सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

प्रेमचंद के फटे जूते

  प्रेमचंद का एक चित्र मेरे सामने है, पत्नी के साथ फ़ोटो खिंचा रहे हैं. सिर पर किसी मोटे कपड़े की टोपी, कुरता और धोती पहने हैं. कनपटी चिपकी है, गालों की हड्डियां उभर आई हैं, पर घनी मूंछें चेहरे को भरा-भरा बतलाती हैं. पांवों में केनवस के जूते हैं, जिनके बंद बेतरतीब बंधे हैं. लापरवाही से उपयोग करने पर बंद के सिरों पर की लोहे की पतरी निकल जाती है और छेदों में बंद डालने में परेशानी होती है. तब बंद कैसे भी कस लिए जाते हैं. दाहिने पांव का जूता ठीक है, मगर बाएं जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अंगुली बाहर निकल आई है. मेरी दृष्टि इस जूते पर अटक गई है. सोचता हूं-फ़ोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी-इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है. यह जैसा है, वैसा ही फ़ोटो में खिंच जाता है. मैं चेहरे की तरफ़ देखता हूं. क्या तुम्हें मालूम है, मेरे साहित्यिक पुरखे कि तुम्हारा जूता फट गया है और अंगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हें इसका ज़रा भी अहसास नहीं है? ज़रा लज्जा, संकोच या झेंप नहीं है? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि धोती को थोड़ा न...

सिखों का खालिस्तानी अभियान क्या है? Everything about KHALISTAN MOVEMENT 1984, Details about Khalistani movement, Blogpost by Abiiinabu

सिखों का खालिस्तानी अभियान क्या है? Everything about KHALISTAN MOVEMENT 1984, Details about Khalistani movement


                महीनों से चले आ रहे किसान आंदोलन ने विगत 26 जनवरी को हिंसक रूप ले लिया। जिसमे किसानों ने ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर पर लहरा रहे राष्ट्रध्वज को उतर कर उसकी निशान साहिब वाले खालिस्तानी झंडे को फहरा दिया। किसानों की ट्रैक्टर रैल्ली अपने रस्ते से भटक गई और अराजक तत्वों ने लाल किले की हिंसा को अंजाम दिया। भीड़ ने पुलिस के साथ भी हिंसा की। क्या है खालिस्तान ? क्या है पूरी कहानी? आज के इस पोस्ट में हम आपको बतायेंगे। तो तैयार हो जाइये इस नॉलेज से लबालब भरी इस डोज़ के लिए -

  • Khalistan क्या है?

          खालिस्तान, जिसका शाब्दिक अर्थ है-  पवित्र स्थान।  जिसको पंजाब माना गया है।  यह सिखों का एक राष्ट्रवाद आंदोलन है जिसका उद्देश्य था, अखंड भारत के पंजाब राज्य ( वर्तमान भारत एवं पकिस्तान, दोनों के पंजाब प्रान्त का संयुक्त रूप) को अलग देश बनाया जाये।  और इस उद्देश्य को पूरा करने हेतु एक अभियान चलाया गया जिसे खालिस्तानी आंदोलन कहते हैं।

                सिक्खों के चौथे गुरु, गुरु रामदास ने 16वीं शताब्दी में अमृतसर शहर की स्थापना की। और पंचम गुरु अर्जन देव ने हरमंदिर साहब की स्थापना की जहां आदि ग्रन्थ साहेब ( सिक्खों की पवित्र पुस्तक) को रखा गया। आधी ग्रन्थ साहब में गुरु नानक देव की शिक्षाएं एवं प्रवचन संकलित हैं।  हरमंदिर साहिब को सिख राजा, राजा रणजीत सिंह ने सोने से मँढ़वा दिए था जिस कारण इसको स्वर्ण मंदिर कहा जाने लगा। गुरु अर्जन देव को मुग़ल बादशाह जहांगीर ने अपने विद्रोही पुत्र खुसरो को शरण देने की वजह से खौलते पानी और गर्म रेत से भरे कढाहे में बैठा कर खौलते तेल को उनके ऊपर डालकर हत्या कर दी। जिसके कारण सिखों और मुग़लों के बीच कई हिंसक झड़पें हुई।

