सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Indo China war when India defeated China

  1965 में सगत सिंह की जिद से नाथू-ला पर चीनियों का कब्जा नहीं हो पाया था, जिसके कारण भारतीय सेना को टैक्टिकल एडवांटेज मिली हुई थी। चीनी चाह कर भी आगे नहीं बढ़ सकते थे। चीनियों ने बंदूक की जगह लाउडस्पीकर का सहारा लिया। वे लाउडस्पीकर पर हिंदी और अंग्रेजी में भारतीय सैनिकों को 1962 की हार की याद दिलाते, उनके कपड़ों, कम सुविधाओं, कम वेतन को लेकर ताने मारते। कहते कि देखो, तुम्हारे अफसर तो मजे में एसी ऑफिसों में बैठे रहते हैं, और तुम्हें यहां मरने के लिए भेज दिया गया है।  सगत सिंह ने लाउडस्पीकर का जवाब लाउडस्पीकर से दिया। उन्होंने मैंडेरियन चाइनीज में रिकॉर्डेड मैसेज प्रसारित करने शुरू कर दिए। वो भी लगातार, लूप में।  बात इतनी ही होती तो कोई दिक्कत नहीं थी। पर चीनी जब-तब दौरे पर निकली छोटी फौजी टुकड़ियों (पेट्रोलिंग पार्टीज) से बदसलूकी करते। एक बार तो छिपकर उन्होंने गोली भी चला दी जिससे 17 असम राइफल्स के दो जवान मारे गए। सीमा निर्धारित तो थी नहीं। चीनियों का कहना था कि ये टुकड़ी चीनी क्षेत्र में घुस आई थी। सगत सिंह ने रोज-रोज की इस चिकचिक से परेशान होकर कोर्प्स कमांडर से बात की...

History and Significance of Taking The Knee| Why Players Kneeling on the ground

History and Significance of Taking The Knee| Why Players Kneeling on the ground

T20 World Cup में खिलाड़ियों द्वारा किया जाने वाला Taking The Knee क्या है?
T20 World Cup में खिलाड़ियों द्वारा किया जाने वाला Taking The Knee क्या है?
बीते कुछ समय से हम सभी लोग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चलने वाले खेलों में खिलाड़ियों को अपने एक घुटने के बल बैठता हुआ देखते आए हैं। चाहे फुटबॉल हो, क्रिकेट हो अथवा ओलंपिक खेल ही क्यों ना हो, खिलाड़ियों को अपने घुटने के बल बैठकर एक खास प्रदर्शन करना आखिर क्या दिखाता है? आखिर क्यों दुनिया भर के खिलाड़ी अपने अपने क्षेत्र में इस प्रकार की Body Language बना रहे हैं?
Football Players Kneeling
Football Players Kneeling
18वीं और 19वीं शताब्दी में जब ब्रिटेन पूरी दुनिया पर अपना राज कर रहा था। तब ब्रिटिश अधिकारी कई अलग-अलग तरीकों से उन देशों के मूल निवासियों के प्रति घृणा का भाव रखते थे। जिनमें सबसे बड़ा भाव था रंग के आधार पर भेदभाव करना। रंगभेद, नस्लभेद या Racism भी कहा जाता है। रंगभेद और नस्ल भेद वक्त के साथ कमजोर पड़ते गए लेकिन कभी पूर्ण रूप से खत्म नहीं हो पाए। कुछ लोगों का केवल अपने त्वचा के रंग आधार पर यह मानना कि वह बाकी दुनिया से श्रेष्ठ हैं, एक प्रकार की विकृत मानसिकता की ओर परिलक्षित करता है। किसी भी व्यक्ति का उसकी स्वयं की त्वचा के रंग में किसी भी प्रकार का कोई योगदान नहीं होता। लेकिन फिर भी कुछ लोग अपने गोरे रंग के कारण सांवले एवं काले लोगों के प्रति घृणा का भाव रखते हैं। नस्लभेद और रंगभेद अधिकतर आज यूरोप, ब्रिटेन, और अमेरिका जैसे विकसित देशों की अविकसित मानसिकता को प्रदर्शित करता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में आए दिन किसी भी व्यक्ति की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी जाती है क्योंकि उसका रंग बाकी लोगों की तरह सफेद नहीं है। किसी व्यक्ति पर चोरी के झूठे इल्जाम केवल इसीलिए लगा दिए जाते हैं क्योंकि उसका रंग सफेद नहीं है। किसी व्यक्ति को उसकी प्रतिभा दिखाने का मंच केवल इसीलिए नहीं दिया जाता क्योंकि उसका रंग साफ नहीं है। कोई व्यक्ति सिर्फ इसीलिए आतंकवादी करार दे दिया जाता है क्योंकि उसका रंग खुद को श्रेष्ठ मानने वाले लोगों की मानसिकता की कसौटी पर खरा नहीं उतर पाता।

