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Suicide Fruiting

इस साल बाज़ार में जितने जामुन दिखाई दे रहे हैं, उतने मैंने पिछले दो दशकों में कभी नहीं देखे। ​जामुन के अक्षरशः ढेर लग रहे हैं (नीचे गिर रहे हैं)। जिन पेड़ों पर पिछले साल इक्का-दुक्का फल आए थे, वे पेड़ भी इस बार जामुन से पटे पड़े हैं। जहाँ फल आए थे, वहाँ अब उन का अंबार लगना शुरू हो गया है। ​आखिर यह सब क्या चल रहा है? ​हमारी दादी/नानी हमेशा कहती थीं कि, "जिस गर्मियों में जामुन के ऐसे ढेर लगते हैं, उस साल सूखा पड़ता है।" ​बुजुर्गों का यह पारंपरिक ज्ञान वनस्पति विज्ञान (Botany) के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बिल्कुल सही और सटीक है। विज्ञान में इस दिलचस्प और उतनी ही चौंकाने वाली प्रक्रिया को "मास्टिंग" (Masting) या "स्ट्रेस फ्रूटिंग" (Stress Fruiting) कहा जाता है। ​पेड़ों द्वारा खुद को खत्म करके ज्यादा से ज्यादा फल देने के इस आखिरी प्रयास को कभी-कभी "सुसाइड फ्रूटिंग" (Suicide Fruiting) या "बंपर क्रॉप" भी कहा जाता है। ​यह असल में क्या है और इसके पीछे का विज्ञान क्या कहता है, आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं: ​१. 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट' (अस्ति...

Suicide Fruiting

इस साल बाज़ार में जितने जामुन दिखाई दे रहे हैं, उतने मैंने पिछले दो दशकों में कभी नहीं देखे।


​जामुन के अक्षरशः ढेर लग रहे हैं (नीचे गिर रहे हैं)। जिन पेड़ों पर पिछले साल इक्का-दुक्का फल आए थे, वे पेड़ भी इस बार जामुन से पटे पड़े हैं। जहाँ फल आए थे, वहाँ अब उन का अंबार लगना शुरू हो गया है।


​आखिर यह सब क्या चल रहा है?

​हमारी दादी/नानी हमेशा कहती थीं कि, "जिस गर्मियों में जामुन के ऐसे ढेर लगते हैं, उस साल सूखा पड़ता है।"


​बुजुर्गों का यह पारंपरिक ज्ञान वनस्पति विज्ञान (Botany) के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बिल्कुल सही और सटीक है। विज्ञान में इस दिलचस्प और उतनी ही चौंकाने वाली प्रक्रिया को "मास्टिंग" (Masting) या "स्ट्रेस फ्रूटिंग" (Stress Fruiting) कहा जाता है।


​पेड़ों द्वारा खुद को खत्म करके ज्यादा से ज्यादा फल देने के इस आखिरी प्रयास को कभी-कभी "सुसाइड फ्रूटिंग" (Suicide Fruiting) या "बंपर क्रॉप" भी कहा जाता है।


​यह असल में क्या है और इसके पीछे का विज्ञान क्या कहता है, आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं:


​१. 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट' (अस्तित्व की लड़ाई)

​यह प्रकृति का 'जींस को आगे बढ़ाने' (Survival of the Species) का नियम है। जब पेड़ को जमीन के नीचे पानी की भारी कमी महसूस होने लगती है या मौसम में बड़े बदलाव के संकेत मिलते हैं, तब पेड़ "डिफेंस मोड" (Defense Mode) में चला जाता है।


पेड़ को यह आभास हो जाता है कि शायद आने वाले समय में वह जीवित नहीं रह पाएगा। ऐसे में खुद को बचाने के बजाय, अपनी प्रजाति को पृथ्वी पर बनाए रखने के लिए पेड़ अपनी पूरी ऊर्जा 'बीज' (फल) तैयार करने में लगा देता है।


​२. नई पत्तियों और टहनियों पर रोक


​ऐसे साल में पेड़ नई पत्तियाँ निकालना या टहनियों को बढ़ाना पूरी तरह से बंद कर देता है, क्योंकि नई पत्तियों को जीवित रखने के लिए अधिक पानी और पोषण की आवश्यकता होती है। पेड़ उस ऊर्जा को बचाकर अपना पूरा ध्यान सिर्फ और सिर्फ जामुन का उत्पादन बढ़ाने पर केंद्रित करता है। यही कारण है कि पिछले साल जिन पेड़ों पर नाममात्र के फल थे, वे पेड़ भी इस साल फलों से लद गए हैं।


​३. बुजुर्गों की भविष्यवाणी और विज्ञान (सूखे से संबंध)


​हमारी दादी-नानी का यह आकलन बिल्कुल सटीक है, क्योंकि वनस्पतियाँ मौसम के बदलावों को इंसानों की तुलना में बहुत पहले और संवेदनशीलता से पहचान लेती हैं।


​जामुन की जड़ 'मूसला जड़' (Taproot) होती है, जो जमीन की बहुत गहरी परतों तक जाती है।

​जब भूजल स्तर (Groundwater level) अत्यधिक नीचे चला जाता है, तभी इन जड़ों को तनाव (Water Stress) महसूस होता है।


​पानी का यही तनाव आने वाले सूखे या भीषण गर्मी का संकेत होता है।


​इसीलिए, जिस वर्ष गर्मियों में जामुन की ऐसी अभूतपूर्व पैदावार होती है, वह प्रकृति का आने वाले सूखे समय के प्रति एक इशारा होता है।


​निष्कर्ष

​संक्षेप में कहें तो... जामुन का पेड़ आत्महत्या नहीं करता, बल्कि खुद का बलिदान देकर अपनी अगली पीढ़ी (बीजों) को जन्म देने का प्रयास करता है। प्रकृति का यह चक्र हैरान कर देने वाला है। यहाँ बुजुर्गों का पीढ़ियों का अनुभव और विज्ञान के सिद्धांत आपस में बिल्कुल मेल खाते हैं।


​इस साल जामुन का आनंद जरूर लें, लेकिन प्रकृति द्वारा दिए गए 'सूखे' के इस संकेत को गंभीरता से लेते हुए पानी और अन्य प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग समझदारी और बचत के साथ करने की आवश्यकता है, यही इस से सीख मिलती है!

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