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प्रेमचंद के फटे जूते

  प्रेमचंद का एक चित्र मेरे सामने है, पत्नी के साथ फ़ोटो खिंचा रहे हैं. सिर पर किसी मोटे कपड़े की टोपी, कुरता और धोती पहने हैं. कनपटी चिपकी है, गालों की हड्डियां उभर आई हैं, पर घनी मूंछें चेहरे को भरा-भरा बतलाती हैं. पांवों में केनवस के जूते हैं, जिनके बंद बेतरतीब बंधे हैं. लापरवाही से उपयोग करने पर बंद के सिरों पर की लोहे की पतरी निकल जाती है और छेदों में बंद डालने में परेशानी होती है. तब बंद कैसे भी कस लिए जाते हैं. दाहिने पांव का जूता ठीक है, मगर बाएं जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अंगुली बाहर निकल आई है. मेरी दृष्टि इस जूते पर अटक गई है. सोचता हूं-फ़ोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी-इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है. यह जैसा है, वैसा ही फ़ोटो में खिंच जाता है. मैं चेहरे की तरफ़ देखता हूं. क्या तुम्हें मालूम है, मेरे साहित्यिक पुरखे कि तुम्हारा जूता फट गया है और अंगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हें इसका ज़रा भी अहसास नहीं है? ज़रा लज्जा, संकोच या झेंप नहीं है? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि धोती को थोड़ा न...

Kashi ka Assi Book Review

Kashi ka Assi


**किताब समीक्षा: "काशी का अस्सी"**


**लेखक**: काशीनाथ सिंह  

**शैली**: व्यंग्यात्मक कथा साहित्य  

**प्रकाशन वर्ष**: 2004


"काशी का अस्सी" हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण और चर्चित उपन्यास है, जिसे काशीनाथ सिंह ने लिखा है। यह किताब बनारस की जीवनशैली, वहाँ की संस्कृति और आम जनमानस की भाषा और बोलचाल का जीवंत चित्रण करती है। किताब का केंद्र बनारस का प्रसिद्ध अस्सी घाट है, जो सिर्फ एक भौगोलिक स्थल नहीं, बल्कि बनारसी जीवन का प्रतीक है।


### **कहानी का सारांश**:

कहानी अस्सी घाट के इर्द-गिर्द घूमती है, जहाँ विभिन्न तबकों के लोग बैठकर बातचीत, बहस और ठहाके लगाते हैं। यह बनारसी समाज की धड़कनों को पकड़ता है। किताब में कई पात्र हैं, जिनमें मुख्यत: पंडित, टीकाकार, शिक्षक, छात्र, नौकरीपेशा लोग और साधारण नागरिक शामिल हैं। हर व्यक्ति का अपना दृष्टिकोण और जीवन के प्रति अपने अनुभव होते हैं, जो किताब को वास्तविक और मजेदार बनाते हैं।


**काशी का अस्सी** में अस्सी घाट के पंडों और स्थानीय निवासियों के रोजमर्रा के जीवन को बड़े ही सजीव और व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है। काशी का परंपरागत, धार्मिक और सांस्कृतिक पक्ष इस उपन्यास में गहराई से उभरकर सामने आता है।


### **शैली और भाषा**:

काशीनाथ सिंह ने इस उपन्यास में आम बोलचाल की भाषा का उपयोग किया है, जिसमें बनारसी बोली का खासा प्रभाव देखने को मिलता है। यह भाषा पात्रों को जीवंत बनाती है और पाठक को बनारस के जीवन में डुबो देती है। उनकी शैली इतनी सहज और व्यंग्यात्मक है कि गंभीर मुद्दों को भी हंसी-हंसी में कह जाती है। लेखक ने समकालीन राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य पर भी करारा व्यंग्य किया है, जो किताब को और गहराई देता है।


### **मुख्य विषय**:

"काशी का अस्सी" केवल एक स्थान या समुदाय की कहानी नहीं है; यह आधुनिक भारतीय समाज और उसकी विडंबनाओं का भी आईना है। कहानी के पात्र अस्सी घाट पर बैठकर जीवन, राजनीति, धर्म और समाज पर चर्चा करते हैं। यह किताब धर्म और परंपराओं की आड़ में छिपे पाखंड और राजनीतिकरण पर भी गहरा कटाक्ष करती है। इसमें बनारस की पुरानी संस्कृति और नई पीढ़ी के बीच टकराव को भी सजीव रूप से दर्शाया गया है।


### **व्यंग्य की ताकत**:

उपन्यास का सबसे बड़ा आकर्षण इसका व्यंग्य है। काशीनाथ सिंह ने बड़े ही चुटीले अंदाज में समाज की विडंबनाओं और राजनीति की खामियों पर प्रहार किया है। अस्सी घाट की बैठकी, जिसमें सबकुछ बहस का विषय होता है, उसमें लेखक ने बेहद सजीव और सटीक संवाद लिखे हैं। हर पात्र के माध्यम से समाज का कोई न कोई पहलू सामने आता है, जिसे हास्य और व्यंग्य के साथ प्रस्तुत किया गया है।


### **पात्रों का चित्रण**:

उपन्यास में कई महत्वपूर्ण पात्र हैं, जो पाठकों को जीवन से जुड़े हुए लगते हैं। हर पात्र की अपनी अनोखी पहचान और जीवन दृष्टि है। ये पात्र आपको किसी न किसी रूप में वास्तविक जीवन से जुड़े हुए प्रतीत होते हैं। चाहे वह पंडित हों, जो धर्म और राजनीति की चर्चा में लगे रहते हैं, या फिर नौजवान, जो नए भारत की बात करते हैं – हर कोई अपनी जगह सटीक बैठता है।


### **क्यों पढ़ें?**:

यदि आप बनारस की संस्कृति, उसकी बोली-बानी, वहाँ के लोगों की सोच और उनके जीवन को समझना चाहते हैं, तो "काशी का अस्सी" एक बेहतरीन किताब है। यह न केवल बनारस की एक झलक देती है, बल्कि आपको उस समाज की विविधताओं और विडंबनाओं से भी रूबरू कराती है। इसके व्यंग्य में आपको हंसाने के साथ-साथ सोचने पर भी मजबूर करने की ताकत है।


### **निष्कर्ष**:

"काशी का अस्सी" एक अद्वितीय पुस्तक है, जो बनारस के अस्सी घाट के माध्यम से भारतीय समाज, संस्कृति और राजनीति पर तीखा व्यंग्य करती है। काशीनाथ सिंह की सरल लेकिन मारक शैली इस पुस्तक को और भी प्रभावी बनाती है। इस पुस्तक का हर पृष्ठ आपको हंसाएगा, पर साथ ही कुछ गहरे सवाल भी छोड़ जाएगा।


**रेटिंग**: 4.5/5


**नोट**: यह किताब उन लोगों के लिए खास तौर पर अनुशंसित है, जो बनारसी जीवन के रंगों और भारतीय समाज की वास्तविकताओं को समझने में रुचि रखते हैं। 

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