सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Suicide Fruiting

इस साल बाज़ार में जितने जामुन दिखाई दे रहे हैं, उतने मैंने पिछले दो दशकों में कभी नहीं देखे। ​जामुन के अक्षरशः ढेर लग रहे हैं (नीचे गिर रहे हैं)। जिन पेड़ों पर पिछले साल इक्का-दुक्का फल आए थे, वे पेड़ भी इस बार जामुन से पटे पड़े हैं। जहाँ फल आए थे, वहाँ अब उन का अंबार लगना शुरू हो गया है। ​आखिर यह सब क्या चल रहा है? ​हमारी दादी/नानी हमेशा कहती थीं कि, "जिस गर्मियों में जामुन के ऐसे ढेर लगते हैं, उस साल सूखा पड़ता है।" ​बुजुर्गों का यह पारंपरिक ज्ञान वनस्पति विज्ञान (Botany) के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बिल्कुल सही और सटीक है। विज्ञान में इस दिलचस्प और उतनी ही चौंकाने वाली प्रक्रिया को "मास्टिंग" (Masting) या "स्ट्रेस फ्रूटिंग" (Stress Fruiting) कहा जाता है। ​पेड़ों द्वारा खुद को खत्म करके ज्यादा से ज्यादा फल देने के इस आखिरी प्रयास को कभी-कभी "सुसाइड फ्रूटिंग" (Suicide Fruiting) या "बंपर क्रॉप" भी कहा जाता है। ​यह असल में क्या है और इसके पीछे का विज्ञान क्या कहता है, आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं: ​१. 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट' (अस्ति...

The reality of Indexes & Rankings

 

बहुत से लोगों की जिज्ञासा रहती है कि यह डीप स्टेट क्या होता है ? 


और सच में कोई डीप स्टेट होता है कि नहीं


 अभी अमेरिका की नई सरकार जो यूएस एड से पैसे लेने वाले संस्थानों और लोगों के नाम का खुलासा कर रही है यही आपको डीप स्टेट को समझने में बहुत आसानी हो जाएगी 


इसके अलावा रॉकफ़ेलर फाउंडेशन, फोर्ड फाउंडेशन जॉर्ज सोरेस का ओपन सोर्स फाउंडेशन और अमेरिकी सरकार का यूएस एड असल में यही डीप स्टेट होता है


 मतलब यह की आप स्टेट को अंदर तक हिलाने के लिए बहुत लंबे समय की प्लानिंग करिए


 अभी पता चला कि पूरी दुनिया में जो पत्रकारों यानी मीडिया की स्वतंत्रता का रैंकिंग जारी करने वाली एक निजी संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बाउंड्री या पूरे विश्व में हंगर इंडेक्स जारी करने वाली आयरलैंड की  एक क्रिश्चियन मिशनरी संस्था वॉल्ट हंगर स्ट्राइक इन सबको यूएस एंड और रॉकफेलर फाउंडेशन से बहुत मोटा पैसा मिला है


 और बदले में इन लोगों ने क्या किया की तीसरी दुनिया के डेमोक्रेटिक देश जैसे भारत ब्राजील वियतनाम में भुखमरी को सोमालिया बांग्लादेश और इथोपिया से भी खराब रैंकिंग दिया और तमाम देशों में जहां कोई निजी मीडिया नहीं है यानी ब्रुनेई अफगानिस्तान और सऊदी अरब जैसे देशों से भी इन देशों में मीडिया की स्वतंत्रता को एकदम खराब रैंकिंग दिया


यह हमेशा उन देशो को टारगेट करते हैं जहां जनसंख्या ज्यादा हो जहां लोगों के पास परचेसिंग पावर हो ताकि वहां स्थिरता खड़ा करके उत्तल-पुथल करके हथियारों से लेकर तमाम चीजों की डिमांड और सप्लाई मेंटेन किया जाए खूब हथियार बेचे जाएं इन देशों में उद्योग धंधे ना लगे और इन देशों को मोटा माल बेचकर पैसा कमाया जाए यही इनका सबसे बड़ा उद्देश्य होता है और इन लोगों ने वैक्सीनेशन को भी एक बहुत बड़े पैसा कमाने की मशीन बना दिया है


और यकीन मानिए अगर भारत चीन और रूस यह तीन देश कोविड वैक्सीन नहीं बनाए होते तो आज ब्रिटेन और अमेरिका की फाइजर और मोर्डना जैसी कंपनियां जॉनसन एंड जॉनसन जैसी कंपनियां अरबो खरबो डॉलर कमा गई होती


