इस साल बाज़ार में जितने जामुन दिखाई दे रहे हैं, उतने मैंने पिछले दो दशकों में कभी नहीं देखे। जामुन के अक्षरशः ढेर लग रहे हैं (नीचे गिर रहे हैं)। जिन पेड़ों पर पिछले साल इक्का-दुक्का फल आए थे, वे पेड़ भी इस बार जामुन से पटे पड़े हैं। जहाँ फल आए थे, वहाँ अब उन का अंबार लगना शुरू हो गया है। आखिर यह सब क्या चल रहा है? हमारी दादी/नानी हमेशा कहती थीं कि, "जिस गर्मियों में जामुन के ऐसे ढेर लगते हैं, उस साल सूखा पड़ता है।" बुजुर्गों का यह पारंपरिक ज्ञान वनस्पति विज्ञान (Botany) के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बिल्कुल सही और सटीक है। विज्ञान में इस दिलचस्प और उतनी ही चौंकाने वाली प्रक्रिया को "मास्टिंग" (Masting) या "स्ट्रेस फ्रूटिंग" (Stress Fruiting) कहा जाता है। पेड़ों द्वारा खुद को खत्म करके ज्यादा से ज्यादा फल देने के इस आखिरी प्रयास को कभी-कभी "सुसाइड फ्रूटिंग" (Suicide Fruiting) या "बंपर क्रॉप" भी कहा जाता है। यह असल में क्या है और इसके पीछे का विज्ञान क्या कहता है, आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं: १. 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट' (अस्ति...
लखनऊ के आख़िरी नवाब साब वाजिद अली शाह पर अनेक पोस्टें लिखी है। जानेआलम से मज़ेदार किरदार इतिहास में ढूँढे ना मिलता। परले दर्जे के नाज़ुकनर्मा औरतबाज़ आदमी रहे थे नवाब साब। हद से जियादा मोटे और अत्यधिक पान तंबाकू खाने से नवाब के सब दांत सड़ गए थे- लेकिन कबाब खाने की उल्फ़त ख़त्म ना हुई थी। इसके चलते नवाब के भक्षण हेतु गलौती कबाब बनाये गये जिन्हें वो सीधे सीधे निगल ले- दांत से चबाने की ज़रूरत ही ना पड़ें। नवाब वाजिद अली शाह को दो शौक़ सरचढ़े थे- पहला औरतबाज़ी का और दूसरा शायरी करने का। इन दोनों शौक़ों को नवाब साब ने कैसे मिक्स किया- उसकी एक मिसाल देखें हज़रतऐआला। नवाब ने नई नई रिसाले और नई पलटने बनाई- रिसालों के नाम रखे: बाँका, तिरछा, घनघोर। जवान हसीन शोख़ औरतों की दो पलटन बनाई जिनके नाम रखे अख़्तरी और नादरी। इन जनाना पलटनों की परेड और उनका अभ्यास नवाब साब ख़ुद अपनी देख रेख में करवाते थे। इन औरतों को पलटन की कमांड देने हेतु नवाब ने ख़ास फ़ारसी शब्दों का गठन किया मसलन इन औरतों को सीधे चलने हेतु कहते- रास्त रौ। पीछे घूमने के लिए कहते- पस बया। लेफ्ट घूमने के लिए कहते- दस्तरचप बग़रीद। न...