सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Suicide Fruiting

इस साल बाज़ार में जितने जामुन दिखाई दे रहे हैं, उतने मैंने पिछले दो दशकों में कभी नहीं देखे। ​जामुन के अक्षरशः ढेर लग रहे हैं (नीचे गिर रहे हैं)। जिन पेड़ों पर पिछले साल इक्का-दुक्का फल आए थे, वे पेड़ भी इस बार जामुन से पटे पड़े हैं। जहाँ फल आए थे, वहाँ अब उन का अंबार लगना शुरू हो गया है। ​आखिर यह सब क्या चल रहा है? ​हमारी दादी/नानी हमेशा कहती थीं कि, "जिस गर्मियों में जामुन के ऐसे ढेर लगते हैं, उस साल सूखा पड़ता है।" ​बुजुर्गों का यह पारंपरिक ज्ञान वनस्पति विज्ञान (Botany) के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बिल्कुल सही और सटीक है। विज्ञान में इस दिलचस्प और उतनी ही चौंकाने वाली प्रक्रिया को "मास्टिंग" (Masting) या "स्ट्रेस फ्रूटिंग" (Stress Fruiting) कहा जाता है। ​पेड़ों द्वारा खुद को खत्म करके ज्यादा से ज्यादा फल देने के इस आखिरी प्रयास को कभी-कभी "सुसाइड फ्रूटिंग" (Suicide Fruiting) या "बंपर क्रॉप" भी कहा जाता है। ​यह असल में क्या है और इसके पीछे का विज्ञान क्या कहता है, आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं: ​१. 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट' (अस्ति...

Who was Prathvi Raj Kapoor

आज जब कपूर खानदान का नाम लिया जाता है, तो लोगों के सामने रणबीर कपूर, करीना कपूर और करिश्मा कपूर जैसे सितारों की तस्वीर उभरती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस विशाल विरासत की नींव एक ऐसे इंसान ने रखी थी, जिसने संघर्ष को अपनी ताकत बनाया था। वह इंसान थे पृथ्वीराज कपूर।


पृथ्वीराज कपूर केवल अभिनेता नहीं थे। वह एक आंदोलन थे। एक सोच थे। एक ऐसी विरासत थे, जिसने भारतीय सिनेमा को नई पहचान दी। उनकी जिंदगी में गरीबी थी, दर्द था, असफलताएं थीं और ऐसे फैसले थे, जिन्होंने उन्हें बाकी कलाकारों से अलग बना दिया। यही वजह है कि उनकी कहानी आज भी लोगों को प्रेरित करती है।


मां का साया बचपन में छिन गया, बुआ बनीं यशोदा


3 नवंबर 1906 को अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत में पृथ्वीनाथ कपूर का जन्म हुआ था। उनका बचपन सामान्य नहीं था। जब वह केवल तीन वर्ष के थे, तब उनकी मां का निधन हो गया। इतनी छोटी उम्र में मां का साया सिर से उठ जाना किसी भी बच्चे के लिए बड़ा आघात होता है।


उनके पिता ने बाद में दूसरी शादी कर ली। इसके बाद पृथ्वीराज को उनके दादा पेशावर ले गए। वहां उनकी बुआ ने उन्हें अपने बेटे की तरह पाला। कहा जाता है कि उन्होंने कभी उन्हें मां की कमी महसूस नहीं होने दी। यही कारण है कि पृथ्वीराज कपूर अपनी बुआ का बेहद सम्मान करते थे।


शायद यही संघर्ष उन्हें उम्र से पहले परिपक्व बना गया था।


वकील बन सकते थे, लेकिन दिल रंगमंच में बसता था


उस दौर में पढ़ाई करना बड़ी बात मानी जाती थी। पृथ्वीराज कपूर ने उच्च शिक्षा हासिल की और लॉ कॉलेज में दाखिला लिया। परिवार चाहता था कि वह वकील बनें और सम्मानजनक जीवन जिएं।