उसे दौर में आपने देखा होगा कि अरविंद केजरीवाल ममता बनर्जी राहुल गांधी अखिलेश यादव यह सब बार-बार सरकार पर दबाव डाल रहे थे कि सरकार जॉनसन एंड जॉनसन और फाइजर की वैक्सीन को भारत में बिकने की इजाजत दे हम इन कंपनियों से वैक्सीन खरीदना चाहते हैं हमको इन कंपनियों से डायरेक्ट डील करने की इजाजत दे


 मतलब आप समझ जाइए की डीप स्टेट अपने बिजनेस अपने स्वार्थ के लिए किस तरह से नेताओं को खरीद लेता है


 अब जब भी कोई रैंकिंग जारी होती है तमाम तरह के विपक्षी दल से लेकर BBC वांशिगटन  पोस्ट और दुनिया भर के लोग लहंगा उठा कर छाती कुटकर डांस करने लगते हैं कि भारत हंगर इंडेक्स में एकदम खराब पोजीशन पर है भारत प्रेस स्वतंत्रता में एकदम खराब पोजीशन पर है


 लेकिन कभी यह नहीं बताते कि यह इंडेक्स जारी कौन किया इसका पैमाना क्या है ?


और अगर भारत में प्रेस स्वतंत्रता एकदम खराब है तो ब्रुनेई अफगानिस्तान सऊदी अरब जैसे देशों में प्रेस स्वतंत्रता और चीन जैसे देश जहां कोई भी निजी मीडिया नहीं है वहां की प्रेस स्वतंत्रता भारत से बेहतर कैसे हैं ?


यह लोग अपना दिमाग नहीं लगाते और यहां पर डीप स्टेट अपना काम कर लेता है 


यानी एक नॉरेटिव बना देता है कि मोदी तानाशाह है मोदी खराब शासन है अब ऐसे ही कई सिलेब्रिटीज हालांकि अभी सिर्फ सोनम कपूर के नाम के खुलासा हुआ है वह बीच-बीच में मोदी के खिलाफ भारत सरकार के खिलाफ हिंदू धर्म के खिलाफ कुछ ट्वीट करके निकल जाती हैं और पूरे दुनिया की मीडिया उनके ट्वीट पर चर्चा करती है और फिर एक नॉरेटिव बना दिया जाता है कि भारत के मंदिरों में बलात्कार होते हैं 


लेकिन कोई यह नहीं सोचता कि इनको पैसे देकर यह ट्वीट करवाए गए हैं 


किसान आंदोलन के समय ग्रेटा थनवर्ग रिहाना और मियां खलीफा जैसे लोगों ने जो ट्वीट किया और फिर गलती से ग्रेटा थनबर्ग ने उसे टूलकिट को ट्वीट कर दिया तब यह पता चल गया कि कौन-कौन से सेलिब्रिटी को कब और क्या-क्या ट्वीट करना है वह सब अमेरिका से दिया जा रहा था और सबको पैसे दिए गए 


हालांकि केवल रिहाना नहीं ईमानदारी से स्वीकार किया कि मैं भारत में किसान आंदोलन के समय ट्वीट किया तीन ट्वीट के ढाई करोड डॉलर दो संस्थाओं से लिए थे उसमें से एक ओपन सोर्स फाउंडेशन था और दूसरा यूएस एड था अ


भी फेज वाइज  धीरे-धीरे तमाम नाम के खुलासे होते जा रहे हैं 


इसीलिए मैं कहता हूं कि यह जो तमाम तरह के इंडेक्स जारी किए जाते हैं तो उन्हें देखिए और फाड़ कर फेंक दीजिए यह सब डीप स्टेट की कारगुजारी होती है 


और जब पहली बार ट्रंप सत्ता में आए थे तब भी उन्होंने खुलासा किया था कि भारत के तमिलनाडु के न्यूक्लियर प्लांट जो रूस के सहयोग से लगने वाला था वह ना लगे उसके लिए अमेरिका की यूएस एड  ने भारत के चर्च सहित 12 संस्थाओं को 30 करोड  डॉलर  दिए थे।

टिप्पणियाँ

Best From the Author

Not demonic, just introverted! आसुरी नहीं, अंतर्मुखी!

