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कर्म फल तो भोगना ही पड़ेगा

 महाभारत के भयंकर नरसंहार के बाद पुत्र-वियोग में तड़पती गांधारी जब श्रीकृष्ण को शाप देने के लिए आगे बढ़ती हैं, तब श्रीकृष्ण शांत स्वर में कहते हैं— माते!  मैं शोक, मोह और पीड़ा—इन सबसे परे हूँ, न मुझे विजय का गर्व है, न पराजय का विषाद, न मुझे सम्मान बाँधता है, न अपमान। न जीवन, न मृत्यु—किसी में मैं आबद्ध नहीं हूँ। मैं न सत्य में बँधा हूँ, न असत्य में.. काल और महाकाल—दोनों मेरे अधीन हैं; मैं उन्हीं के माध्यम से अपने कार्य सिद्ध कराता हूँ। हे माता, यह युद्ध अवश्यम्भावी था। जो चले गए हैं, उनके लिए विलाप मत करो। जो शेष हैं—उन्हें स्वीकारो। वर्तमान को अपनाओ, क्योंकि अतीत का शोक ही दुख का मूल है.. कृष्ण की वाणी सुनकर गांधारी विलाप करती हुई कह उठती हैं.. कृष्ण…! तुम यह सब कह सकते हो, क्योंकि तुम माँ नहीं हो। तुम क्या जानो एक माँ की ममता क्या होती है? तुम क्या समझो पुत्र-शोक की असहनीय पीड़ा? तुम मोह-त्याग और ज्ञान की बातें करते हो, तो जाओ—अपनी माता देवकी से पूछो कि पुत्र-वियोग क्या होता है! पूछना उनसे— कैसा लगता था जब कंस एक-एक कर उसके कलेजे के टुकड़े छीन लेता था.. जब उसका दूध उतरता थ...

Vivek Pangani's love story



 सालों पहले एक फिल्म आई थी बर्फ़ी.. रनबीर कपूर अभिनीत इस फिल्म में कईं सम्मोहित कर देने वाले दृश्य थे.. फिल्म की सिनेमेटोग्राफ़ी भी उल्लेखनीय थी.. फिल्म में एक दृश्य है जो मेरे मन में बार बार उभरता है, जिसे  रनबीर के अलावा तीन अलग अलग किरदारों के साथ पिक्चराइज़ किया गया था.. यह दृश्य किसी के प्रति प्रेम, निष्ठा और विश्वास को जाँचने के लिए किया गया एक किस्म का लिटमस टेस्ट है.. प्रोटेगनिस्ट बर्फ़ी यह जानना चाहता है कि क्या संसार में कोई ऐसा भी है जिसका मन उसके लिए निश्छल और निस्वार्थ प्रेम से भरा हुआ है.. यह जानने के लिए वह सबसे पहले अपने दोस्त का हाथ पकड़कर एक लकड़ी के बने लैम्प पोस्ट के नीचे खड़ा हो जाता है.. बर्फ़ी उस चरमराती हुई लकड़ी के बने लैम्प पोस्ट के कभी भी गिर जाने की बात से अनजान नहीं.. बस वह यह देखना चाहता है कि उसका दोस्त मुसीबत की घड़ी में उसका हाथ छोड़कर भाग तो नहीं जाता.. और यही होता है.. लैम्प पोस्ट के नीचे गिरने से पहले ही उसका वह दोस्त अपना हाथ छुड़वा कर पीछे हट जाता है.. फिल्म आगे बढ़ती है, दूसरी बार उसी फ्रेम में बर्फ़ी के साथ वह लड़की खड़ी है जिसे वह चाहता है.. लकड़ी के चरमराने भर की आवाज़ सुनकर वह भी बर्फ़ी का हाथ छोड़ पीछे हट जाती है.. फिल्म और आगे बढ़ती है.. इस बार बर्फ़ी का हाथ एक निष्पाप व अबोध लड़की ने पकड़ा हुआ है, जो संसार के सभी प्रपंचों से अंजान है, जो केवल और केवल विश्वास करना जानती है, यह जाने बिना कि उसका यह विश्वास उसके लिए किसी असाध्य पीड़ा का ‌कारण भी बन सकता है.. इस बार फ्रेम में बर्फ़ी का हाथ झिलमिल ने पकड़ा हुआ है.. लैम्प पोस्ट गिरने को है.. पर झिलमिल की नज़र केवल बर्फ़ी पर है.. लैम्प पोस्ट‌ गिरता है, उस पर लगे बल्ब का काँच चूर चूर हो कर ज़मीन पर बिखर जाता है, पर झिलमिल और बर्फ़ी एक दूसरे का हाथ पकड़े वहीं जस के तस खड़े हैं.. बर्फ़ी को जिस सच्चे प्रेम की तलाश थी वह पूरी होती है.. अंततः प्रेम व अकपट की जय होती है.. 


विवेक पंगेनी की बीमारी के दौरान उनकी और श्रीजना की विडियो देखते हुए बार बार मुझे बर्फ़ी और झिलमिल की याद आती रही.. यहाँ विवेक के लगातार गिरते हुए स्वास्थ्य को लकड़ी के उस चरमराते हुए लैम्प पोस्ट की तरह समझा जा सकता है जो कभी भी गिर सकता था, पर श्रीजना ने कसकर उनका हाथ पकड़े रखा, ज़रा भी पीछे न हटीं.. वे झिलमिल की तरह अबोध नहीं थीं, परिणति जानतीं थीं.. किंतु विवेक के प्रति उनका समर्पण अद्भुत रहा.. जीवन के अंतिम क्षण तक उन्होंने विवेक के हाथ को थामे रखा.. पर किसी ने ठीक ही कहा है, संसार की सबसे सुन्दर प्रेम कहानियाँ सदा अपूर्ण रह जाती हैं.. :(

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