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Suicide Fruiting

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Who was Prathvi Raj Kapoor

आज जब कपूर खानदान का नाम लिया जाता है, तो लोगों के सामने रणबीर कपूर, करीना कपूर और करिश्मा कपूर जैसे सितारों की तस्वीर उभरती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस विशाल विरासत की नींव एक ऐसे इंसान ने रखी थी, जिसने संघर्ष को अपनी ताकत बनाया था। वह इंसान थे पृथ्वीराज कपूर।


पृथ्वीराज कपूर केवल अभिनेता नहीं थे। वह एक आंदोलन थे। एक सोच थे। एक ऐसी विरासत थे, जिसने भारतीय सिनेमा को नई पहचान दी। उनकी जिंदगी में गरीबी थी, दर्द था, असफलताएं थीं और ऐसे फैसले थे, जिन्होंने उन्हें बाकी कलाकारों से अलग बना दिया। यही वजह है कि उनकी कहानी आज भी लोगों को प्रेरित करती है।


मां का साया बचपन में छिन गया, बुआ बनीं यशोदा


3 नवंबर 1906 को अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत में पृथ्वीनाथ कपूर का जन्म हुआ था। उनका बचपन सामान्य नहीं था। जब वह केवल तीन वर्ष के थे, तब उनकी मां का निधन हो गया। इतनी छोटी उम्र में मां का साया सिर से उठ जाना किसी भी बच्चे के लिए बड़ा आघात होता है।


उनके पिता ने बाद में दूसरी शादी कर ली। इसके बाद पृथ्वीराज को उनके दादा पेशावर ले गए। वहां उनकी बुआ ने उन्हें अपने बेटे की तरह पाला। कहा जाता है कि उन्होंने कभी उन्हें मां की कमी महसूस नहीं होने दी। यही कारण है कि पृथ्वीराज कपूर अपनी बुआ का बेहद सम्मान करते थे।


शायद यही संघर्ष उन्हें उम्र से पहले परिपक्व बना गया था।


वकील बन सकते थे, लेकिन दिल रंगमंच में बसता था


उस दौर में पढ़ाई करना बड़ी बात मानी जाती थी। पृथ्वीराज कपूर ने उच्च शिक्षा हासिल की और लॉ कॉलेज में दाखिला लिया। परिवार चाहता था कि वह वकील बनें और सम्मानजनक जीवन जिएं।


लेकिन उनके भीतर कुछ और ही चल रहा था।


बचपन से ही उन्हें रामायण और महाभारत के पात्रों की नकल करने का शौक था। जब दूसरे बच्चे खेलते थे, तब वह किरदारों को जीने की कोशिश करते थे। अभिनय उनके खून में उतर चुका था।


कॉलेज के दौरान उनके प्रोफेसर जय दलाल ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। उन्होंने पृथ्वीराज को थिएटर की दुनिया से परिचित कराया। यही वह मोड़ था, जिसने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी।


रिश्तेदारों से उधार लेकर पहुंचे थे मुंबई


आज के दौर में स्टार बनने के लिए सोशल मीडिया है। ऑडिशन हैं। एजेंसियां हैं। लेकिन उस समय ऐसा कुछ नहीं था।


पृथ्वीराज कपूर ने अभिनेता बनने का सपना देखा, लेकिन जेब खाली थी। परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी। ऐसे में उन्होंने रिश्तेदारों से पैसे उधार लिए और मुंबई की राह पकड़ ली।


यह फैसला आसान नहीं था। घर छोड़ना पड़ा। भविष्य अनिश्चित था। लेकिन उनके भीतर एक आग थी, जो उन्हें लगातार आगे बढ़ा रही थी।


मुंबई पहुंचकर उन्होंने छोटे-मोटे काम किए। संघर्ष के दिन लंबे थे। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।


केवल ₹70 की नौकरी और उसी में चलता था परिवार


मुंबई आने के बाद उन्हें इंपीरियल फिल्म कंपनी में काम मिला। वहां उनकी मासिक आय केवल 70 रुपये थी।


आज के समय में यह रकम सुनकर लोग हैरान हो सकते हैं। लेकिन उसी राशि में उन्हें परिवार संभालना था। घर चलाना था। सपनों को भी जिंदा रखना था।


कई बार परिस्थितियां कठिन हुईं। फिर भी उन्होंने अभिनय का रास्ता नहीं छोड़ा।


यही जिद आगे चलकर उन्हें भारतीय सिनेमा के सबसे सम्मानित कलाकारों में शामिल करने वाली थी।


आलम आरा से शुरू हुआ नया इतिहास


1931 में भारतीय सिनेमा की पहली बोलती फिल्म 'आलम आरा' रिलीज हुई। इस फिल्म में पृथ्वीराज कपूर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


यह केवल एक फिल्म नहीं थी। यह भारतीय सिनेमा के नए युग की शुरुआत थी।


इसके बाद उन्होंने कई फिल्मों में काम किया। उनकी दमदार आवाज और प्रभावशाली व्यक्तित्व ने दर्शकों को आकर्षित किया। धीरे-धीरे वह फिल्म उद्योग का बड़ा नाम बन गए।


