महाभारत के भयंकर नरसंहार के बाद पुत्र-वियोग में तड़पती गांधारी जब श्रीकृष्ण को शाप देने के लिए आगे बढ़ती हैं, तब श्रीकृष्ण शांत स्वर में कहते हैं— माते! मैं शोक, मोह और पीड़ा—इन सबसे परे हूँ, न मुझे विजय का गर्व है, न पराजय का विषाद, न मुझे सम्मान बाँधता है, न अपमान। न जीवन, न मृत्यु—किसी में मैं आबद्ध नहीं हूँ। मैं न सत्य में बँधा हूँ, न असत्य में.. काल और महाकाल—दोनों मेरे अधीन हैं; मैं उन्हीं के माध्यम से अपने कार्य सिद्ध कराता हूँ। हे माता, यह युद्ध अवश्यम्भावी था। जो चले गए हैं, उनके लिए विलाप मत करो। जो शेष हैं—उन्हें स्वीकारो। वर्तमान को अपनाओ, क्योंकि अतीत का शोक ही दुख का मूल है.. कृष्ण की वाणी सुनकर गांधारी विलाप करती हुई कह उठती हैं.. कृष्ण…! तुम यह सब कह सकते हो, क्योंकि तुम माँ नहीं हो। तुम क्या जानो एक माँ की ममता क्या होती है? तुम क्या समझो पुत्र-शोक की असहनीय पीड़ा? तुम मोह-त्याग और ज्ञान की बातें करते हो, तो जाओ—अपनी माता देवकी से पूछो कि पुत्र-वियोग क्या होता है! पूछना उनसे— कैसा लगता था जब कंस एक-एक कर उसके कलेजे के टुकड़े छीन लेता था.. जब उसका दूध उतरता थ...
| Famous Hindi Poet Suryakant Tripathi Nirala की दानवीरता का अद्भुत किस्सा। |
अगर आपने अपने जीवन में कभी भी हिंदी में कविताएं पढ़ी हैं तो आपको एक नाम कभी भूले से नहीं भूलेगा वह नाम है सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने अपनी कविताओं में करुण रस एवं वियोग श्रृंगार का ऐसा अद्भुत समागम किया है कि उनकी यह विशेषता उन्हें छायावादी युग के चार प्रमुख हस्ताक्षर ओं में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाती है। छायावाद के चार प्रमुख स्तंभ जयशंकर प्रसाद सुमित्रानंदन पंत महादेवी वर्मा और चौथे स्वयं सूर्यकांत त्रिपाठी निराला है। उनकी रचनाएं आम आदमी की पीड़ा एवं उसके संघर्ष को बहुत ही मार्मिकता के साथ प्रदर्शित करती हैं। उनकी कविताओं के मुख्य किरदार कोई महलों में रहने वाले या बड़ी बड़ी जमीन की जिम्मेदारी करने वाले विशेष रूप से संबंध कोई विशेष नवाब अथवा जमीदार नहीं होते थे। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला हिंदी की उस श्रृंखला के कवि थे जिन्होंने अपनी कविताओं का प्रमुख पात्र सड़क पर पत्थर तोड़ती लड़की, भीख मांगता हुआ भिखारी, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम में मनुष्यों जैसी भावनाओं का प्रदर्शन, अधूरे प्रेम की पीड़ा, सफलता की तलाश में दिन-रात परिश्रम कर रहे विद्यार्थियों की प्रार्थना है।
जो स्वयं की पीड़ा को समझें वह प्राण होता है लेकिन जो स्वयं के साथ किसी दूसरे की पीड़ा को भी समझे सही मायनों में वही महाप्राण होता है। महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने अपने साथ-साथ समाज के वंचितों का प्रतिनिधित्व किया है। आज उनकी जन्म जयंती की 125 वीं वर्षगांठ के अवसर पर मैं आपको उनका एक किस्सा सुनाता हूं।
एक बार निराला जी पुरस्कार के ₹1000 लेकर एक तांगे में बैठकर इलाहाबाद की सड़क पर चले जा रहे थे। उसी रास्ते में सड़क के किनारे एक बूढ़ी भिखारिन बैठी थी। वृद्धावस्था में भी हाथ पसार कर वह भीख मांग रही थी। उसे देखकर निराला जी ने तांगा रुकवाया और उसके पास गए।
"आज कितनी भीख मिली"? उन्होंने पूछा
बुढ़िया ने पोपुले मुंह से जवाब दिया "आज सुबह से कुछ भी नहीं मिला, बेटा।"
इस उत्तर को सुनकर निराला जी सोच में पड़ गए कि बेटे के रहते मां भी कैसे मान सकती है।
₹1 गुड़िया के हाथ में रखकर भोले मां अब कितने दिन भीख नहीं मांगोगी?
"3 दिन बेटा" जवाब मिला
"₹10 दे दूं तो"
"20 या 25 दिन"
"₹100 दे दूं तो"
"चार-पांच महीने तक"
चिलचिलाती धूप में सड़क के किनारे मां मांगती रही, बेटा देता रहा। तांगेवाला हक्का-बक्का रह गया। बेटे की जेब हल्की होती गई और मां के भीख ना मांगने की अवधि बढ़ती गई। जब निराला जी ने रुपयों की अंतिम डेरी गुड़या की झोली में उड़ेल दी तो बढ़िया खुशी से चीख उठी "अब कभी भीख नहीं मांगी बेटा कभी भी नहीं।"
निराला जी ने संतोष की सांस ली गुड़िया के चरण छुए और तांगे में बैठकर घर को चल दिए।
प्राण को महाप्राण कर गए।
यह तो केवल एक उदाहरण है यदि आप उनकी कविताओं को पढेंगे तो आपको भी है ज्ञात होगा कि निराला केवल खास इसलिए नहीं थे कि वे आम आदमी के कवि हैं, वह आम आदमी के थे इसीलिए खास थे। अगर आप उनकी कुछ रचनाएं पड़े जैसे
"वह तोड़ती पत्थर
देखा मैंने उसको
इलाहाबाद के पथ पर
वह तोड़ती पत्थर"
या फिर
"वह आता
दो टूक कलेजे को करता, पछताता
पथ पर आता
पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक
चल रहा लकुटिया टेक"
तब आपको यह मालूम पड़ेगा कि निराला ने सड़क पर देखने वाले साधारण से जीवन पर भी कितनी सूक्ष्म दृष्टि डाली है। यदि केवल इन्हीं दो कविताओं का संदर्भ दूं तो शायद ही निराला से पहले कभी किसी ने इस प्रकार समाज के इस वर्ग को प्रदर्शित किया होगा। यदि आपको किसी एक कवि का नाम मालूम है तो कृपया कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं, साथ ही हमको यह जरूर बताएं क्या आपको हमारी आज की यह प्रस्तुति कैसी लगी इसी प्रकार के और किससे एवं कहानियों के लिए आप हमें सब्सक्राइब भी कर सकते हैं।
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