729 था। जो कि एक अशुभ संख्या है। यह संख्या किसी अन्य संख्या से नहीं कटती, अतः यह एक अभाज्य अशुभ संख्या हुई।  Taxi No. 1729 जिसके जवाब में रामानुजन ने तुरंत कहा जी ऐसा बिल्कुल नहीं है। असल में 1729 बहुत...

नौजवानी vs अनुभव

प्रशांत महासागर के हज़ारों फीट की ऊंचाई पर एक एयरबस 380 सैकड़ों यात्रियों के साथ उड़ रही थी। अचानक दो फाइटर प्लेन आसमान में दिखाई दिए और इस जहाज़ की तरफ उड़ने लगे। जब रेडियो संपर्क हुआ तो लड़ाकू विमान के एक युवा पायलट ने एयरबस के बुजुर्ग पायलट से कहा, 'कितनी बोरिंग फ्लाइट है तुम्हारी। देखो, मैं आपकी इस उड़ान को दिलचस्प बना देता हूँ! यह कहने के बाद, उसने अचानक गति पकड़ ली और एयरबस के चारों ओर तब तक कलाबाज़ियाँ दिखाता रहा,जब तक समुद्र का स्तर निकट नहीं आया, वहां से यह ऊपर गया, साउंड बैरियर को तोड़ दिया, मुड़ गया और एयरबस की तरफ आ गया। उत्तेजित स्वर में उसने फिर पूछा कैसा लगा? एयरबस पायलट ने कहा कि यह कुछ भी नहीं है। अब आप देखिए मैं क्या दिखाता हूं। दोनों युद्धपोत देखने लगे। समय बीत रहा था लेकिन विमान सीधा उड़ रहा था। काफी समय बाद एयरबस के सीनियर पायलट का एक रेडियो संदेश आया जिसमें पूछा गया कि आपको कैसा लगा? युवा फाइटर पायलट ने कहा, "लेकिन बॉस, आपने क्या किया है?" ? एयरबस के पायलट ने कहा, मैं बाथरूम गया था। रास्ते में कुछ लोगों से बातचीत हुई। फिर मैंने शांति से खड़े...

पार्टी में ओपन सोडा पीने से पहले एक बार सोच ले, महिलाएं जरूर पढ़ें ।।What is Rhypnol, be aware of Party drug, female readers must know about this।। Abiiinabu।।

What is Rhypnol, be aware of Party drug, female readers must know about this।। Abiiinabu।।पार्टी में ओपन सोडा पीने से पहले एक बार सोच ले, महिलाएं जरूर पढ़ें  कुछ दिनों से सोच रहा था कि कुछ ऐसा लिखूं, जिससे मुझे संतुष्टि और आपको फायदा दोनो मिलें यही सोचते सोचते न्यूज वाली एप्लीकेशन ( नाम नहीं बताऊंगा ऊ काहे कि नाम लिखने का पैसा नही दिया है उन्होंने) स्क्रॉल कर रहा था। वहां एक न्यूज देखी तो स्तब्ध रह गया। मतलब मुझे न्यूज में महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों की खबरें पढ़ने की आदत सी हो चली थी, लेकिन इसको पढ़ कर दिल में बस दो ही बातें आईं।  पहली तो ये कि ऐसा कैसे हो सकता है। और दूसरी ये कि कोई इतना नीच कैसे हो सकता है। दोनो का सार भी बताऊंगा लेकिन बाद में, पहले आप लोग खबर सुनो, खबर ये थी कि किसी शहर में दोस्तों के साथ पार्टी कर रही लड़की के साथ चार लड़कों ने कुकृत्य किया। लेकिन इसमें चौंकाने वाली बात ये कि लड़की को पता ही नही था कि उसके साथ ऐसा किया जा चुका है। ना शरीर पर चोटों के निशान, ना नाखून की खरोंचें, और ना शोर शराबा। एक बार को तो लगा की लड़की झूठ बोल रही है, ले...

कर्म फल तो भोगना ही पड़ेगा

 महाभारत के भयंकर नरसंहार के बाद पुत्र-वियोग में तड़पती गांधारी जब श्रीकृष्ण को शाप देने के लिए आगे बढ़ती हैं, तब श्रीकृष्ण शांत स्वर में कहते हैं— माते!  मैं शोक, मोह और पीड़ा—इन सबसे परे हूँ, न मुझे विजय का गर्व है, न पराजय का विषाद, न मुझे सम्मान बाँधता है, न अपमान। न जीवन, न मृत्यु—किसी में मैं आबद्ध नहीं हूँ। मैं न सत्य में बँधा हूँ, न असत्य में.. काल और महाकाल—दोनों मेरे अधीन हैं; मैं उन्हीं के माध्यम से अपने कार्य सिद्ध कराता हूँ। हे माता, यह युद्ध अवश्यम्भावी था। जो चले गए हैं, उनके लिए विलाप मत करो। जो शेष हैं—उन्हें स्वीकारो। वर्तमान को अपनाओ, क्योंकि अतीत का शोक ही दुख का मूल है.. कृष्ण की वाणी सुनकर गांधारी विलाप करती हुई कह उठती हैं.. कृष्ण…! तुम यह सब कह सकते हो, क्योंकि तुम माँ नहीं हो। तुम क्या जानो एक माँ की ममता क्या होती है? तुम क्या समझो पुत्र-शोक की असहनीय पीड़ा? तुम मोह-त्याग और ज्ञान की बातें करते हो, तो जाओ—अपनी माता देवकी से पूछो कि पुत्र-वियोग क्या होता है! पूछना उनसे— कैसा लगता था जब कंस एक-एक कर उसके कलेजे के टुकड़े छीन लेता था.. जब उसका दूध उतरता थ...

Bageshwar Baba Controversy

नालंदा! तात्कालिक विश्व का सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय! कहते हैं, संसार में तब जितना भी ज्ञान था, वहाँ सबकी शिक्षा दीक्षा होती थी। सारी दुनिया से लोग आते थे ज्ञान लेने... बौद्धिकता का स्तर वह कि बड़े बड़े विद्वान वहाँ द्वारपालों से पराजित हो जाते थे। पचास हजार के आसपास छात्र और दो हजार के आसपास गुरुजन! सन 1199 में मात्र दो हजार सैनिकों के साथ एक लुटेरा घुसा और दिन भर में ही सबको मार काट कर निकल गया। दुनिया के सर्वश्रेष्ठ शिक्षक और उनके बीस हजार छात्र मात्र दो सौ लुटेरों से भी नहीं जूझ सके। छह महीने तक नालंदा के पुस्तकालय की पुस्तकें जलती रहीं।      कुस्तुन्तुनिया! अपने युग के सबसे भव्य नगरों में एक, बौद्धिकों, वैज्ञानिकों, दार्शनिकों की भूमि! क्या नहीं था वहाँ, भव्य पुस्तकालय, मठ, चर्च महल... हर दृष्टि से श्रेष्ठ लोग निवास करते थे। 1455 में एक इक्कीस वर्ष का युवक घुसा और कुस्तुन्तुनिया की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल गयी। सबकुछ तहस नहस हो गया। बड़े बड़े विचारक उन लुटेरों के पैरों में गिर कर गिड़गिड़ाते रहे, और वह हँस हँस कर उनकी गर्दन उड़ाता रहा। कुस्तुन्तुनिया का पतन हो ग...