                मुगलों से लड़ते लड़ते सिख कई मिसलों में बंट गए जिनको महाराजा रणजीत सिंह ने 1799 में एकीकृत कर दिया और एक एक सिख राज्य की स्थापना की जिसकी राजधानी लाहौर बनाई गई। 1889 में सिख सेना द्वितीय सिख आंग्ल युद्ध में अंग्रेजों से पराजित हुई और अंग्रेजो ने पंजाब फतह कर लिया।

                सन 1920 में, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी जो सिखों की धार्मिक समिति थी, अकाली दल के नाम से राजनीति में प्रवेश करती है। और 1947 में आजादी के बाद हुए पंजाब के बंटवारे और उसमे मारे गए सिखों को ध्यान में रखते हुए; एक अलग सिख प्रधान राज्य की स्थापना की मांग की।  जिसे राज्य पुनर्निर्माण आयोग ने ख़ारिज कर दिया।  जिसके बाद सिख दो पक्षों में बंट गए।  पहले वो जो यह कहते थे कि हमको अलग राज्य चाहिए और दूसरे वो जो ये कहते थे कि यदि राज्य नहीं देना तो हमको अलग देश बनाने के लिए देदो।  इस प्रकार खालिस्तान आंदोलन की नींव पड़ी।  

  • पंजाब का विघटन : हरयाणा एवं हिमाचल प्रदेश की स्थापना :- 

     उपरोख मानचित्र के आधार पर यह कह सकते हैं कि पंजाब को अलग अलग वर्षों में अलग अलग तरीके से बांटा गया।  पंजाब को मूल से भाषा के आधार पर बांटा गया। पंजाब का दक्षिणी हिस्सा जहाँ हिंदी भाषा अधिकता से बोली जाती थी उसको अलग करके हरियाणा बना दिए गया और उत्तर के क्षेत्र जहाँ पहाड़ी भाषा बोली अधिक बोली जाती उसको अलग करके हिमाचल प्रदेश बना दिया गया । और बचे हुए उत्तरी हिस्से में सिख धर्म को मानने वाले लोग अधिक थे जो पंजाबी भाषा बोलते थे।  इस प्रकार पंजाब का विघटन कर दिया गया।

  • खालिस्तानी देश की  मांग विदेश से :-

                1970 के दशक में सिख नेता जगजीत सिंह चौहान यूनाइटेड किंगडम, कनाडा और अमेरिका जैसे देशों में जाकर यह घोषणा करते हैं   कि खालिस्तान एक अलग देश है।  और ऐसा वो वहां से प्रतिष्ठित अख़बारों में भी छपवाते हैं लेकिन शिरोमणि अकाली दाल ने कभी भी अलग देश कि मांग का समर्थन नहीं किया। जिससे सिख दो गुटों में बाँटना आरम्भ हो गए। 1973 में आनंदपुर रेसोलुशन लाया गया जिसको तात्कालिक प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अलगाववादी कह कर दरकिनार कर दिया। 

  • भारत में इमरजेंसी और पंजाब में भिंडरावाले का उद्भव :-

                    1975 से 1977 तक भारत में इंदिरा गाँधी ने इमरजेंसी लगा दी और जब इमरजेंसी हटी तो इंदिरा गाँधी को सत्ता से हाथ धोना पड़ा।  इमरजेंसी से पहले पंजाब और केंद्र दोनों में कांग्रेस कि सरकार थी, जो 77 के चुनाव के बाद पंजाब में अकाली दल और केंद्र में जनता पार्टी कि सरकार अस्तित्व में आई।  राजनैतिक उठापटक में उस दौर में कांग्रेस को पंजाब में एक ऐसे करिश्माई नेता कि आवश्यकता थी जो पंजाब में बढ़ते जा रहे अकाली दल के रसूह को कुछ कम कर सके और सिख वोट का बंटवारा कर सके जिससे कांग्रेस फिर से सत्ता में आ सके।