  • Racism का इतिहास

सोलवीं सदी के अंत तक ब्रिटिश राज अमेरिका पर कब्जा कर चुका था और अमेरिका डटकर इस कब्जे का विरोध कर रहा था। ब्रिटिशरों ने स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने के लिए अमेरिका के मूल निवासी रेड इंडियन्स को अपना गुलाम बनाना शुरू कर दिया था। वे उनसे अपने साथ सभी व्यक्तिगत कार्य एवं अन्य प्रकार के कार्य करवाते थे। 18 वीं सदी का दूसरा दशक आते-आते अमेरिका ने ब्रिटेन को अपनी जमीन से खदेड़ दिया। ब्रिटेन अमेरिका से चला तो गया था, लेकिन अपने पीछे रंगभेद और नस्लभेद का जहर अमेरिका की धरती में बो गया। ब्रिटेन के जाने के बाद भी अब वहां के आजाद नागरिकों ने अपने आप को श्रेष्ठ साबित करने के लिए अफ्रीका से आए हुए मजदूरों से अपने व्यक्तिगत कार्य करने शुरू कर दिए। और धीरे-धीरे अमेरिका एक आजाद देश में गुलाम मानसिकता का शिकार देश बन गया। अमेरिका में दास प्रथा आम हो चली थी। वे दासों से झाड़ू पोछा लगवाने से लेकर अपना मल एवं गंदगी भी साफ करवाते थे। बदले में दांतो को केवल जिंदा रहने के लिए खाना और कपड़े दिए जाते थे। कई सालों तक यह ऐसे ही चलता रहा लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने दास प्रथा का उन्मूलन किया एवं अमेरिका को दासप्रथा से मुक्त करवाया। अमेरिका में एक गुट दास प्रथा का कितना कट्टर समर्थक था. इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब्राहम लिंकन की हत्या दास प्रथा के उन्मूलन के कुछ ही दिनों बाद कर दी गई।
अब्राहम लिंकन की हत्या के बाद नक्सलवाद धीरे-धीरे करके ठंडा पड़ गया लेकिन कभी पूर्ण रूप से समाप्त ना हो पाया। जिस कारण अमेरिका के लोग अवदस तो नहीं रख सकते थे लेकिन उनके मन में अश्वतों के प्रति एक घृणित भाव सदा के लिए बस गया। जिसका प्रभाव आज भी आए दिन देखने को मिलता है।