लेकिन उनके भीतर कुछ और ही चल रहा था।


बचपन से ही उन्हें रामायण और महाभारत के पात्रों की नकल करने का शौक था। जब दूसरे बच्चे खेलते थे, तब वह किरदारों को जीने की कोशिश करते थे। अभिनय उनके खून में उतर चुका था।


कॉलेज के दौरान उनके प्रोफेसर जय दलाल ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। उन्होंने पृथ्वीराज को थिएटर की दुनिया से परिचित कराया। यही वह मोड़ था, जिसने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी।


रिश्तेदारों से उधार लेकर पहुंचे थे मुंबई


आज के दौर में स्टार बनने के लिए सोशल मीडिया है। ऑडिशन हैं। एजेंसियां हैं। लेकिन उस समय ऐसा कुछ नहीं था।


पृथ्वीराज कपूर ने अभिनेता बनने का सपना देखा, लेकिन जेब खाली थी। परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी। ऐसे में उन्होंने रिश्तेदारों से पैसे उधार लिए और मुंबई की राह पकड़ ली।


यह फैसला आसान नहीं था। घर छोड़ना पड़ा। भविष्य अनिश्चित था। लेकिन उनके भीतर एक आग थी, जो उन्हें लगातार आगे बढ़ा रही थी।


मुंबई पहुंचकर उन्होंने छोटे-मोटे काम किए। संघर्ष के दिन लंबे थे। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।


केवल ₹70 की नौकरी और उसी में चलता था परिवार


मुंबई आने के बाद उन्हें इंपीरियल फिल्म कंपनी में काम मिला। वहां उनकी मासिक आय केवल 70 रुपये थी।


आज के समय में यह रकम सुनकर लोग हैरान हो सकते हैं। लेकिन उसी राशि में उन्हें परिवार संभालना था। घर चलाना था। सपनों को भी जिंदा रखना था।


कई बार परिस्थितियां कठिन हुईं। फिर भी उन्होंने अभिनय का रास्ता नहीं छोड़ा।


यही जिद आगे चलकर उन्हें भारतीय सिनेमा के सबसे सम्मानित कलाकारों में शामिल करने वाली थी।


आलम आरा से शुरू हुआ नया इतिहास


1931 में भारतीय सिनेमा की पहली बोलती फिल्म 'आलम आरा' रिलीज हुई। इस फिल्म में पृथ्वीराज कपूर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


यह केवल एक फिल्म नहीं थी। यह भारतीय सिनेमा के नए युग की शुरुआत थी।


इसके बाद उन्होंने कई फिल्मों में काम किया। उनकी दमदार आवाज और प्रभावशाली व्यक्तित्व ने दर्शकों को आकर्षित किया। धीरे-धीरे वह फिल्म उद्योग का बड़ा नाम बन गए।


लेकिन उनके दिल के सबसे करीब अभी भी थिएटर ही था।


जब अभिनेता नहीं, भिक्षुक बनकर खड़े हो जाते थे थिएटर के बाहर


साल 1944 में पृथ्वीराज कपूर ने एक सपना देखा। वह चाहते थे कि भारत में रंगमंच की संस्कृति मजबूत हो। इसी सोच से उन्होंने पृथ्वी थिएटर की स्थापना की।


लेकिन सपना देखना आसान था। उसे जिंदा रखना मुश्किल।


थिएटर से उतनी कमाई नहीं होती थी, जितनी फिल्मों से होती थी। आर्थिक संकट बढ़ने लगा। कलाकारों का खर्च उठाना कठिन हो गया।


कहा जाता है कि कई बार नाटक समाप्त होने के बाद पृथ्वीराज खुद झोली लेकर थिएटर के बाहर खड़े हो जाते थे। दर्शक जो भी सहयोग देते, उसी से थिएटर का काम चलता था।


