सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Madness for Iphone

​ *आखिर जा कहां रहा है हमारा समाज..* महाराष्ट्र के निम्न मध्यम वर्गीय मां-बाप ने अपनी इकलौती संतान को जैसे-तैसे पाल पोसकर 18 साल का किया। अब उस बेटे को आईफोन की सनक जग गई, पहाड़ के किनारे खड़े होकर 3 घंटे का फुल वोल्टेज ड्रामा चला। संभवतः सभी को लगा होगा कि ड्रामा कर रहा है, इसी बीच बाप सामने आया, शायद उसे अपने भावनात्मक और शारीरिक बल पर भरोसा रहा होगा, कि या तो मैं अपने बेटे को प्यार/डांट से मना/धमका लूंगा, नहीं तो ताकत का प्रयोग करके उसे किनारे से खींच लाऊंगा। बाप का दांव गलत साबित हुआ, बेटा उसकी उम्मीद से ज्यादा भावनात्मक रूप से ढीट और बलशाली था, खींचा-तानी में बेटे का बैलेंस बिगड़ा, गिरते बेटे ने वही किया जो वो पिछले 18 साल से करता आ रहा था, (बाप का सपोर्ट लेना), और उसने सपोर्ट लेने के चक्कर में अपने साथ बाप को भी खाई में खींच लिया। मां जो पहले ही बेटे को मनाने के लिए अपना मंगलसूत्र देने की पेशकश कर रही थी, इस दृश्य को देखकर कुछ समझ नहीं सकी, और बदहवासी में 1-2 सेकंड बाद उसने भी खाई में जंप लगा दी। पूरा परिवार एक आईफोन की सनक में कॉल के ग्रास में चले गए।। गलती किसकी है: 1. आईफोन के...

Kohli VS Sontas

 विराट भाई, गियर बदल लो!


सैम कोंस्टस वाले मामले पर स्टार स्पोर्ट्स जिस तरह सुबह से कोहली को डिफेंड कर रहा था, उसे देखकर मुझे तरस आ रहा है। दिनभर इस बात की चर्चा करने का क्या तुक बनता है कि ऑस्ट्रेलियाई मीडिया ने कोहली का मज़ाक क्यों बनाया? 10-20 साल पहले के उदाहरण देकर ये बात establish करने का क्या सेंस है कि ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ी भी तो ऐसा करते थे? अरे भाई, ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ी ऐसा करते थे, तो क्या इस बात के लिए दुनिया उनकी इज्ज़त करती थी? नहीं, बिल्कुल नहीं।


ऑस्ट्रेलियन प्लेयर्स की इसी रवैए की वजह से उनके खिलाड़ी पूरी दुनिया में बदनाम भी थे। रही बात ऑस्ट्रेलियन मीडिया की कोहली को लेकर हार्श होने की, तो भाई, ऑस्ट्रेलियन मीडिया क्या अपने खिलाड़ियों को लेकर हार्श नहीं होता? जिस तरह पर्थ में पहला टेस्ट हारने पर ऑस्ट्रेलिया के टीवी और प्रिंट मीडिया ने अपनी टीम की खिंचाई की, आप वैसी आलोचना की भारत में कल्पना भी नहीं कर सकते।


चर्चा तो इस बात पर होनी चाहिए थी कि 36 साल के विराट कोहली को क्या ज़रूरत पड़ी थी कि वो 19 साल के यंग प्लेयर के साथ इस तरह फिज़िकल हो जाएं। वो भी उस खिलाड़ी के साथ जो उन्हें अपना आदर्श मानता है। अगर कोई यंग प्लेयर आपको अपने खेल से परेशान कर रहा है, तो आप उसके खिलाफ एग्रेसिव रणनीति बनाएं, उसके खिलाफ प्लान बी या प्लान सी लेकर आएं—न कि अपने दौर का सबसे महानतम खिलाड़ी उसके साथ गली के गुंडों की तरह धक्का-मुक्की करने लगें।

बहुत सारे लोग कहेंगे कि कोहली का तो यही स्टाइल है। वो तो शुरू से ही ऐसे ही एग्रेसिव रहे हैं। उन्हें भिड़ने में मज़ा आता है। उन्हें इस बात में मज़ा आता है कि दूसरी टीमें या मीडिया उन्हें गाली दें और वो उन्हें गलत साबित करें। धीरे-धीरे कोहली की छवि क्रिकेट के ऐसे एंग्री यंग मैन की बन गई, जो हर चीज़ को head-on लेता है। गेंदबाज़ ऑफ स्टम्प के बाहर पिच करेगा, तो कोहली ड्राइव करेंगे ही करेंगे। वो शॉर्ट डालेगा, तो कोहली पुल करेंगे। गेंदबाज़ आंखें दिखाएगा, तो कोहली ईंट का जवाब पत्थर से देंगे।