  • Kneeling का इतिहास

समय-समय पर Blacks के साथ किया जाने वाला यह भेदभाव अपने चरम स्तर तक भी गया था। जिसमें फिर से अमेरिका में वही सब होने लगा जो ब्रिटिशर्स किया करते थे। किसी व्यक्ति को केवल इसीलिए तो दंडित किया जाने लगा क्योंकि उसका रंग उस विकृत मानसिकता से ग्रसित समाज के लिए अस्वीकरणीय था।अश्वेतें की दशा इस कदर तक खराब थी कि उन्हें जंजीरों से बांधकर रखा जाता था वह भी उस दोष के लिए, जिस पर उनका एवं किसी अन्य का कोई जोर नहीं है। अश्वेत लोगों की इस हालत को सुधारने के लिए समय-समय पर कई महापुरुषों ने अपने स्तर पर आंदोलन किए। जिसमें सबसे अधिक योगदान अब्राहम लिंकन, मार्टिन लूथर किंग का आता है। एक बार मार्टिन लूथर किंग ने अश्वेतों के साथ हो रही हिंसा के जवाब में महात्मा गांधी से प्रभावित होकर अहिंसा का मार्ग चुना था। जिसका अमेरिका में भी व्यापक प्रभाव पड़ा और अश्वेतों की दशा सुधरने लगी। मार्टिन लूथर किंग अपने आंदोलन में जहां कहीं भी अश्वेत के साथ कोई भेदभाव अथवा मारपीट होती थी वहां अपने सांत्वना व्यक्त करने के लिए अपने एक घुटने के बल बैठ जाते थे और अपना सिर नीचे कर लेते थे।
Martin Luther King Kneeling for Justice
Martin Luther King Kneeling for Justice
धीरे-धीरे यह चलन लोकप्रिय हो गया और लोग अश्वेत के प्रति हिंसा का विरोध करने के लिए इसी प्रकार बैठकर अपना प्रदर्शन करने लगे। मार्टिन लूथर किंग को इस प्रकार की बॉडी लैंग्वेज में बैठकर विरोध प्रदर्शन करने की प्रेरणा 18 वीं शताब्दी के एक कुम्हार द्वारा बनाई गई एक मोहर से मिली।
Am I not a Human or Brother
Am I not a Man and A Brother
Josiah Wedgwood द्वारा बनाई गई मोहर में एक अश्वेत को जंजीरों में लिपटा अपने एक घुटने के बल बैठकर विनती करता दिखाया गया है। साथ में यह भी लिखा है कि यदि मैं तुम्हारा भाई नहीं हूं तो क्या मैं एक इंसान भी नहीं हूं? 
Josiah Wedgwood की यह कृति अत्यधिक लोकप्रिय हुई। जिससे प्रभावित होकर अनेक वर्षों बाद मार्टिन लूथर किंग ने विरोध प्रदर्शित करने के लिए इस मुद्रा का उपयोग किया।
Joseiah Wodgeh
Josiah Wedgwood

  • वर्तमान समय में Racism और नस्लभेद

वर्तमान समय में अमेरिका ब्रिटेन और यूरोप के कई देशों में अश्वेत लोगों के प्रति असहिष्णुता की भावना व्याप्त है। अमेरिकियों और ब्रिटिशर्स में यह भावना कुछ अधिक ही भरी हुई है। वे अश्वेतों के साथ, एशियाई मूल के निवासियों के साथ बहुत ही क्रूरता से व्यवहार करते हैं। वर्तमान समय में संयुक्त राज्य अमेरिका में George Floyd को केवल इसीलिए पुलिस ने मार दिया क्योंकि उन्हें शक था कि उसके पास $20 का नकली नोट है। जब पुलिस उसे ले जा रही थी तब वह बार-बार चिल्ला रहा था कि उसे एक बंद वैन में मत बैठाओ, उसे सांस लेने में दिक्कत होती है। लेकिन अमेरिकी पुलिस वाले नहीं माने और उसे बंद वेन में बैठा दिया कुछ समय बाद ही उसकी तबीयत बिगड़ने लगी और वह छटपटाने लगा। पुलिस वालों ने उसे बाहर निकाला और उसकी गर्दन पर अपना घुटना पूरे 9 मिनट तक दबाकर रखा जिसकी वजह से जॉर्ज दम घुटने से मर गया।
Murder of George Floyd
Murder of George Floyd
2020 में घटित हुई यह घटना, अमेरिकी समाज की विकृत मानसिकता को साफ तौर पर दिखाती है। इसी घटना के विरोध में दुनिया भर में #BlackLivesMatter नामक एक आंदोलन शुरू हो गया है जिसके अंतर्गत विरोध प्रदर्शन करने वाले लोग अपने एक घुटने के बल बैठकर नस्लभेद के खिलाफ अपना विरोध प्रदर्शित कर रहे हैं।
Black Lives Matter
Black Lives Matter
अब इस आंदोलन को खिलाड़ी भी अपने साथ होने वाले नस्लभेद के विरोध के रूप में प्रदर्शित कर रहे हैं। वे लोग जो नस्लभेद का शिकार हुए हैं अथवा वे लोग जो नस्लभेद का विरोध करते हैं दोनों ही अपनी बॉडी लैंग्वेज को एक घुटने के बल बैठा कर अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं। 2020 फीफा वर्ल्ड कप, 2020-21 टोक्यो ओलंपिक खेल और अब 2021, T20 क्रिकेट विश्व कप में इस प्रकार के कई वाकए आपको देखने को मिल जाएंगे।
इसीलिए आपने देखा होगा कि फुटबॉल के कई मैचों में खिलाड़ी मैच शुरू होने से पहले अपने घुटने के बल बैठ जाते हैं। T20 विश्व कप में खिलाड़ी बीच खेल में अथवा राष्ट्रगान होने से पहले अपने घुटने के बल बैठकर अपना विरोध प्रदर्शित कर रहे हैं। 
Team India Kneeling
Indian Team Kneeling
भारतीय टीम ने अपने विश्वकप मैच खेलने से पहले नस्लभेद का विरोध किया। 










