सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

प्रेमचंद के फटे जूते

  प्रेमचंद का एक चित्र मेरे सामने है, पत्नी के साथ फ़ोटो खिंचा रहे हैं. सिर पर किसी मोटे कपड़े की टोपी, कुरता और धोती पहने हैं. कनपटी चिपकी है, गालों की हड्डियां उभर आई हैं, पर घनी मूंछें चेहरे को भरा-भरा बतलाती हैं. पांवों में केनवस के जूते हैं, जिनके बंद बेतरतीब बंधे हैं. लापरवाही से उपयोग करने पर बंद के सिरों पर की लोहे की पतरी निकल जाती है और छेदों में बंद डालने में परेशानी होती है. तब बंद कैसे भी कस लिए जाते हैं. दाहिने पांव का जूता ठीक है, मगर बाएं जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अंगुली बाहर निकल आई है. मेरी दृष्टि इस जूते पर अटक गई है. सोचता हूं-फ़ोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी-इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है. यह जैसा है, वैसा ही फ़ोटो में खिंच जाता है. मैं चेहरे की तरफ़ देखता हूं. क्या तुम्हें मालूम है, मेरे साहित्यिक पुरखे कि तुम्हारा जूता फट गया है और अंगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हें इसका ज़रा भी अहसास नहीं है? ज़रा लज्जा, संकोच या झेंप नहीं है? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि धोती को थोड़ा न...

कहानी हल्दीघाटी के दूसरे अध्याय की THE BATTLE OF DEWAIR

Battle of dewair


क्या आपने कभी पढ़ा है कि #हल्दीघाटी के बाद अगले १० साल में #मेवाड़ में क्या हुआ..


इतिहास से जो पन्ने हटा दिए गए हैं उन्हें वापस संकलित करना ही होगा क्यूंकि वही हिन्दू रेजिस्टेंस और शौर्य के प्रतीक हैं. 

इतिहास में तो ये भी नहीं पढ़ाया गया है कि हल्दीघाटी युद्ध में जब महाराणा प्रताप ने कुंवर मानसिंह के हाथी पर जब प्रहार किया तो शाही फ़ौज पांच छह कोस दूर तक भाग गई थी और अकबर के आने की अफवाह से पुनः युद्ध में सम्मिलित हुई है. ये वाकया अबुल फज़ल की पुस्तक अकबरनामा में दर्ज है.


क्या हल्दी घाटी अलग से एक युद्ध था..या एक बड़े युद्ध की छोटी सी घटनाओं में से बस एक शुरूआती घटना..

महाराणा प्रताप को इतिहासकारों ने हल्दीघाटी तक ही सिमित करके मेवाड़ के इतिहास के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है. वास्तविकता में हल्दीघाटी का युद्ध , महाराणा प्रताप और मुगलो के बीच हुए कई युद्धों की शुरुआत भर था. मुग़ल न तो प्रताप को पकड़ सके और न ही मेवाड़ पर अधिपत्य जमा सके. हल्दीघाटी के बाद क्या हुआ वो हम बताते हैं.


हल्दी घाटी के युद्ध के बाद महाराणा के पास सिर्फ 7000 सैनिक ही बचे थे..और कुछ ही समय में मुगलों का कुम्भलगढ़, गोगुंदा , उदयपुर और आसपास के ठिकानों पर अधिकार हो गया था. उस स्थिति में महाराणा ने “गुरिल्ला युद्ध” की योजना बनायीं और मुगलों को कभी भी मेवाड़ में सेटल नहीं होने दिया. महाराणा के शौर्य से विचलित अकबर ने उनको दबाने के लिए 1576 में हुए हल्दीघाटी के बाद भी हर साल 1577 से 1582 के बीच एक एक लाख के सैन्यबल भेजे जो कि महाराणा को झुकाने में नाकामयाब रहे.


हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात् महाराणा प्रताप के खजांची भामाशाह और उनके भाई ताराचंद मालवा से दंड के पच्चीस लाख रुपये और दो हज़ार अशर्फिया लेकर हाज़िर हुए. इस घटना के बाद महाराणा प्रताप ने भामाशाह का बहुत सम्मान किया और दिवेर पर हमले की योजना बनाई। भामाशाह ने जितना धन महाराणा को राज्य की सेवा के लिए दिया उस से 25 हज़ार सैनिकों को 12 साल तक रसद दी जा सकती थी. बस फिर क्या था..महाराणा ने फिर से अपनी सेना संगठित करनी शुरू की और कुछ ही समय में 40000 लडाकों की एक शक्तिशाली सेना तैयार हो गयी.