     जरनैल सिंह भिंडरावाले जिन्हे कुछ लोग धार्मिक ज्ञाता होने के कारण संत कि उपाधि देते हैं, 1977 में सिख धार्मिक पीठ दमदमी टकसाल के मुखिया चुने जाते हैं ।उन्हें कांग्रेस नेता ज्ञानी ज़ैल सिंह के कहने पर अकाली दल को रोकने के लिए चुनते हैं और उनकी चरमपंथी विचारधारा को आगे बढ़ने देते हैं। जब नास मनुज पर छाता है पहले विवेक मर जाता है, इसी प्रकार केवल अपने राजनीतिक फायदे के लिए भिंडरावाले का समर्थन दिया।  धीरे धीरे भिंडरावाले की साख पंजाब में बढ़ने लगी और अकाली दल चिंतित रहने लगा। 

  • धर्म युद्ध मोर्चा :-

                अकाली दल के नेता हरचंद सिंह लोंगोवाल ने भिंडरावाले से हाथ मिला कर आनंदपु रेसोलुशन को लागू करने की मांग पर फिर से बातचीत शुरू की। जिसके विरोध में पंजाब में धरने प्रदर्शन होने लगे और जब तात्कालिक सरकार ने दमन किआ तो दंगे और भड़क गए जिसके कारण आनंदपु रेसोलुशन के समर्थकों ने नई दिल्ली में होने वाले एशियाई खेलो के सामने विरोध करने का फैसला लिया।   जिसके कारण पंजाब से हरियाणा और दिल्ली आने वाले सिक्खों की तलाशी ली जाने लगी।  इसी बीच धर्म युद्ध मोर्चा का दमन करने वाले DIG AS अटवाल की स्वर्ण मंदिर की सीढ़ियों पर हत्या कर दी गई।  स्थानीय पुलिस में इससे दहशत फ़ैल गई जिसके कारण 2 घंटे तक अटवाल साहब का शव वहीँ पड़ा रहा, कोई भी पुलिस वाला उसको उठाने की हिम्मत न जुटा सका।

            हत्या के शक की सुई भिंडरावाले और उसके सहयोगियों पर गई, लेकिन तात्कालिक सरकार ने अपनी राजनीतिक हानि का हवाला देते हुए कोई भी कदम उठाने से मना कर दिया। स्थानीय नागरिकों का ये भी कहना है कि स्वर्ण मंदिर के अंदर भिंडरावाले और उसके समर्थकों ने हथियार भी रखने शुरू कर दिए थे। इसी बीच अक्टूबर 1983 में पंजाब रोडवेज की बस में से छंट छंट कर हिन्दुओं को निकाला गया और 6 हिन्दुओं की गोली मार कर हत्या कर दी गई।  इससे केंद्र सरकार हरकत में आई और पंजाब में राष्ट्रपति शासन लगा दिए गया। लेकिन हरमंदिर साहिब में हथियार जमा करने का काम नहीं रुका , ट्रकों की संख्या में AK- 47 जमा की जाने लगी।  इसी बीच भिंडरावाले ने अपने समर्थकों के साथ मिलकर अकाल तख़्त पर कब्ज़ा जमा लिया।   तात्कालिक प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने मामले की नजाकत को समझते हुए शांति वार्ता करने नरसिम्हा राव को भेजा जिन्होंने अकाली दल के नेताओं को अपने पक्ष में कर लिया, लेकिन जब अकाली दल के नेतों ने भिंडरावाले से बात की तो उसने शांति वार्ता की शतों को मानने से साफ़ इंकार कर दिया।

  • Operation Blue Star :-

 इधर भिंडरावाले ने शांति वार्ता मानने से इंकार कर दिया और उधर पंजाब में हिंसा बढ़ती जा रही थी।  जिससे निजात पाने को सराकर ने बल प्रयोग की तैयारियां शुरू कर दी।  इसी के तहत 1 जून 1984 को पंजाब में कर्फ्यू लागो कर दिए गया और कम्युनिकेशन ब्लोक्ड कर दिए गए जिसके कारण पंजाब के बहार कोई भी खबर बहार न जा सके।  उसके बाद भारतीय सेना ने अमृतसर और बाकि पंजाब को घेरना शुरू किया, सभी न्यूज़ रिपोर्टर्स को बस में बैठा कर अमृतसर से बहार भेज दिया गया। 

