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The 2025 Knowledge Stack

  The 2025 Knowledge Stack I read 34 books in 2025. If I had to distill those thousands of pages into 4 life-changing lessons, this is what they would be. 📚👇 1. On Wealth & Wisdom: "The Almanack of Naval Ravikant" This wasn't just a book; it was a manual for the modern world. The biggest takeaway? "Specific knowledge" is your superpower. Build skills that feel like play to you but look like work to others. 2. On Strategy: "Lanka ka Yuddh" by Amish Tripathi ⚔️ A masterclass in how leadership and strategy are inseparable from ethics. It’s a reminder that how you win matters just as much as the win itself. 3. On Mindset: "The Courage to Be Disliked" 🧠 A radical lesson in emotional freedom. Most of our stress comes from trying to meet others' expectations. Real growth starts when you have the courage to be your authentic self, regardless of the "likes". 4. On Discipline: "Make Your Bed" by Admiral William H. McRaven...

Kohli VS Sontas

 विराट भाई, गियर बदल लो!


सैम कोंस्टस वाले मामले पर स्टार स्पोर्ट्स जिस तरह सुबह से कोहली को डिफेंड कर रहा था, उसे देखकर मुझे तरस आ रहा है। दिनभर इस बात की चर्चा करने का क्या तुक बनता है कि ऑस्ट्रेलियाई मीडिया ने कोहली का मज़ाक क्यों बनाया? 10-20 साल पहले के उदाहरण देकर ये बात establish करने का क्या सेंस है कि ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ी भी तो ऐसा करते थे? अरे भाई, ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ी ऐसा करते थे, तो क्या इस बात के लिए दुनिया उनकी इज्ज़त करती थी? नहीं, बिल्कुल नहीं।


ऑस्ट्रेलियन प्लेयर्स की इसी रवैए की वजह से उनके खिलाड़ी पूरी दुनिया में बदनाम भी थे। रही बात ऑस्ट्रेलियन मीडिया की कोहली को लेकर हार्श होने की, तो भाई, ऑस्ट्रेलियन मीडिया क्या अपने खिलाड़ियों को लेकर हार्श नहीं होता? जिस तरह पर्थ में पहला टेस्ट हारने पर ऑस्ट्रेलिया के टीवी और प्रिंट मीडिया ने अपनी टीम की खिंचाई की, आप वैसी आलोचना की भारत में कल्पना भी नहीं कर सकते।


चर्चा तो इस बात पर होनी चाहिए थी कि 36 साल के विराट कोहली को क्या ज़रूरत पड़ी थी कि वो 19 साल के यंग प्लेयर के साथ इस तरह फिज़िकल हो जाएं। वो भी उस खिलाड़ी के साथ जो उन्हें अपना आदर्श मानता है। अगर कोई यंग प्लेयर आपको अपने खेल से परेशान कर रहा है, तो आप उसके खिलाफ एग्रेसिव रणनीति बनाएं, उसके खिलाफ प्लान बी या प्लान सी लेकर आएं—न कि अपने दौर का सबसे महानतम खिलाड़ी उसके साथ गली के गुंडों की तरह धक्का-मुक्की करने लगें।

बहुत सारे लोग कहेंगे कि कोहली का तो यही स्टाइल है। वो तो शुरू से ही ऐसे ही एग्रेसिव रहे हैं। उन्हें भिड़ने में मज़ा आता है। उन्हें इस बात में मज़ा आता है कि दूसरी टीमें या मीडिया उन्हें गाली दें और वो उन्हें गलत साबित करें। धीरे-धीरे कोहली की छवि क्रिकेट के ऐसे एंग्री यंग मैन की बन गई, जो हर चीज़ को head-on लेता है। गेंदबाज़ ऑफ स्टम्प के बाहर पिच करेगा, तो कोहली ड्राइव करेंगे ही करेंगे। वो शॉर्ट डालेगा, तो कोहली पुल करेंगे। गेंदबाज़ आंखें दिखाएगा, तो कोहली ईंट का जवाब पत्थर से देंगे।


पर हुआ यह कि धीरे-धीरे कोहली अपनी ही इस छवि में इतना उलझ गए कि उन्हें पता ही नहीं चला कि गाड़ी को किसी और गियर में भी चलाया जा सकता है। जब तक आपकी फॉर्म चल रही है, आप युवा हैं, तब तक सब ठीक है। तब तक वो लोग भी आपके खिलाफ नहीं बोलते जो उस वक्त भी आपके उन तरीकों को पसंद नहीं कर रहे होते।


मगर दिक्कत तब आई जब कोहकी फॉर्म ऊपर-नीचे हुई और तब भी वो अपनी उस एग्रेसिव छवि को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुए। यह उन्हें अपने ego के खिलाफ लगा।


आज की पारी से पहले उनका यही रवैया था कि बॉल पांचवें स्टम्प पर आएगी, तो मारूंगा ही मारूंगा, फिर चाहे पिछले पांच पारियों में यह करते हुए ही क्यों न आउट हुआ हूं। अगर मुझे दूसरों से लड़कर ऊर्जा मिलती है, तो वो ऊर्जा पाने के लिए मैं वहां भी लड़ जाऊंगा, जहां उसकी ज़रूरत भी नहीं होगी।