उसके बाद शुरू हुआ हल्दीघाटी युद्ध का दूसरा भाग जिसको इतिहास से एक षड्यंत्र के तहत या तो हटा दिया गया है या एकदम दरकिनार कर दिया गया है. इसे बैटल ऑफ़ दिवेर कहा गया गया है.


बात सन १५८२ की है, विजयदशमी का दिन था और महराणा ने अपनी नयी संगठित सेना के साथ मेवाड़ को वापस स्वतंत्र कराने का प्रण लिया. उसके बाद सेना को दो हिस्सों में विभाजित करके युद्ध का बिगुल फूंक दिया..एक टुकड़ी की कमान स्वंय महाराणा के हाथ थी दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व उनके पुत्र अमर सिंह कर रहे थे. 


कर्नल टॉड ने भी अपनी किताब में हल्दीघाटी को Thermopylae of Mewar और दिवेर के युद्ध को राजस्थान का मैराथन बताया है. ये वही घटनाक्रम हैं जिनके इर्द गिर्द आप फिल्म 300 देख चुके हैं. कर्नल टॉड ने भी महाराणा और उनकी सेना के शौर्य, तेज और देश के प्रति उनके अभिमान को स्पार्टन्स के तुल्य ही बताया है जो युद्ध भूमि में अपने से 4 गुना बड़ी सेना से यूँ ही टकरा जाते थे.


दिवेर का युद्ध बड़ा भीषण था, महाराणा प्रताप की सेना ने महाराजकुमार अमर सिंह के नेतृत्व में दिवेर थाने पर हमला किया , हज़ारो की संख्या में मुग़ल, राजपूती तलवारो बरछो भालो और कटारो से बींध दिए गए। 

युद्ध में महाराजकुमार अमरसिंह ने सुलतान खान मुग़ल को बरछा मारा जो सुल्तान खान और उसके घोड़े को काटता हुआ निकल गया.उसी युद्ध में एक अन्य राजपूत की तलवार एक हाथी पर लगी और उसका पैर काट कर निकल गई।


महाराणा प्रताप ने बहलोलखान मुगल के सर पर वार किया और तलवार से उसे घोड़े समेत काट दिया। शौर्य की ये बानगी इतिहास में कहीं देखने को नहीं मिलती है. उसके बाद यह कहावत बनी की मेवाड़ में सवार को एक ही वार में घोड़े समेत काट दिया जाता है.ये घटनाये मुगलो को भयभीत करने के लिए बहुत थी। बचे खुचे ३६००० मुग़ल सैनिकों ने महाराणा के सामने आत्म समर्पण किया. 

दिवेर के युद्ध ने मुगलो का मनोबल इस तरह तोड़ दिया की जिसके परिणाम स्वरुप मुगलों को मेवाड़ में बनायीं अपनी सारी 36 थानों, ठिकानों को छोड़ के भागना पड़ा, यहाँ तक की जब मुगल कुम्भलगढ़ का किला तक रातो रात खाली कर भाग गए.


दिवेर के युद्ध के बाद प्रताप ने गोगुन्दा , कुम्भलगढ़ , बस्सी, चावंड , जावर , मदारिया , मोही , माण्डलगढ़ जैसे महत्त्वपूर्ण ठिकानो पर कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद भी महाराणा और उनकी सेना ने अपना अभियान जारी रखते हुए सिर्फ चित्तौड़ कोछोड़ के मेवाड़ के सारे ठिकाने/दुर्ग वापस स्वतंत्र करा लिए.


अधिकांश मेवाड़ को पुनः कब्जाने के बाद महाराणा प्रताप ने आदेश निकाला की अगर कोई एक बिस्वा जमीन भी खेती करके मुसलमानो को हासिल (टैक्स) देगा , उसका सर काट दिया जायेगा। इसके बाद मेवाड़ और आस पास के बचे खुचे शाही ठिकानो पर रसद पूरी सुरक्षा के साथ अजमेर से मगाई जाती थी.


दिवेर का युद्ध न केवल महाराणा प्रताप बल्कि मुगलो के इतिहास में भी बहुत निर्णायक रहा। मुट्ठी भर राजपूतो ने पुरे भारतीय उपमहाद्वीप पर राज करने वाले मुगलो के ह्रदय में भय भर दिया। दिवेर के युद्ध ने मेवाड़ में अकबर की विजय के सिलसिले पर न सिर्फ विराम लगा दिया बल्कि मुगलो में ऐसे भय का संचार कर दिया की अकबर के समय में मेवाड़ पर बड़े आक्रमण लगभग बंद हो गए.