पर हुआ यह कि धीरे-धीरे कोहली अपनी ही इस छवि में इतना उलझ गए कि उन्हें पता ही नहीं चला कि गाड़ी को किसी और गियर में भी चलाया जा सकता है। जब तक आपकी फॉर्म चल रही है, आप युवा हैं, तब तक सब ठीक है। तब तक वो लोग भी आपके खिलाफ नहीं बोलते जो उस वक्त भी आपके उन तरीकों को पसंद नहीं कर रहे होते।


मगर दिक्कत तब आई जब कोहकी फॉर्म ऊपर-नीचे हुई और तब भी वो अपनी उस एग्रेसिव छवि को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुए। यह उन्हें अपने ego के खिलाफ लगा।


आज की पारी से पहले उनका यही रवैया था कि बॉल पांचवें स्टम्प पर आएगी, तो मारूंगा ही मारूंगा, फिर चाहे पिछले पांच पारियों में यह करते हुए ही क्यों न आउट हुआ हूं। अगर मुझे दूसरों से लड़कर ऊर्जा मिलती है, तो वो ऊर्जा पाने के लिए मैं वहां भी लड़ जाऊंगा, जहां उसकी ज़रूरत भी नहीं होगी।


अपनी ही इस एग्रेसिव छवि से समझौता न करने की कोहली की इस ज़िद ने ही उन पर एक्सट्रा प्रेशर डाल दिया है। जिसके चलते वो एक ही गलती को बार-बार दोहरा रहे हैं—मीडिया से भिड़ रहे हैं, खुद को हूट करने वाले दर्शकों से भिड़ने जा रहे हैं। और अपने ज़हन में क्रिकेट के अलावा भी ऐसी लड़ाईयां लड़ रहे हैं जिसका खेल से कोई लेना-देना नहीं।


मुझे लगता है कि कोहली अब भी अगर थोड़े विनम्र हो जाएं, तो अपने लिए चीज़ें आसान कर लेंगे। जब सब कुछ आपके पक्ष में चलता है तो बहुत मुमकिन है कि आपको लगने लगे कि मैंने जीवन को साध लिया  है। मैंने सफलता का सूत्र ढूंढ लिया है। मैं इतनी  और ऐसी मेहनत करूंगा, तो मुझे कामयाब होने से कोई नहीं रोक पाएगा। लेकिन जीवन सिर्फ गणित नहीं है। ये कविता भी है, दर्शन भी और रहस्य भी। अगर सिर्फ आपकी मेहनत से आप सफल होते हों, तो ये फॉर्मूला दुनिया के हर कामयाब इंसान में गुरूर पैदा कर देगा। और जब आप ऐसा सोचते हैं तो आपके जश्न में, अपनी सफलताओं के बखान में, अहंकार नहीं, संयम झलता है। वो संयम जो ईश्वर को नाराज़ करने के डर की वजह से आता है।


वक्त के साथ जीवन आपको सिखाता है कि मेहनत तो ज़रूरी है कि लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है ये समझना कि ‘जैसे मैं वहां था, तो मेरी जगह कोई और भी हो सकता था सकता’। ऐसा कोई और जो मुझसे भी ज़्यादा काबिल था लेकिन वो गलत जगह पर था। हो सकता है आपमें सचिन तेंदुलकर से ज़्यादा प्रतिभा हो लेकिन 5 साल की उम्र में आपकी प्रतिभा पहचानने के लिए आपके पास अजित तेंदुलकर जैसा भाई न हो। हो सकता है आपके पास अजित जैसा भाई भी हो लेकिन आपके हुनर को निखारने के लिए वहां कोई रमाकांत आचरेकर जैसा गुरू न हो। ऐसी सोच इंसान को कृतज्ञता से भरती है और कामयाबी को पचाने में मदद करती है। लेकिन जब आप अपनी सफलता के लिए खुद को ही इकलौती वजह मानते हैं, तो असफलता में भी आप खुद को पूरी तरह अकेला पाते हैं। आपको लगता है कि आपकी प्रार्थना सुनने वाला कोई नहीं। फिर एक वक्त आता है जब आप भी वही होते हैं, आपमें प्रतिभा भी वैसी होती है मगर वैसे नतीजे आना बंद हो जाते हैं।

