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Suicide Fruiting

इस साल बाज़ार में जितने जामुन दिखाई दे रहे हैं, उतने मैंने पिछले दो दशकों में कभी नहीं देखे। ​जामुन के अक्षरशः ढेर लग रहे हैं (नीचे गिर रहे हैं)। जिन पेड़ों पर पिछले साल इक्का-दुक्का फल आए थे, वे पेड़ भी इस बार जामुन से पटे पड़े हैं। जहाँ फल आए थे, वहाँ अब उन का अंबार लगना शुरू हो गया है। ​आखिर यह सब क्या चल रहा है? ​हमारी दादी/नानी हमेशा कहती थीं कि, "जिस गर्मियों में जामुन के ऐसे ढेर लगते हैं, उस साल सूखा पड़ता है।" ​बुजुर्गों का यह पारंपरिक ज्ञान वनस्पति विज्ञान (Botany) के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बिल्कुल सही और सटीक है। विज्ञान में इस दिलचस्प और उतनी ही चौंकाने वाली प्रक्रिया को "मास्टिंग" (Masting) या "स्ट्रेस फ्रूटिंग" (Stress Fruiting) कहा जाता है। ​पेड़ों द्वारा खुद को खत्म करके ज्यादा से ज्यादा फल देने के इस आखिरी प्रयास को कभी-कभी "सुसाइड फ्रूटिंग" (Suicide Fruiting) या "बंपर क्रॉप" भी कहा जाता है। ​यह असल में क्या है और इसके पीछे का विज्ञान क्या कहता है, आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं: ​१. 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट' (अस्ति...

Controversy over Indian Cricket Team's Aggressive Behaviour



 ऑस्ट्रेलिया में चल रही टेस्ट सीरीज में भारतीय खिलाड़ियों के आक्रामक व्यवहार को लेकर बहुत चर्चा हो रही है। ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को धक्का देना, उनपर व्यंग्य करना, उन्हें ट्रोल करना... पहली नजर में यह बुरा तो लगता ही है। अपने यहाँ के लोग भी भारतीय खिलाड़ियों की असभ्यता की आलोचना कर रहे हैं।

    मुझे लगता है जिन लोगों ने नब्बे के दशक तक ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों का व्यवहार देखा हो, उन्हें भारतीय खिलाड़ियों का व्यवहार बुरा नहीं लगेगा। सौरभ गांगुली के कप्तान बनने से पहले भारतीय खिलाड़ियों के साथ कैसा व्यवहार होता रहा है, वह हमें खूब याद है।

     एक बार वेस्टइंडीज के गैरी सोबर्स(या शायद विवियन रिचर्ड्स) ने कहा था- "हम भारत में खेलने कहाँ आते हैं, हम तो केवल इसलिए आते हैं कि यहाँ की लड़कियां सुन्दर हैं।" आप समझ रहे हैं यह कितना अपमानजनक बयान है? भारतीय खिलाड़ियों ने लम्बे समय तक ऐसा तिरस्कार और अपमानजनक बर्ताव झेला है।

     क्रिकेट इतिहास में सर्वाधिक अभद्रता ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ियों ने दिखाई है, और सबसे अधिक भारतीय खिलाड़ियों के विरुद्ध... खिलाड़ी क्या, अंपायर तक भारतीयों के साथ दुर्व्यवहार करते रहे हैं।

     सचिन तेंदुलकर जैसे सौम्य व्यक्ति को माइकल क्लार्क कोहनी मार कर गिरा चुके हैं। एंड्रयू साइमंड ने किस तरह भारतीय खिलाड़ियों के साथ दर्जनों बार बदतमीजी की है, यह भी हम सब ने देखा है। रिकी पोंटिंग ने आईसीसी के अध्यक्ष रहे शरद पवार तक को धक्का मारा है, वह भी भारत में। कप्तान रहते समय पोंटिंग कैसे हरभजन से उलझे थे, यह भी याद है।

     राहुल द्रविड़ जैसे शांत खिलाड़ी को भी बार बार अपमानित किया है ऑस्ट्रेलिया वालों ने। दरअसल भारत के खिलाफ मैच में उतरने से पहले ही वे तय कर लेते थे कि इन्हें पहले ही बैकफुट पर ला देना है। और वे लम्बे समय तक इसमें सफल भी रहे थे।

      दो हजार के बाद जन्में युवक समझ ही नहीं पाएंगे कि जब पहली बार गांगुली ने ऑस्ट्रेलिया वालों को उन्ही की भाषा में उत्तर देना शुरू किया तो भारत के दर्शकों को कितनी प्रसन्नता हुई थी। वह ऐतिहासिक दिन था जब गांगुली के बल पर पन्द्रह साल के पार्थिव पटेल ने स्टीव वा को चिढ़ाया था। भारतीय क्रिकेट की दशा वास्तव में उस दिन बदली थी। जी हाँ, यब उन अभद्रों को खेल में हराने से से अधिक आनन्ददायक था...

      भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी खेल के मामले में ऑस्ट्रेलिया से कमजोर पड़ जाते हैं इसके अनेक कारण हैं। मानसिकता के स्तर पर भी बहुत अंतर है। भारतीय खिलाड़ियों की हार हमें दुखी तो करती ही है। पर इन बर्बरों को उन्ही की भाषा में उत्तर देना कभी बुरा नहीं लगता। कोहली और सिराज जो कर रहे हैं, उसमें कुछ बुरा नहीं। दर्जनों के सामने सज्जनता बघारना बकलोली होती है दोस्त...

      हां टीम इंडिया के खराब खेल के लिए आलोचना होती रहे। इससे कोई दिक्कत नहीं

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