इस घटना से क्रोधित अकबर ने हर साल लाखों सैनिकों के सैन्य बल अलग अलग सेनापतियों के नेतृत्व में मेवाड़ भेजने जारी रखे लेकिन उसे कोई सफलता नहीं मिली. अकबर खुद 6 महीने मेवाड़ पर चढ़ाई करने के मकसद से मेवाड़ के आस पास डेरा डाले रहा लेकिन ये महराणा द्वारा बहलोल खान को उसके घोड़े समेत आधा चीर देने के ही डर था कि वो सीधे तौर पे कभी मेवाड़ पे चढ़ाई करने नहीं आया.


ये इतिहास के वो पन्ने हैं जिनको दरबारी इतिहासकारों ने जानबूझ कर पाठ्यक्रम से गायब कर दिया है. जिन्हें अब वापस करने का प्रयास किया जा रहा है।

टिप्पणियाँ

Best From the Author

प्रेमचंद के फटे जूते

  प्रेमचंद का एक चित्र मेरे सामने है, पत्नी के साथ फ़ोटो खिंचा रहे हैं. सिर पर किसी मोटे कपड़े की टोपी, कुरता और धोती पहने हैं. कनपटी चिपकी है, गालों की हड्डियां उभर आई हैं, पर घनी मूंछें चेहरे को भरा-भरा बतलाती हैं. पांवों में केनवस के जूते हैं, जिनके बंद बेतरतीब बंधे हैं. लापरवाही से उपयोग करने पर बंद के सिरों पर की लोहे की पतरी निकल जाती है और छेदों में बंद डालने में परेशानी होती है. तब बंद कैसे भी कस लिए जाते हैं. दाहिने पांव का जूता ठीक है, मगर बाएं जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अंगुली बाहर निकल आई है. मेरी दृष्टि इस जूते पर अटक गई है. सोचता हूं-फ़ोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी-इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है. यह जैसा है, वैसा ही फ़ोटो में खिंच जाता है. मैं चेहरे की तरफ़ देखता हूं. क्या तुम्हें मालूम है, मेरे साहित्यिक पुरखे कि तुम्हारा जूता फट गया है और अंगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हें इसका ज़रा भी अहसास नहीं है? ज़रा लज्जा, संकोच या झेंप नहीं है? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि धोती को थोड़ा न...

The History of Gujarati Calendar

प्राचीन काल से ही हिंदुओं द्वारा भारत में दो प्रकार की कालानुक्रमिक प्रणालियों का उपयोग किया जाता रहा है। पहले को किसी ऐतिहासिक घटना से गणना करने के लिए वर्षों की आवश्यकता होती है। दूसरा किसी खगोलीय पिंड की स्थिति से गणना शुरू करता है। समय-समय पर और भारत के विभिन्न हिस्सों में एक ऐतिहासिक घटना की गणना अलग-अलग रही है। गुजरात, दक्षिण के कुछ हिस्से और आसपास के क्षेत्र में आमतौर पर इस्तेमाल की जाने वाली सबसे हालिया ऐतिहासिक घटना विक्रम युग (58 ईसा पूर्व) है। शकों पर राजा विक्रमादित्य की ऐतिहासिक जीत के बाद विक्रम युग की स्थापना हुई। इस युग में गिने जाने वाले वर्षों को आमतौर पर विक्रमसंवत या केवल संवत शब्द से दर्शाया जाता है। वे बरसों बीत चुके हैं। उत्तर में प्रथा हर साल चैत्र (मार्च-अप्रैल) से शुरू होती है और हर महीने पूर्णिमा से। लेकिन दक्षिण के कुछ हिस्सों में और गुजरात में साल की शुरुआत कार्तिक (अक्टूबर-नवंबर) से होती है और महीनों की शुरुआत अमावस्या से होती है। शक, या शालिवाहन युग (78 ईस्वी) अभी भी भारत के कुछ हिस्सों में उपयोग किया जाता है। खगोलीय पिंडों से समय की गणना मे...