हम आशा करते हैं आपको हमारा यह ब्लॉक एवं यह जानकारी पसंद आई होगी। यदि आपको यह जानकारी लाभदायक लगती हो तो कृपया इसे शेयर कीजिए। धन्यवाद 🙏

टिप्पणियाँ

Best From the Author

The 2025 Knowledge Stack

  The 2025 Knowledge Stack I read 34 books in 2025. If I had to distill those thousands of pages into 4 life-changing lessons, this is what they would be. 📚👇 1. On Wealth & Wisdom: "The Almanack of Naval Ravikant" This wasn't just a book; it was a manual for the modern world. The biggest takeaway? "Specific knowledge" is your superpower. Build skills that feel like play to you but look like work to others. 2. On Strategy: "Lanka ka Yuddh" by Amish Tripathi ⚔️ A masterclass in how leadership and strategy are inseparable from ethics. It’s a reminder that how you win matters just as much as the win itself. 3. On Mindset: "The Courage to Be Disliked" 🧠 A radical lesson in emotional freedom. Most of our stress comes from trying to meet others' expectations. Real growth starts when you have the courage to be your authentic self, regardless of the "likes". 4. On Discipline: "Make Your Bed" by Admiral William H. McRaven...

The Saga of Justice Radha Binod Pal

  एक कहानी,जिसे जापान याद रखता है, लेकिन भारत भूल चुका है। वह दिन था 12 नवम्बर 1948 टोक्यो के बाहरी इलाके में स्थित एक बड़े से घर में इतिहास रचने बदलने की तैयारी  थी। द्वितीय विश्व युद्ध में पराजय के बाद जापान के 55 युद्धबंदियों पर मुकदमा चल रहा था। इनमें तत्कालीन जापानी प्रधानमंत्री तोजो भी शामिल थे।  इनमें से 28 को क्लास A यानी क्राइम्स अगेंस्ट पीस का दोषी माना गया था। दोष सिद्ध होने पर केवल एक ही सज़ा थी मृत्युदंड की। दुनिया भर से आए 11 अंतरराष्ट्रीय जज एक-एक कर अपना फैसला सुना रहे थे कि ये दोषी है…  अचानक अदालत में उस समय एक भारी और स्पष्ट आवाज़ गूँजी not guilty दोषी नहीं हैं.. पूरा कक्ष सन्न रह गया, आखिर ये अकेली असहमति किसकी थी। यह आवाज़ थी भारत के न्यायाधीश राधा बिनोद पाल की।वे उन 11 जजों के पैनल में मौजूद तीन एशियन जजों में से एक थे,जिनको इस टोक्यो ट्रायल में जापान के वार क्राइम में सजा देने के लिए नियुक्त किया गया था।उन्होंने विजेता देशों द्वारा किए जा रहे Victors’ Justice के विरुद्ध अकेले खड़े होकर असहमति दर्ज की। उनकी जीवनी भी बहुत रोचक है। 1886 में बंगाल ...

हवन कुंड और सामग्री

पंडित जी द्वारा करवाई जाने वाली पूजा में बैठ तो जाते हैं लेकिन सोच हमारी ही रहती है.... पंडितजी ने सबको हवन में शामिल होने के लिए बुलाया।  सबके सामने हवन सामग्री रख दी गई  पंडितजी मंत्र पढ़ते और कहते, “स्वाहा ।” लोग चुटकियों से हवन सामग्री लेकर अग्नि में डाल देते.. गृह मालिक को स्वाहा कहते ही अग्नि में घी डालने की ज़िम्मेदीरी सौंपी गई  हर व्यक्ति थोड़ी सामग्री डालता, इस आशंका में कि कहीं हवन खत्म होने से पहले ही सामग्री खत्म न हो जाए...  गृह मालिक भी बूंद-बूंद घी डाल रहे थे । उनके मन में भी डर था कि घी खत्म न हो जाए । मंत्रोच्चार चलता रहा, स्वाहा होता रहा और पूजा पूरी हो गई.... सबके पास बहुत सी हवन सामग्री बची रह गई । "घी तो आधा से भी कम इस्तेमाल हुआ था ।" हवन पूरा होने के बाद पंडितजी ने कहा कि आप लोगों के पास जितनी सामग्री बची है, उसे अग्नि में डाल दें । गृह स्वामी से भी उन्होंने कहा कि आप इस घी को भी कुंड में डाल दें । एक साथ बहुत सी हवन सामग्री अग्नि में डाल दी गई ।  सारा घी भी अग्नि के हवाले कर दिया गया,पूरा घर धुंए से भर गया ।  वहां बैठना मुश्किल हो ग...