जैसे हालात जितने मुश्किल होते हैं, आपको उतना ही शांत रहना होता है। उसी तरह, अगर प्लेयर अच्छे फॉर्म में नहीं है, तो उसके लिए बहुत ज़रूरी है कि वह अपने ज़ोन में रहे। अपनी सारी एनर्जी अपने खेल पर लगाए।


अपना खेल खेलते वक्त उसके दिमाग में किसी को गलत या सही साबित करने की बातें न चल रही हों। लेकिन जब कोई खिलाड़ी खुद कहता रहा हो कि उसे ऐसी लड़ाईयों से ऊर्जा मिलती है, तो ये भी तय है कि ऐसी लड़ाईयों में मिली हार उसकी ऊर्जा चूस भी रही होगी। उसे भटका भी रही होगी। उस पर दबाव भी डाल रही होगी। उसे विचलित कर रही होगी।


इतने सालों तक क्रिकेट देखने और खेल की थोड़ी-बहुत समझ होने के कारण मैं यह दावे से कह सकता हूं कि कोहली के साथ तकनीक की तो कोई प्रॉब्लम ही नहीं है। उनके साथ सारी दिक्कत अपनी ही बनाई छवि में उलझ जाने की है।


कोहली को यहां से तीन-चार साल और बेहतरीन क्रिकेट खेलना है, तो उन्हें इस एग्रेसिव कोहली की छवि को तिलांजली देकर अपने ज़ोन में जाना होगा। जहां उन्हें न किसी को नीचा दिखाना है, न अपना लोहा मनवाना है। बस योगियों की तरह ध्यान मुद्रा में जाकर ऐसे खेलना है, जैसे उस क्षण, सामने से आती गेंद और उनके बल्ले के अलावा दुनिया में और कुछ भी नहीं।

टिप्पणियाँ

Best From the Author

The Metamorphosis book review

समाज लोगों से प्यार तब तक करता है, जब तक वे उसके लिए उपयोगी रहते हैं।   और जैसे ही कोई व्यक्ति उपयोगी होना बंद कर देता है—उसका अस्तित्व भी असहज हो जाता है।   यही वास्तविक भयावहता है काफ्का के "द मेटामॉर्फोसिस" की। ग्रेगर साम्सा रातों‑रात कोई राक्षस नहीं बन जाता।   वह बस एक ऐसा इंसान बन जाता है जो अब काम नहीं कर सकता, कमाई नहीं कर सकता,   परिवार की उम्मीदों को पूरा नहीं कर सकता,   और समाज की उस "सामान्य" दुनिया में फिट नहीं बैठता जो हम सबको थोप देती है।   और अचानक—   उसका अपना कमरा छोटा लगने लगता है,   घर की बातचीत में ठंडक घर कर जाती है,   और वही परिवार जिसने कभी उस पर अपेक्षाएँ और निर्भरता रखी थी,   धीरे‑धीरे उसके बिना जीना सीख जाता है।   काफ्का हमें दिखाते हैं कि   समाज अक्सर मानवता की कीमत नहीं,   बस उत्पादकता की कीमत चुकता है।   जैसे ही कोई व्यक्ति कमज़ोर होता है, बेरोज़गार होता है,   दुखी, अलग, टूटा हुआ—   तो वह बस एक बोझ बन जाता है।   किसी इंसान की जगह एक “समस्या” बन जाता है।   यह सच्चाई हम आ...

The 2025 Knowledge Stack

  The 2025 Knowledge Stack I read 34 books in 2025. If I had to distill those thousands of pages into 4 life-changing lessons, this is what they would be. 📚👇 1. On Wealth & Wisdom: "The Almanack of Naval Ravikant" This wasn't just a book; it was a manual for the modern world. The biggest takeaway? "Specific knowledge" is your superpower. Build skills that feel like play to you but look like work to others. 2. On Strategy: "Lanka ka Yuddh" by Amish Tripathi ⚔️ A masterclass in how leadership and strategy are inseparable from ethics. It’s a reminder that how you win matters just as much as the win itself. 3. On Mindset: "The Courage to Be Disliked" 🧠 A radical lesson in emotional freedom. Most of our stress comes from trying to meet others' expectations. Real growth starts when you have the courage to be your authentic self, regardless of the "likes". 4. On Discipline: "Make Your Bed" by Admiral William H. McRaven...