History of Chambal

 चम्बल का इतिहास क्या हैं? ये वो नदी है जो मध्य प्रदेश की मशहूर विंध्याचल पर्वतमाला से निकलकर युमना में मिलने तक अपने 1024 किलोमीटर लम्बे सफर में तीन राज्यों को जीवन देती है। महाभारत से रामायण तक हर महाकाव्य में दर्ज होने वाली चम्बल राजस्थान की सबसे लम्बी नदी है। श्रापित और दुनिया के सबसे खतरनाक बीहड़ के डाकुओं का घर माने जाने वाली चम्बल नदी मगरमच्छों और घड़ियालों का गढ़ भी मानी जाती है। तो आईये आज आपको लेकर चलते हैं चंबल नदी की सेर पर भारत की सबसे साफ़ और स्वच्छ नदियों में से एक चम्बल मध्य प्रदेश के इंदौर जिले में महू छावनी के निकट स्थित विंध्य पर्वत श्रृंखला की जनापाव पहाड़ियों के भदकला जलप्रपात से निकलती है और इसे ही चम्बल नदी का उद्गम स्थान माना जाता है। चम्बल मध्य प्रदेश में अपने उद्गम स्थान से उत्तर तथा उत्तर-मध्य भाग में बहते हुए धार, उज्जैन, रतलाम, मन्दसौर, भिंड, मुरैना आदि जिलों से होकर राजस्थान में प्रवेश करती है। राजस्थान में चम्बल चित्तौड़गढ़ के चौरासीगढ से बहती हुई कोटा, बूंदी, सवाईमाधोपुर, करोली और धौलपुर जिलों से निकलती है। जिसके बाद ये राजस्थान के धौलपुर से दक्षिण क...

History and Significance of Taking The Knee| Why Players Kneeling on the ground

History and Significance of Taking The Knee| Why Players Kneeling on the ground T20 World Cup में खिलाड़ियों द्वारा किया जाने वाला Taking The Knee क्या है? बीते कुछ समय से हम सभी लोग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चलने वाले खेलों में खिलाड़ियों को अपने एक घुटने के बल बैठता हुआ देखते आए हैं। चाहे फुटबॉल हो, क्रिकेट हो अथवा ओलंपिक खेल ही क्यों ना हो, खिलाड़ियों को अपने घुटने के बल बैठकर एक खास प्रदर्शन करना आखिर क्या दिखाता है? आखिर क्यों दुनिया भर के खिलाड़ी अपने अपने क्षेत्र में इस प्रकार की Body Language बना रहे हैं? Football Players Kneeling 18वीं और 19वीं शताब्दी में जब ब्रिटेन पूरी दुनिया पर अपना राज कर रहा था। तब ब्रिटिश अधिकारी कई अलग-अलग तरीकों से उन देशों के मूल निवासियों के प्रति घृणा का भाव रखते थे। जिनमें सबसे बड़ा भाव था रंग के आधार पर भेदभाव करना। रंगभेद, नस्लभेद या Racism भी कहा जाता है। रंगभेद और नस्ल भेद वक्त के साथ कमजोर पड़ते गए लेकिन कभी पूर्ण रूप से खत्म नहीं हो पाए। कुछ लोगों का केवल अपने त्वचा के रंग आधार पर यह मानना कि वह बाकी दुनिया से श्रेष्ठ हैं, एक प्रकार की विकृत ...

भारत का महान राजा अशोक, Ashoka The Great

अशोक, जिसे 'देवनामपिया पियादासी' या देवताओं के प्रिय के रूप में भी जाना जाता है, मौर्य वंश का अंतिम प्रमुख राजा था। उन्हें मुख्य रूप से उनके शासनकाल के दौरान भारत और विदेशों में बौद्ध धर्म के प्रसार में उनकी भूमिका के लिए याद किया जाता है। 1830 के दशक के मध्य तक, जब जेम्स प्रिंसेप ब्राह्मी लिपि में एक शिलालेख को समझने में सक्षम थे, उन्हें मौर्य राजाओं की सूची में कई शासकों में से एक माना जाता था। अंतिम पुष्टि कि शिलालेख में देवानामपिया पियादासी के रूप में दिखाई देने वाला नाम अशोक का था, 1915 में आया था। अशोक मौर्य राजा बिंदुसार के पुत्र थे। जबकि कुछ इतिहासकारों का मानना है कि वह अपने पिता की मृत्यु के तुरंत बाद सिंहासन पर चढ़ा, कई लोगों का तर्क है कि उनके कई भाइयों के बीच उत्तराधिकार के लिए संघर्ष में लगभग चार साल का अंतर था। एक प्रशासक के रूप में उनके करियर ने तब उड़ान भरी जब उन्होंने तक्षशिला में राज्यपाल के रूप में सेवा शुरू की। इसमें एक विद्रोह को दबाना और व्यावसायिक गतिविधियों को संभालना शामिल था। अशोक के शासन के दौरान विभिन्न घटनाओं में, कलिंग युद्ध को सबसे मह...