सोचिए, एक बड़ा अभिनेता, जो फिल्मों में लोकप्रिय था, वह अपने कलाकारों और थिएटर को बचाने के लिए लोगों से सहायता मांग रहा था।


यही समर्पण उन्हें महान बनाता है।


पंडित नेहरू को भी कह दिया था 'ना'


पृथ्वीराज कपूर और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बीच अच्छे संबंध थे। दोनों एक-दूसरे का सम्मान करते थे।


लेकिन पृथ्वीराज कपूर किसी के सामने झुकने वालों में नहीं थे।


एक प्रसिद्ध किस्से के अनुसार, एक बार नेहरू ने उनसे मिलने की इच्छा जताई। उस समय पृथ्वीराज किसी जरूरी काम में व्यस्त थे। उन्होंने मिलने से इनकार कर दिया।


यह सुनकर लोग हैरान रह गए।


उस दौर में प्रधानमंत्री को मना करना आसान नहीं था। लेकिन पृथ्वीराज कपूर अपने सिद्धांतों पर चलने वाले व्यक्ति थे। बाद में दोनों की मुलाकात हुई और साथ में भोजन भी किया।


यही घटना उनके आत्मसम्मान और स्पष्ट व्यक्तित्व को दर्शाती है।


राज्यसभा पहुंचने वाले पहले अभिनेता


साल 1952 में पृथ्वीराज कपूर को राज्यसभा का मनोनीत सदस्य बनाया गया।


यह भारतीय इतिहास का महत्वपूर्ण क्षण था। पहली बार किसी अभिनेता को इस सम्मान के लिए चुना गया था।


उन्होंने लगभग आठ वर्षों तक राज्यसभा में अपनी जिम्मेदारियां निभाईं। कला और संस्कृति से जुड़े मुद्दों को मजबूती से उठाया।


इससे साबित हुआ कि वह केवल अभिनेता नहीं थे। वह समाज और देश के प्रति भी गंभीर सोच रखते थे।


मुगल-ए-आजम में अकबर बनकर अमर हो गए


जब भी भारतीय सिनेमा की महान फिल्मों का जिक्र होता है, 'मुगल-ए-आजम' का नाम जरूर लिया जाता है।


इस फिल्म में पृथ्वीराज कपूर ने सम्राट अकबर की भूमिका निभाई थी।


एक दृश्य में उन्हें चिश्ती की दरगाह तक नंगे पैर चलना था। गर्म रेत थी। तेज धूप थी। लेकिन उन्होंने शूटिंग नहीं रोकी।


निर्देशक के. आसिफ के "कट" बोलने तक वह चलते रहे।


यही समर्पण उनके अभिनय को असाधारण बनाता था।


एक विरासत, जो आज भी जिंदा है


पृथ्वीराज कपूर ने केवल अपना करियर नहीं बनाया। उन्होंने एक ऐसा परिवार तैयार किया, जिसने भारतीय सिनेमा को दशकों तक दिशा दी।


राज कपूर ने शोमैन बनकर इतिहास रचा। शम्मी कपूर ने नई शैली दी। शशि कपूर ने अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।


फिर करिश्मा कपूर, करीना कपूर और रणबीर कपूर जैसी पीढ़ियां सामने आईं।


लेकिन इस विशाल वृक्ष की जड़ें एक ही व्यक्ति में थीं।


29 मई 1972 को पृथ्वीराज कपूर इस दुनिया को अलविदा कह गए। मगर उनकी विरासत आज भी जीवित है।


कपूर खानदान की हर सफलता के पीछे एक ऐसा संघर्ष छिपा है, जिसकी शुरुआत एक युवक ने उधार के पैसों से मुंबई आकर की थी। वही युवक आगे चलकर भारतीय सिनेमा का स्तंभ बना। वही पृथ्वीराज कपूर थे।


टिप्पणियाँ

Best From the Author

Not demonic, just introverted! आसुरी नहीं, अंतर्मुखी!