Kashi ka Assi Book Review

**किताब समीक्षा: "काशी का अस्सी"** **लेखक**: काशीनाथ सिंह   **शैली**: व्यंग्यात्मक कथा साहित्य   **प्रकाशन वर्ष**: 2004 "काशी का अस्सी" हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण और चर्चित उपन्यास है, जिसे काशीनाथ सिंह ने लिखा है। यह किताब बनारस की जीवनशैली, वहाँ की संस्कृति और आम जनमानस की भाषा और बोलचाल का जीवंत चित्रण करती है। किताब का केंद्र बनारस का प्रसिद्ध अस्सी घाट है, जो सिर्फ एक भौगोलिक स्थल नहीं, बल्कि बनारसी जीवन का प्रतीक है। ### **कहानी का सारांश**: कहानी अस्सी घाट के इर्द-गिर्द घूमती है, जहाँ विभिन्न तबकों के लोग बैठकर बातचीत, बहस और ठहाके लगाते हैं। यह बनारसी समाज की धड़कनों को पकड़ता है। किताब में कई पात्र हैं, जिनमें मुख्यत: पंडित, टीकाकार, शिक्षक, छात्र, नौकरीपेशा लोग और साधारण नागरिक शामिल हैं। हर व्यक्ति का अपना दृष्टिकोण और जीवन के प्रति अपने अनुभव होते हैं, जो किताब को वास्तविक और मजेदार बनाते हैं। **काशी का अस्सी** में अस्सी घाट के पंडों और स्थानीय निवासियों के रोजमर्रा के जीवन को बड़े ही सजीव और व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है। काशी का परंपर...

Animal Farm by George Orwell: The Classic

 **Book Review: *Animal Farm* by George Orwell** George Orwell’s *Animal Farm* is a timeless allegorical novella that, despite its brevity, packs an extraordinary punch. Published in 1945, the novel remains a powerful commentary on power, corruption, and societal structures. Through the use of farm animals as characters, Orwell critiques the rise of totalitarian regimes, particularly the Russian Revolution and the subsequent emergence of the Soviet Union under Stalin. ### **Plot Overview** The story is set on Manor Farm, where the animals, inspired by Old Major, a wise and elderly pig, revolt against their human farmer, Mr. Jones. Led by pigs Snowball and Napoleon, the animals envision a utopia where all animals are equal, free from human tyranny. After their successful rebellion, they rename the farm "Animal Farm" and establish their own rules under the slogan, “All animals are equal.” However, as the pigs take over leadership roles, the initial ideals of equality and justic...

Not demonic, just introverted! आसुरी नहीं, अंतर्मुखी!

मैं 27 मूल नक्षत्रों, शनिवार और 22 तारीख को जन्मा व्यक्ति हूँ — एक ऐसा जन्म‑संयोग जो न सिर्फ़ मेरी तिथि बताता है, बल्कि मेरे भीतर की गहराई, द्वंद्व और अस्थिरता का भी संकेत देता है। राहु के प्रबल और दूरदर्शी प्रभाव ने मेरे व्यक्तित्व को सीधे, सरल और सतही नहीं रहने दिया; मैं विचारों की उस गहरी खाई में अक्सर भटक जाता हूँ, जहाँ हर बात बस बाहरी रूप नहीं, बल्कि भीतरी अर्थ भी धरती होता है। मैं हर निर्णय के पीछे छिपे संभावित नतीजों, अनजाने खतरों और छिपी हुई उम्मीदों को भी देखने का आदी हूँ।   कभी‑कभी लोग मेरे कार्यों, अभिव्यक्ति और निर्णयों को असामान्य, अत्यंत गहन या यहाँ तक कि “आसुरी” समझने लगते हैं, क्योंकि मेरी सोच उनकी सामान्य धारणाओं की रेखाओं से बाहर निकल जाती है। पर यह आसुरी नहीं, बस एक टूटी हुई, खुरदरी और अत्यंत ईमानदार आत्मा की आवाज़ है, जो दिखावे की दुनिया से थक चुकी है और अपने सच्चे रूप में जीना चाहती है। मैं जब भी बोलता हूँ, तो बस शब्द नहीं बोलता, बल्कि उसके पीछे समा दर्द, संघर्ष, अनुभव और उम्मीदों को भी लाता हूँ।   मेरी पहचान में ग्रहों का भी बड़ा हाथ है। जब ग्रह ही वही है...