1 जून 1984 को इंदिरा गाँधी ने रेडियो से शांति स्थापित करने का सन्देश तो दिया लेकिन वास्तव सेना हमले का मन बना चुकी थी।

3 जून को सेना ने स्वर्ण मंडी को घेर लिया और इस दिन स्वर्ण मंदिर के संस्थापक गुरु अर्जन देव का शहीदी दिवस होने की वजह से स्वर्ण मंदिर में भीड़ बहुत ज़्यादा थी, जिसको भिंडरावाले के हथियारबंद साथी बहार निकलने नहीं दे रहे थे।

                5 जून 1984 को असली लड़ाई शुरू हुई जब मेजर जनरल शाहबेग सिंह, जो 1971 के युद्ध में बांग्लादेशी मुक्ति वाहिनी के गुरु बने थे।  उनसे निर्देशित भिंडरावाले की सशस्त्र टुकड़ी ने भारतीय सेना पर हमला कर दिया।  जिसके जवाब में मेजर कुलदीप सिंह बरार ( बॉर्डर फिल्म में सनी देओल के किरदार वाले सरदार जी )  के नेतृत्व में जवाबी हमला किया।  भिंडरावाले के लोगों के पास एंटी टैंक गन्स, राकेट लॉन्चर्स, मशीन गन्स और स्नाइपर्स मौजूद थ।  जिसकी वजह से शुरू में भारतीय सेना को बहुत भारी नुक्सान उठाना पड़ा। जिसके बाद सेना को टैंक्स मंगवाने पड़े।  और जब 6 जून 1984 को," दरबार साहिब को कोई नुक़सान नही होना चाहिए" का आदेश पाकर ,16 Cavalry Regiment ने अकाल तख़्त पर परिक्रमा पथ से चढ़ाई की जिसके बाद चले ऑपरेशन में भिंडरावाले के साथ साथ मेजर जनरल शाहबेग सिंह भी मारे गए।  इस हमले में अकाल तख़्त को बहुत अधिक नुक्सान पहुंचा और प्राचीन ग्रंथालय भी जल गया।

                कुछ दिनों बाद जब फोटोज बाहर आये और यह जानकार कि दरबार साहिब और अकाल तख़्त पर भी गोलियां चलाई गईं हैं, यह जानकार भारत और पूरी दुनिया के सिख भारत सरकार के खिलाफ हो गए। विरोध  प्रदर्शन होने लगे और सिखों की धार्मिक भावनाएं आहत हुई ऐसा कह कर विरोध करने लगे। 


  • ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद :-

ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गाँधी की उन्ही के सिख बॉडीगार्ड सतवंत सिंह और बेअंत सिंह ने गोली मार कर उनकी हत्या कर दी। जिसके बाद सिख विरोधी दंगे शुरू हो गए। जिसके कारण 3000 से ज़्यादा सिख मारे गए।  जिसके दोषी कांग्रेस नेता सज्जन सिंह और जगदीश टाइटलर को माना गया।

  • दंगो को लेकर जब राजीव गाँधी से पूछा गया तो उन्होंने कहा था, " THE GROUND SHAKES WHEN A BIG TREE FALLS "
  •  1985 में कनाडा के मॉन्ट्रियल से नई दिल्ली आ रही एयर इंडिया की फ्लाइट कनिष्क को बम से उड़ा दिया गया जिसमे 329 लोगो की मौत हो गई। 
  • 1985 में ही हरचंद सिंह लोंगोवाल की राजीव गाँधी से समझौता करने के कारण हत्या कर दी गई। 
  • 1986,  ऑपरेशन ब्लू स्टार के समय भारतीय सेनाध्यक्ष रहे AS VAIDYA की भी हत्या कर दी गई। 

 

 आशा करता हूँ  की आपको हमारा आज का यह ब्लॉग पसंद आया होगा, आप इसे शेयर कर सकते हैं और यदि इससे जुडी कोई भी बात आपकी समझ में न आई हो अथवा कोई प्रश्न हो तो हमको कमेंट में लिखना न भूलें।




Disclaimer:- This article is written only for educational and informative purposes. There is no intention to hurt anyone's feelings. This article is the original property of Abiiinabu. All data and knowledge are referred to by various books and facts. Pictures that I used are not mine, credit for those goes to their respected owners. 