Indo China war when India defeated China

  1965 में सगत सिंह की जिद से नाथू-ला पर चीनियों का कब्जा नहीं हो पाया था, जिसके कारण भारतीय सेना को टैक्टिकल एडवांटेज मिली हुई थी। चीनी चाह कर भी आगे नहीं बढ़ सकते थे। चीनियों ने बंदूक की जगह लाउडस्पीकर का सहारा लिया। वे लाउडस्पीकर पर हिंदी और अंग्रेजी में भारतीय सैनिकों को 1962 की हार की याद दिलाते, उनके कपड़ों, कम सुविधाओं, कम वेतन को लेकर ताने मारते। कहते कि देखो, तुम्हारे अफसर तो मजे में एसी ऑफिसों में बैठे रहते हैं, और तुम्हें यहां मरने के लिए भेज दिया गया है।  सगत सिंह ने लाउडस्पीकर का जवाब लाउडस्पीकर से दिया। उन्होंने मैंडेरियन चाइनीज में रिकॉर्डेड मैसेज प्रसारित करने शुरू कर दिए। वो भी लगातार, लूप में।  बात इतनी ही होती तो कोई दिक्कत नहीं थी। पर चीनी जब-तब दौरे पर निकली छोटी फौजी टुकड़ियों (पेट्रोलिंग पार्टीज) से बदसलूकी करते। एक बार तो छिपकर उन्होंने गोली भी चला दी जिससे 17 असम राइफल्स के दो जवान मारे गए। सीमा निर्धारित तो थी नहीं। चीनियों का कहना था कि ये टुकड़ी चीनी क्षेत्र में घुस आई थी। सगत सिंह ने रोज-रोज की इस चिकचिक से परेशान होकर कोर्प्स कमांडर से बात की...

The Justice Verma Incident

 हास्य व्यंग्य : वाह रे न्याय....!! फायर ब्रिगेड के ऑफिस में हड़कंप मच गया। आग लगने की सूचना जो मिली थी उन्हें। आग भी कहां लगी ? दिल्ली हाईकोर्ट के माननीय न्यायाधीश “फलाने वर्मा” के सरकारी बंगले में..! घटना की सूचना मिलने पर फायर ब्रिगेड कर्मचारियों के हाथ पांव फूल गए । "माई लॉर्ड" के बंगले में आग ! हे भगवान ! अब क्या होगा ? एक मिनट की भी अगर देर हो गई तो माई लॉर्ड सूली पर टांग देंगे ! वैसे भी माई लॉर्ड का गुस्सा सरकार और सरकारी कर्मचारियों पर ही उतरता है। बाकी के आगे तो ये माई लॉर्ड एक रुपए की हैसियत भी नहीं रखते हैं जिसे प्रशांत भूषण जैसे वकील भरी कोर्ट में उछालते रहते हैं।  बेचारे फायर ब्रिगेड के कर्मचारी एक साथ कई सारी फायर ब्रिगेड लेकर दौड़ पड़े और आनन फानन में आग बुझाने लग गए। अचानक एक फायर ऑफिसर की नजर सामने रखे नोटों के बंडलों पर पड़ी। वह एक दम से ठिठक गया। उसके हाथ जहां के तहां रुक गए..!! नोट अभी जले नहीं थे..!! लेकिन दमकल के पानी से खराब हो सकते थे.. इसलिए उसने फायर ब्रिगेड से पानी छोड़ना बंद कर दिया और दौड़ा दौड़ा अपने बॉस के पास गया...  "बॉस...!    म...