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कर्म फल तो भोगना ही पड़ेगा

 महाभारत के भयंकर नरसंहार के बाद पुत्र-वियोग में तड़पती गांधारी जब श्रीकृष्ण को शाप देने के लिए आगे बढ़ती हैं, तब श्रीकृष्ण शांत स्वर में कहते हैं— माते!  मैं शोक, मोह और पीड़ा—इन सबसे परे हूँ, न मुझे विजय का गर्व है, न पराजय का विषाद, न मुझे सम्मान बाँधता है, न अपमान। न जीवन, न मृत्यु—किसी में मैं आबद्ध नहीं हूँ। मैं न सत्य में बँधा हूँ, न असत्य में.. काल और महाकाल—दोनों मेरे अधीन हैं; मैं उन्हीं के माध्यम से अपने कार्य सिद्ध कराता हूँ। हे माता, यह युद्ध अवश्यम्भावी था। जो चले गए हैं, उनके लिए विलाप मत करो। जो शेष हैं—उन्हें स्वीकारो। वर्तमान को अपनाओ, क्योंकि अतीत का शोक ही दुख का मूल है.. कृष्ण की वाणी सुनकर गांधारी विलाप करती हुई कह उठती हैं.. कृष्ण…! तुम यह सब कह सकते हो, क्योंकि तुम माँ नहीं हो। तुम क्या जानो एक माँ की ममता क्या होती है? तुम क्या समझो पुत्र-शोक की असहनीय पीड़ा? तुम मोह-त्याग और ज्ञान की बातें करते हो, तो जाओ—अपनी माता देवकी से पूछो कि पुत्र-वियोग क्या होता है! पूछना उनसे— कैसा लगता था जब कंस एक-एक कर उसके कलेजे के टुकड़े छीन लेता था.. जब उसका दूध उतरता थ...

RCB vs CSK 2025

 सौ दिन की पराजय एक क्षण की कायरता से बेहतर होती है..


18 साल के IPL में, कभी भी मैने, धोनी के क्रीज पर रहते हुए,चेपक को इतना खामोश नहीं देखा था, जितना खामोश चेपक आज था। बहुत से लोग धोनी को शायद इसलिए पसंद करते होंगे क्योंकि उसने ट्रॉफियां जिताई है, रन बनाए है, छक्के मारे है। पर मुझे धोनी सिर्फ और सिर्फ अपनी दिलेरी की वजह से पसंद रहा है। वो बांग्लादेश वाला मैच, जब एक रन बराबरी के लिए चाहिए था,कोई और विकेटकीपर होता तो थ्रो मार देता, पर हाथ में गेंद लेकर स्प्रिंट नहीं लगाता। क्योंकि थ्रो मारने पर थ्रो लगे न लगे,मामला फिफ्टी फिफ्टी का रहता है, कोई धोनी को ब्लेम करने नहीं जाता, पर हाथ में गेंद लेकर दौड़ने पर अगर एक दो सेकंड का फासला भी रहता तो सारा ब्लेम धोनी पर ही आना था, पर धोनी को कभी डर नहीं लगा इन बातों से।


इसी तरह वर्ल्डकप फाइनल में, खुद को युवराज की जगह प्रमोट करना,वहां धोनी के पास पाने को कम और खोने को ज्यादा था। पर ये बन्दा उतरा, खेला, और जिताया भी।कई लोग धोनी को उस दिन के लिए ट्रॉल करते है, जब धोनी ने अंबाती रायडू को आधी पिच से लौटा दिया था इस कॉन्फिडेंट में कि लास्ट बॉल पर मै मार दूंगा। उस दिन हार गई थी इंडिया, पर अपने को धोनी पर भरोसा कायम रहा, क्यूंकि जब आप आग बढ़कर जिम्मेदारी उठाते है तो हमेशा result आपके फेवर में नहीं आते, पर तारीफ होती है कि आप आगे आकर ब्लेम और फेम के तराजू पर अपनी मर्जी से बैठे।धोनी का यही एटीट्यूड चेन्नई में भी आया, और जब मैच बिल्कुल कोने पर खड़ा रहता, धोनी और उसकी टीम मैच लेकर निकल जाती।यही इस टीम की लीगेसी थी, यानी धोनी की लीगेसी है।


पर आज, जिस तरह से चेन्नई खेली है, शुरू से आखिरी तक लगा ही नहीं कि जीतने के लिए खेल रहे है, ऊपर से धोनी का नीचे उतरना, उसी तरह है जैसे गेंद हाथ में लेकर स्प्रिंट लगाने वाले आदमी ने, गेंद थ्रो करने का फैसला कर लिया हो। हार जीत, ये सब खेल का हिस्सा है, कभी किसी के पास तो कभी किसी के पास।लेकिन जज्बा और दिलेरी  से तो कोई कंप्रोमाइज नहीं होना चाहिए, धोनी को इस वक्त फैसला करने की जरूरत है कि वो क्या करना चाहते है, अगर नहीं खेलना है तो इंपैक्ट बुलाकर कीपिंग करके आराम कर ले, पर खेलना है तो दिलेरी के साथ खेलना होगा,पहली गेंद पर आउट हो जाओगे, हर मैच में आउट होते रहोगे, सपोर्ट करते रहेंगे, पर ये कायरता, ये बुजदिली,ये तुम्हारी लीगेसी नहीं थी कभी...

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