Follow the Author:-

instagram :-  www.instagram.com/abiinabu
twitter :- www.twitter.com/aabhinavno1

टिप्पणियाँ

Best From the Author

भारत का महान राजा अशोक, Ashoka The Great

अशोक, जिसे 'देवनामपिया पियादासी' या देवताओं के प्रिय के रूप में भी जाना जाता है, मौर्य वंश का अंतिम प्रमुख राजा था। उन्हें मुख्य रूप से उनके शासनकाल के दौरान भारत और विदेशों में बौद्ध धर्म के प्रसार में उनकी भूमिका के लिए याद किया जाता है। 1830 के दशक के मध्य तक, जब जेम्स प्रिंसेप ब्राह्मी लिपि में एक शिलालेख को समझने में सक्षम थे, उन्हें मौर्य राजाओं की सूची में कई शासकों में से एक माना जाता था। अंतिम पुष्टि कि शिलालेख में देवानामपिया पियादासी के रूप में दिखाई देने वाला नाम अशोक का था, 1915 में आया था। अशोक मौर्य राजा बिंदुसार के पुत्र थे। जबकि कुछ इतिहासकारों का मानना है कि वह अपने पिता की मृत्यु के तुरंत बाद सिंहासन पर चढ़ा, कई लोगों का तर्क है कि उनके कई भाइयों के बीच उत्तराधिकार के लिए संघर्ष में लगभग चार साल का अंतर था। एक प्रशासक के रूप में उनके करियर ने तब उड़ान भरी जब उन्होंने तक्षशिला में राज्यपाल के रूप में सेवा शुरू की। इसमें एक विद्रोह को दबाना और व्यावसायिक गतिविधियों को संभालना शामिल था। अशोक के शासन के दौरान विभिन्न घटनाओं में, कलिंग युद्ध को सबसे मह...

History of Chambal

 चम्बल का इतिहास क्या हैं? ये वो नदी है जो मध्य प्रदेश की मशहूर विंध्याचल पर्वतमाला से निकलकर युमना में मिलने तक अपने 1024 किलोमीटर लम्बे सफर में तीन राज्यों को जीवन देती है। महाभारत से रामायण तक हर महाकाव्य में दर्ज होने वाली चम्बल राजस्थान की सबसे लम्बी नदी है। श्रापित और दुनिया के सबसे खतरनाक बीहड़ के डाकुओं का घर माने जाने वाली चम्बल नदी मगरमच्छों और घड़ियालों का गढ़ भी मानी जाती है। तो आईये आज आपको लेकर चलते हैं चंबल नदी की सेर पर भारत की सबसे साफ़ और स्वच्छ नदियों में से एक चम्बल मध्य प्रदेश के इंदौर जिले में महू छावनी के निकट स्थित विंध्य पर्वत श्रृंखला की जनापाव पहाड़ियों के भदकला जलप्रपात से निकलती है और इसे ही चम्बल नदी का उद्गम स्थान माना जाता है। चम्बल मध्य प्रदेश में अपने उद्गम स्थान से उत्तर तथा उत्तर-मध्य भाग में बहते हुए धार, उज्जैन, रतलाम, मन्दसौर, भिंड, मुरैना आदि जिलों से होकर राजस्थान में प्रवेश करती है। राजस्थान में चम्बल चित्तौड़गढ़ के चौरासीगढ से बहती हुई कोटा, बूंदी, सवाईमाधोपुर, करोली और धौलपुर जिलों से निकलती है। जिसके बाद ये राजस्थान के धौलपुर से दक्षिण क...