मैं 27 मूल नक्षत्रों, शनिवार और 22 तारीख को जन्मा व्यक्ति हूँ — एक ऐसा जन्म‑संयोग जो न सिर्फ़ मेरी तिथि बताता है, बल्कि मेरे भीतर की गहराई, द्वंद्व और अस्थिरता का भी संकेत देता है। राहु के प्रबल और दूरदर्शी प्रभाव ने मेरे व्यक्तित्व को सीधे, सरल और सतही नहीं रहने दिया; मैं विचारों की उस गहरी खाई में अक्सर भटक जाता हूँ, जहाँ हर बात बस बाहरी रूप नहीं, बल्कि भीतरी अर्थ भी धरती होता है। मैं हर निर्णय के पीछे छिपे संभावित नतीजों, अनजाने खतरों और छिपी हुई उम्मीदों को भी देखने का आदी हूँ।   कभी‑कभी लोग मेरे कार्यों, अभिव्यक्ति और निर्णयों को असामान्य, अत्यंत गहन या यहाँ तक कि “आसुरी” समझने लगते हैं, क्योंकि मेरी सोच उनकी सामान्य धारणाओं की रेखाओं से बाहर निकल जाती है। पर यह आसुरी नहीं, बस एक टूटी हुई, खुरदरी और अत्यंत ईमानदार आत्मा की आवाज़ है, जो दिखावे की दुनिया से थक चुकी है और अपने सच्चे रूप में जीना चाहती है। मैं जब भी बोलता हूँ, तो बस शब्द नहीं बोलता, बल्कि उसके पीछे समा दर्द, संघर्ष, अनुभव और उम्मीदों को भी लाता हूँ।   मेरी पहचान में ग्रहों का भी बड़ा हाथ है। जब ग्रह ही वही है...

काग के भाग बड़े सजनी

  पितृपक्ष में रसखान रोते हुए मिले। सजनी ने पूछा -‘क्यों रोते हो हे कवि!’ कवि ने कहा:‘ सजनी पितृ पक्ष लग गया है। एक बेसहारा चैनल ने पितृ पक्ष में कौवे की सराहना करते हुए एक पद की पंक्ति गलत सलत उठायी है कि कागा के भाग बड़े, कृश्न के हाथ से रोटी ले गया।’ सजनी ने हंसकर कहा-‘ यह तो तुम्हारी ही कविता का अंश है। जरा तोड़मरोड़कर प्रस्तुत किया है बस। तुम्हें खुश होना चाहिए । तुम तो रो रहे हो।’ कवि ने एक हिचकी लेकर कहा-‘ रोने की ही बात है ,हे सजनी! तोड़मोड़कर पेश करते तो उतनी बुरी बात नहीं है। कहते हैं यह कविता सूरदास ने लिखी है। एक कवि को अपनी कविता दूसरे के नाम से लगी देखकर रोना नहीं आएगा ? इन दिनों बाबरी-रामभूमि की संवेदनशीलता चल रही है। तो क्या जानबूझकर रसखान को खान मानकर वल्लभी सूरदास का नाम लगा दिया है। मनसे की तर्ज पर..?’ खिलखिलाकर हंस पड़ी सजनी-‘ भारतीय राजनीति की मार मध्यकाल तक चली गई कविराज ?’ फिर उसने अपने आंचल से कवि रसखान की आंखों से आंसू पोंछे और ढांढस बंधाने लगी।  दृष्य में अंतरंगता को बढ़ते देख मैं एक शरीफ आदमी की तरह आगे बढ़ गया। मेरे साथ रसखान का कौवा भी कांव कांव करता चला आ...

Kashi ka Assi Book Review

**किताब समीक्षा: "काशी का अस्सी"** **लेखक**: काशीनाथ सिंह   **शैली**: व्यंग्यात्मक कथा साहित्य   **प्रकाशन वर्ष**: 2004 "काशी का अस्सी" हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण और चर्चित उपन्यास है, जिसे काशीनाथ सिंह ने लिखा है। यह किताब बनारस की जीवनशैली, वहाँ की संस्कृति और आम जनमानस की भाषा और बोलचाल का जीवंत चित्रण करती है। किताब का केंद्र बनारस का प्रसिद्ध अस्सी घाट है, जो सिर्फ एक भौगोलिक स्थल नहीं, बल्कि बनारसी जीवन का प्रतीक है। ### **कहानी का सारांश**: कहानी अस्सी घाट के इर्द-गिर्द घूमती है, जहाँ विभिन्न तबकों के लोग बैठकर बातचीत, बहस और ठहाके लगाते हैं। यह बनारसी समाज की धड़कनों को पकड़ता है। किताब में कई पात्र हैं, जिनमें मुख्यत: पंडित, टीकाकार, शिक्षक, छात्र, नौकरीपेशा लोग और साधारण नागरिक शामिल हैं। हर व्यक्ति का अपना दृष्टिकोण और जीवन के प्रति अपने अनुभव होते हैं, जो किताब को वास्तविक और मजेदार बनाते हैं। **काशी का अस्सी** में अस्सी घाट के पंडों और स्थानीय निवासियों के रोजमर्रा के जीवन को बड़े ही सजीव और व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है। काशी का परंपर...