मैं 27 मूल नक्षत्रों, शनिवार और 22 तारीख को जन्मा व्यक्ति हूँ — एक ऐसा जन्म‑संयोग जो न सिर्फ़ मेरी तिथि बताता है, बल्कि मेरे भीतर की गहराई, द्वंद्व और अस्थिरता का भी संकेत देता है। राहु के प्रबल और दूरदर्शी प्रभाव ने मेरे व्यक्तित्व को सीधे, सरल और सतही नहीं रहने दिया; मैं विचारों की उस गहरी खाई में अक्सर भटक जाता हूँ, जहाँ हर बात बस बाहरी रूप नहीं, बल्कि भीतरी अर्थ भी धरती होता है। मैं हर निर्णय के पीछे छिपे संभावित नतीजों, अनजाने खतरों और छिपी हुई उम्मीदों को भी देखने का आदी हूँ।   कभी‑कभी लोग मेरे कार्यों, अभिव्यक्ति और निर्णयों को असामान्य, अत्यंत गहन या यहाँ तक कि “आसुरी” समझने लगते हैं, क्योंकि मेरी सोच उनकी सामान्य धारणाओं की रेखाओं से बाहर निकल जाती है। पर यह आसुरी नहीं, बस एक टूटी हुई, खुरदरी और अत्यंत ईमानदार आत्मा की आवाज़ है, जो दिखावे की दुनिया से थक चुकी है और अपने सच्चे रूप में जीना चाहती है। मैं जब भी बोलता हूँ, तो बस शब्द नहीं बोलता, बल्कि उसके पीछे समा दर्द, संघर्ष, अनुभव और उम्मीदों को भी लाता हूँ।   मेरी पहचान में ग्रहों का भी बड़ा हाथ है। जब ग्रह ही वही है...

Suicide Fruiting

इस साल बाज़ार में जितने जामुन दिखाई दे रहे हैं, उतने मैंने पिछले दो दशकों में कभी नहीं देखे। ​जामुन के अक्षरशः ढेर लग रहे हैं (नीचे गिर रहे हैं)। जिन पेड़ों पर पिछले साल इक्का-दुक्का फल आए थे, वे पेड़ भी इस बार जामुन से पटे पड़े हैं। जहाँ फल आए थे, वहाँ अब उन का अंबार लगना शुरू हो गया है। ​आखिर यह सब क्या चल रहा है? ​हमारी दादी/नानी हमेशा कहती थीं कि, "जिस गर्मियों में जामुन के ऐसे ढेर लगते हैं, उस साल सूखा पड़ता है।" ​बुजुर्गों का यह पारंपरिक ज्ञान वनस्पति विज्ञान (Botany) के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बिल्कुल सही और सटीक है। विज्ञान में इस दिलचस्प और उतनी ही चौंकाने वाली प्रक्रिया को "मास्टिंग" (Masting) या "स्ट्रेस फ्रूटिंग" (Stress Fruiting) कहा जाता है। ​पेड़ों द्वारा खुद को खत्म करके ज्यादा से ज्यादा फल देने के इस आखिरी प्रयास को कभी-कभी "सुसाइड फ्रूटिंग" (Suicide Fruiting) या "बंपर क्रॉप" भी कहा जाता है। ​यह असल में क्या है और इसके पीछे का विज्ञान क्या कहता है, आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं: ​१. 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट' (अस्ति...

