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The Metamorphosis book review

समाज लोगों से प्यार तब तक करता है, जब तक वे उसके लिए उपयोगी रहते हैं।   और जैसे ही कोई व्यक्ति उपयोगी होना बंद कर देता है—उसका अस्तित्व भी असहज हो जाता है।   यही वास्तविक भयावहता है काफ्का के "द मेटामॉर्फोसिस" की। ग्रेगर साम्सा रातों‑रात कोई राक्षस नहीं बन जाता।   वह बस एक ऐसा इंसान बन जाता है जो अब काम नहीं कर सकता, कमाई नहीं कर सकता,   परिवार की उम्मीदों को पूरा नहीं कर सकता,   और समाज की उस "सामान्य" दुनिया में फिट नहीं बैठता जो हम सबको थोप देती है।   और अचानक—   उसका अपना कमरा छोटा लगने लगता है,   घर की बातचीत में ठंडक घर कर जाती है,   और वही परिवार जिसने कभी उस पर अपेक्षाएँ और निर्भरता रखी थी,   धीरे‑धीरे उसके बिना जीना सीख जाता है।   काफ्का हमें दिखाते हैं कि   समाज अक्सर मानवता की कीमत नहीं,   बस उत्पादकता की कीमत चुकता है।   जैसे ही कोई व्यक्ति कमज़ोर होता है, बेरोज़गार होता है,   दुखी, अलग, टूटा हुआ—   तो वह बस एक बोझ बन जाता है।   किसी इंसान की जगह एक “समस्या” बन जाता है।   यह सच्चाई हम आ...

Vivek Pangani's love story



 सालों पहले एक फिल्म आई थी बर्फ़ी.. रनबीर कपूर अभिनीत इस फिल्म में कईं सम्मोहित कर देने वाले दृश्य थे.. फिल्म की सिनेमेटोग्राफ़ी भी उल्लेखनीय थी.. फिल्म में एक दृश्य है जो मेरे मन में बार बार उभरता है, जिसे  रनबीर के अलावा तीन अलग अलग किरदारों के साथ पिक्चराइज़ किया गया था.. यह दृश्य किसी के प्रति प्रेम, निष्ठा और विश्वास को जाँचने के लिए किया गया एक किस्म का लिटमस टेस्ट है.. प्रोटेगनिस्ट बर्फ़ी यह जानना चाहता है कि क्या संसार में कोई ऐसा भी है जिसका मन उसके लिए निश्छल और निस्वार्थ प्रेम से भरा हुआ है.. यह जानने के लिए वह सबसे पहले अपने दोस्त का हाथ पकड़कर एक लकड़ी के बने लैम्प पोस्ट के नीचे खड़ा हो जाता है.. बर्फ़ी उस चरमराती हुई लकड़ी के बने लैम्प पोस्ट के कभी भी गिर जाने की बात से अनजान नहीं.. बस वह यह देखना चाहता है कि उसका दोस्त मुसीबत की घड़ी में उसका हाथ छोड़कर भाग तो नहीं जाता.. और यही होता है.. लैम्प पोस्ट के नीचे गिरने से पहले ही उसका वह दोस्त अपना हाथ छुड़वा कर पीछे हट जाता है.. फिल्म आगे बढ़ती है, दूसरी बार उसी फ्रेम में बर्फ़ी के साथ वह लड़की खड़ी है जिसे वह चाहता है.. लकड़ी के चरमराने भर की आवाज़ सुनकर वह भी बर्फ़ी का हाथ छोड़ पीछे हट जाती है.. फिल्म और आगे बढ़ती है.. इस बार बर्फ़ी का हाथ एक निष्पाप व अबोध लड़की ने पकड़ा हुआ है, जो संसार के सभी प्रपंचों से अंजान है, जो केवल और केवल विश्वास करना जानती है, यह जाने बिना कि उसका यह विश्वास उसके लिए किसी असाध्य पीड़ा का ‌कारण भी बन सकता है.. इस बार फ्रेम में बर्फ़ी का हाथ झिलमिल ने पकड़ा हुआ है.. लैम्प पोस्ट गिरने को है.. पर झिलमिल की नज़र केवल बर्फ़ी पर है.. लैम्प पोस्ट‌ गिरता है, उस पर लगे बल्ब का काँच चूर चूर हो कर ज़मीन पर बिखर जाता है, पर झिलमिल और बर्फ़ी एक दूसरे का हाथ पकड़े वहीं जस के तस खड़े हैं.. बर्फ़ी को जिस सच्चे प्रेम की तलाश थी वह पूरी होती है.. अंततः प्रेम व अकपट की जय होती है.. 


विवेक पंगेनी की बीमारी के दौरान उनकी और श्रीजना की विडियो देखते हुए बार बार मुझे बर्फ़ी और झिलमिल की याद आती रही.. यहाँ विवेक के लगातार गिरते हुए स्वास्थ्य को लकड़ी के उस चरमराते हुए लैम्प पोस्ट की तरह समझा जा सकता है जो कभी भी गिर सकता था, पर श्रीजना ने कसकर उनका हाथ पकड़े रखा, ज़रा भी पीछे न हटीं.. वे झिलमिल की तरह अबोध नहीं थीं, परिणति जानतीं थीं.. किंतु विवेक के प्रति उनका समर्पण अद्भुत रहा.. जीवन के अंतिम क्षण तक उन्होंने विवेक के हाथ को थामे रखा.. पर किसी ने ठीक ही कहा है, संसार की सबसे सुन्दर प्रेम कहानियाँ सदा अपूर्ण रह जाती हैं.. :(

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The Metamorphosis book review

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