अपनी ही इस एग्रेसिव छवि से समझौता न करने की कोहली की इस ज़िद ने ही उन पर एक्सट्रा प्रेशर डाल दिया है। जिसके चलते वो एक ही गलती को बार-बार दोहरा रहे हैं—मीडिया से भिड़ रहे हैं, खुद को हूट करने वाले दर्शकों से भिड़ने जा रहे हैं। और अपने ज़हन में क्रिकेट के अलावा भी ऐसी लड़ाईयां लड़ रहे हैं जिसका खेल से कोई लेना-देना नहीं।


मुझे लगता है कि कोहली अब भी अगर थोड़े विनम्र हो जाएं, तो अपने लिए चीज़ें आसान कर लेंगे। जब सब कुछ आपके पक्ष में चलता है तो बहुत मुमकिन है कि आपको लगने लगे कि मैंने जीवन को साध लिया  है। मैंने सफलता का सूत्र ढूंढ लिया है। मैं इतनी  और ऐसी मेहनत करूंगा, तो मुझे कामयाब होने से कोई नहीं रोक पाएगा। लेकिन जीवन सिर्फ गणित नहीं है। ये कविता भी है, दर्शन भी और रहस्य भी। अगर सिर्फ आपकी मेहनत से आप सफल होते हों, तो ये फॉर्मूला दुनिया के हर कामयाब इंसान में गुरूर पैदा कर देगा। और जब आप ऐसा सोचते हैं तो आपके जश्न में, अपनी सफलताओं के बखान में, अहंकार नहीं, संयम झलता है। वो संयम जो ईश्वर को नाराज़ करने के डर की वजह से आता है।


वक्त के साथ जीवन आपको सिखाता है कि मेहनत तो ज़रूरी है कि लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है ये समझना कि ‘जैसे मैं वहां था, तो मेरी जगह कोई और भी हो सकता था सकता’। ऐसा कोई और जो मुझसे भी ज़्यादा काबिल था लेकिन वो गलत जगह पर था। हो सकता है आपमें सचिन तेंदुलकर से ज़्यादा प्रतिभा हो लेकिन 5 साल की उम्र में आपकी प्रतिभा पहचानने के लिए आपके पास अजित तेंदुलकर जैसा भाई न हो। हो सकता है आपके पास अजित जैसा भाई भी हो लेकिन आपके हुनर को निखारने के लिए वहां कोई रमाकांत आचरेकर जैसा गुरू न हो। ऐसी सोच इंसान को कृतज्ञता से भरती है और कामयाबी को पचाने में मदद करती है। लेकिन जब आप अपनी सफलता के लिए खुद को ही इकलौती वजह मानते हैं, तो असफलता में भी आप खुद को पूरी तरह अकेला पाते हैं। आपको लगता है कि आपकी प्रार्थना सुनने वाला कोई नहीं। फिर एक वक्त आता है जब आप भी वही होते हैं, आपमें प्रतिभा भी वैसी होती है मगर वैसे नतीजे आना बंद हो जाते हैं।

जैसे हालात जितने मुश्किल होते हैं, आपको उतना ही शांत रहना होता है। उसी तरह, अगर प्लेयर अच्छे फॉर्म में नहीं है, तो उसके लिए बहुत ज़रूरी है कि वह अपने ज़ोन में रहे। अपनी सारी एनर्जी अपने खेल पर लगाए।


अपना खेल खेलते वक्त उसके दिमाग में किसी को गलत या सही साबित करने की बातें न चल रही हों। लेकिन जब कोई खिलाड़ी खुद कहता रहा हो कि उसे ऐसी लड़ाईयों से ऊर्जा मिलती है, तो ये भी तय है कि ऐसी लड़ाईयों में मिली हार उसकी ऊर्जा चूस भी रही होगी। उसे भटका भी रही होगी। उस पर दबाव भी डाल रही होगी। उसे विचलित कर रही होगी।


इतने सालों तक क्रिकेट देखने और खेल की थोड़ी-बहुत समझ होने के कारण मैं यह दावे से कह सकता हूं कि कोहली के साथ तकनीक की तो कोई प्रॉब्लम ही नहीं है। उनके साथ सारी दिक्कत अपनी ही बनाई छवि में उलझ जाने की है।


कोहली को यहां से तीन-चार साल और बेहतरीन क्रिकेट खेलना है, तो उन्हें इस एग्रेसिव कोहली की छवि को तिलांजली देकर अपने ज़ोन में जाना होगा। जहां उन्हें न किसी को नीचा दिखाना है, न अपना लोहा मनवाना है। बस योगियों की तरह ध्यान मुद्रा में जाकर ऐसे खेलना है, जैसे उस क्षण, सामने से आती गेंद और उनके बल्ले के अलावा दुनिया में और कुछ भी नहीं।

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