Animal Farm by George Orwell: The Classic

 **Book Review: *Animal Farm* by George Orwell** George Orwell’s *Animal Farm* is a timeless allegorical novella that, despite its brevity, packs an extraordinary punch. Published in 1945, the novel remains a powerful commentary on power, corruption, and societal structures. Through the use of farm animals as characters, Orwell critiques the rise of totalitarian regimes, particularly the Russian Revolution and the subsequent emergence of the Soviet Union under Stalin. ### **Plot Overview** The story is set on Manor Farm, where the animals, inspired by Old Major, a wise and elderly pig, revolt against their human farmer, Mr. Jones. Led by pigs Snowball and Napoleon, the animals envision a utopia where all animals are equal, free from human tyranny. After their successful rebellion, they rename the farm "Animal Farm" and establish their own rules under the slogan, “All animals are equal.” However, as the pigs take over leadership roles, the initial ideals of equality and justic...

The Metamorphosis book review

समाज लोगों से प्यार तब तक करता है, जब तक वे उसके लिए उपयोगी रहते हैं।   और जैसे ही कोई व्यक्ति उपयोगी होना बंद कर देता है—उसका अस्तित्व भी असहज हो जाता है।   यही वास्तविक भयावहता है काफ्का के "द मेटामॉर्फोसिस" की। ग्रेगर साम्सा रातों‑रात कोई राक्षस नहीं बन जाता।   वह बस एक ऐसा इंसान बन जाता है जो अब काम नहीं कर सकता, कमाई नहीं कर सकता,   परिवार की उम्मीदों को पूरा नहीं कर सकता,   और समाज की उस "सामान्य" दुनिया में फिट नहीं बैठता जो हम सबको थोप देती है।   और अचानक—   उसका अपना कमरा छोटा लगने लगता है,   घर की बातचीत में ठंडक घर कर जाती है,   और वही परिवार जिसने कभी उस पर अपेक्षाएँ और निर्भरता रखी थी,   धीरे‑धीरे उसके बिना जीना सीख जाता है।   काफ्का हमें दिखाते हैं कि   समाज अक्सर मानवता की कीमत नहीं,   बस उत्पादकता की कीमत चुकता है।   जैसे ही कोई व्यक्ति कमज़ोर होता है, बेरोज़गार होता है,   दुखी, अलग, टूटा हुआ—   तो वह बस एक बोझ बन जाता है।   किसी इंसान की जगह एक “समस्या” बन जाता है।   यह सच्चाई हम आ...

हाइफा युद्ध ! क्या है भारत इजराइल की दोस्ती का ऐतिहासिक राज़ ? Battle of Haifa, A blogpost by Abiiinabu

हाइफा युद्ध !  क्या है भारत इजराइल की दोस्ती का ऐतिहासिक राज़ ? Battle of Haifa हाल ही में 23 सितंबर को Haifa के युद्ध गई 103 वीं सालगिरह मनाई गई हैं। इस युद्ध का India और Israel के अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर बहुत ही गहरा प्रभाव है। जिसने इजरायल को एक यहूदी राष्ट्र बनाने में मदद की थी, और इसी युद्ध के कारण भारत और इजरायल के संबंध इतने गहरे और गहरे होते जा रहे हैं। इतिहास की किताबों में खोलकर देखें तो भारत और इजराइल कई वर्षों से एक दूसरे के परम मित्र बनें रहे हैं। इन संबंधों की इतनी सर गर्मी की वजह हाइफा का युद्ध भी है। जो आज से 103 साल पहले इजराइल के हाइफा शहर में लड़ा गया था। आखिर इस युद्ध की वजह क्या थी? और इसमें भारत का क्या संबंध है? इसी विषय पर आज की चर्चा शुरू करते हैं।           वर्ष 1918 मैं तात्कालिक Ottomon Empire का एक राज्य फ़िलिस्तीन हुआ करता था।इस फिलिस्तीनी राज्य में समुद्र के किनारे एक शहर था, जिसका नाम था हाइफ़ा । इसी Haifa शहर को ऑटोमन साम्राज्य से आजादी दिलाने के लिए ब्रिटिश इंडियन आर्मी ने प्रथम विश्वयुद्ध में शत्रुपक्ष के विरुद्ध यु...