काग के भाग बड़े सजनी

  पितृपक्ष में रसखान रोते हुए मिले। सजनी ने पूछा -‘क्यों रोते हो हे कवि!’ कवि ने कहा:‘ सजनी पितृ पक्ष लग गया है। एक बेसहारा चैनल ने पितृ पक्ष में कौवे की सराहना करते हुए एक पद की पंक्ति गलत सलत उठायी है कि कागा के भाग बड़े, कृश्न के हाथ से रोटी ले गया।’ सजनी ने हंसकर कहा-‘ यह तो तुम्हारी ही कविता का अंश है। जरा तोड़मरोड़कर प्रस्तुत किया है बस। तुम्हें खुश होना चाहिए । तुम तो रो रहे हो।’ कवि ने एक हिचकी लेकर कहा-‘ रोने की ही बात है ,हे सजनी! तोड़मोड़कर पेश करते तो उतनी बुरी बात नहीं है। कहते हैं यह कविता सूरदास ने लिखी है। एक कवि को अपनी कविता दूसरे के नाम से लगी देखकर रोना नहीं आएगा ? इन दिनों बाबरी-रामभूमि की संवेदनशीलता चल रही है। तो क्या जानबूझकर रसखान को खान मानकर वल्लभी सूरदास का नाम लगा दिया है। मनसे की तर्ज पर..?’ खिलखिलाकर हंस पड़ी सजनी-‘ भारतीय राजनीति की मार मध्यकाल तक चली गई कविराज ?’ फिर उसने अपने आंचल से कवि रसखान की आंखों से आंसू पोंछे और ढांढस बंधाने लगी।  दृष्य में अंतरंगता को बढ़ते देख मैं एक शरीफ आदमी की तरह आगे बढ़ गया। मेरे साथ रसखान का कौवा भी कांव कांव करता चला आ...

अफगानी तालिबान एवं ISIS के झंडों पर आखिर लिखा क्या होता है? What is written on New flag of Afghanistan & ISIS flag? A blogpost by Abiiinabu

अफगानी तालिबान एवं ISIS के झंडों पर आखिर लिखा क्या होता है? What is written on New flag of Afghanistan & ISIS flag? ISIS ke jhande pr kya likha hota hai? जिहाद के काले झंडे ISIS , ALQEIDA और कई अन्य इस्लामिक चरमपंथी संगठनों द्वारा समय-समय पर प्रदर्शित किए जाते हैं, और युद्ध के समय पर प्रदर्शित किए जाते रहे हैं। लेकिन यही झंडे बाहर की दुनिया में एक अजीब खौफ और उत्सुकता भी पैदा करते रहे हैं. इस्लामिक ध्वज, उसका रंग, उसकी भाषा, उसके निशान और यहां तक कि झंडों के ऊपर लिखी धार्मिक सूक्तियां भी बाहरी दुनिया को अपनी और आकर्षित करने में सफल रही हैं। Isis Flag       लेकिन यह चरमपंथी संगठन जिस ध्वज का प्रदर्शन करके चरमपंथ की नई परिभाषा एवं कट्टरवाद को प्रदर्शित करते रहे हैं उसका इतिहास उसके वर्तमान परिपेक्ष से बिल्कुल जुदा है। इतिहास को जानने वाले यहां तक कहते हैं कि इस झंडे का उपयोग केवल व्यक्तिगत चरमपंथ को बढ़ावा देने, एवं स्वार्थ सिद्धि के लिए ही अधिकतर हुआ है। आतंकवादी संगठन इसे अपने तरीके से तोड़ मरोड़ कर पेश करते हैं और केवल अपने स्वार्थ के लिए इसका उपयोग करते हैं यह...

Who are Gandharvas?

  Gandharvas were a strong powerful race. Their strength would be at its nadir after sunset. Earlier, when Pandu’s sons were in disguise, after Duryodhan had tried to char them to death, they had a close encounter with Gandharva king Angaraparna in the forest. After days of walking tirelessly they reached the holy river Ganga with Arjun in the lead to show the way. King Angaraparna was sporting in the river waters with his wives. Gandharvas were considered to be stronger than men having strong attachment for wealth and material things. The king was enraged at seeing strangers in the vicinity of his kingdom. He roared at them. He felt that the Ganges and the neighbouring forest Angaraparna was his private abode and no one dare set foot on its soil after sunset. Arjun was angry. How could anyone express ownership on the rivers and the forests! Only the weak submitted to power. This argument angered Angaraparna. He challenged the Pandav to a duel. Arjuna used the Agni weapon given to ...