लेकिन उनके दिल के सबसे करीब अभी भी थिएटर ही था।


जब अभिनेता नहीं, भिक्षुक बनकर खड़े हो जाते थे थिएटर के बाहर


साल 1944 में पृथ्वीराज कपूर ने एक सपना देखा। वह चाहते थे कि भारत में रंगमंच की संस्कृति मजबूत हो। इसी सोच से उन्होंने पृथ्वी थिएटर की स्थापना की।


लेकिन सपना देखना आसान था। उसे जिंदा रखना मुश्किल।


थिएटर से उतनी कमाई नहीं होती थी, जितनी फिल्मों से होती थी। आर्थिक संकट बढ़ने लगा। कलाकारों का खर्च उठाना कठिन हो गया।


कहा जाता है कि कई बार नाटक समाप्त होने के बाद पृथ्वीराज खुद झोली लेकर थिएटर के बाहर खड़े हो जाते थे। दर्शक जो भी सहयोग देते, उसी से थिएटर का काम चलता था।


सोचिए, एक बड़ा अभिनेता, जो फिल्मों में लोकप्रिय था, वह अपने कलाकारों और थिएटर को बचाने के लिए लोगों से सहायता मांग रहा था।


यही समर्पण उन्हें महान बनाता है।


पंडित नेहरू को भी कह दिया था 'ना'


पृथ्वीराज कपूर और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बीच अच्छे संबंध थे। दोनों एक-दूसरे का सम्मान करते थे।


लेकिन पृथ्वीराज कपूर किसी के सामने झुकने वालों में नहीं थे।


एक प्रसिद्ध किस्से के अनुसार, एक बार नेहरू ने उनसे मिलने की इच्छा जताई। उस समय पृथ्वीराज किसी जरूरी काम में व्यस्त थे। उन्होंने मिलने से इनकार कर दिया।


यह सुनकर लोग हैरान रह गए।


उस दौर में प्रधानमंत्री को मना करना आसान नहीं था। लेकिन पृथ्वीराज कपूर अपने सिद्धांतों पर चलने वाले व्यक्ति थे। बाद में दोनों की मुलाकात हुई और साथ में भोजन भी किया।


यही घटना उनके आत्मसम्मान और स्पष्ट व्यक्तित्व को दर्शाती है।


राज्यसभा पहुंचने वाले पहले अभिनेता


साल 1952 में पृथ्वीराज कपूर को राज्यसभा का मनोनीत सदस्य बनाया गया।


यह भारतीय इतिहास का महत्वपूर्ण क्षण था। पहली बार किसी अभिनेता को इस सम्मान के लिए चुना गया था।


उन्होंने लगभग आठ वर्षों तक राज्यसभा में अपनी जिम्मेदारियां निभाईं। कला और संस्कृति से जुड़े मुद्दों को मजबूती से उठाया।


इससे साबित हुआ कि वह केवल अभिनेता नहीं थे। वह समाज और देश के प्रति भी गंभीर सोच रखते थे।


मुगल-ए-आजम में अकबर बनकर अमर हो गए


जब भी भारतीय सिनेमा की महान फिल्मों का जिक्र होता है, 'मुगल-ए-आजम' का नाम जरूर लिया जाता है।


इस फिल्म में पृथ्वीराज कपूर ने सम्राट अकबर की भूमिका निभाई थी।


एक दृश्य में उन्हें चिश्ती की दरगाह तक नंगे पैर चलना था। गर्म रेत थी। तेज धूप थी। लेकिन उन्होंने शूटिंग नहीं रोकी।


निर्देशक के. आसिफ के "कट" बोलने तक वह चलते रहे।


यही समर्पण उनके अभिनय को असाधारण बनाता था।


एक विरासत, जो आज भी जिंदा है


पृथ्वीराज कपूर ने केवल अपना करियर नहीं बनाया। उन्होंने एक ऐसा परिवार तैयार किया, जिसने भारतीय सिनेमा को दशकों तक दिशा दी।


राज कपूर ने शोमैन बनकर इतिहास रचा। शम्मी कपूर ने नई शैली दी। शशि कपूर ने अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।


फिर करिश्मा कपूर, करीना कपूर और रणबीर कपूर जैसी पीढ़ियां सामने आईं।


लेकिन इस विशाल वृक्ष की जड़ें एक ही व्यक्ति में थीं।


29 मई 1972 को पृथ्वीराज कपूर इस दुनिया को अलविदा कह गए। मगर उनकी विरासत आज भी जीवित है।


कपूर खानदान की हर सफलता के पीछे एक ऐसा संघर्ष छिपा है, जिसकी शुरुआत एक युवक ने उधार के पैसों से मुंबई आकर की थी। वही युवक आगे चलकर भारतीय सिनेमा का स्तंभ बना। वही पृथ्वीराज कपूर थे।


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