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प्रेमचंद के फटे जूते

  प्रेमचंद का एक चित्र मेरे सामने है, पत्नी के साथ फ़ोटो खिंचा रहे हैं. सिर पर किसी मोटे कपड़े की टोपी, कुरता और धोती पहने हैं. कनपटी चिपकी है, गालों की हड्डियां उभर आई हैं, पर घनी मूंछें चेहरे को भरा-भरा बतलाती हैं. पांवों में केनवस के जूते हैं, जिनके बंद बेतरतीब बंधे हैं. लापरवाही से उपयोग करने पर बंद के सिरों पर की लोहे की पतरी निकल जाती है और छेदों में बंद डालने में परेशानी होती है. तब बंद कैसे भी कस लिए जाते हैं. दाहिने पांव का जूता ठीक है, मगर बाएं जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अंगुली बाहर निकल आई है. मेरी दृष्टि इस जूते पर अटक गई है. सोचता हूं-फ़ोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी-इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है. यह जैसा है, वैसा ही फ़ोटो में खिंच जाता है. मैं चेहरे की तरफ़ देखता हूं. क्या तुम्हें मालूम है, मेरे साहित्यिक पुरखे कि तुम्हारा जूता फट गया है और अंगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हें इसका ज़रा भी अहसास नहीं है? ज़रा लज्जा, संकोच या झेंप नहीं है? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि धोती को थोड़ा न...

Glorified Kohli

 विराट कोहली ने एक इंटरव्यू में कहा है कि अगर इंडियन टीम 2028 के ओलंपिक में गोल्ड मेडल खेलने के लिए उतरती है तो वो सिर्फ एक मैच के लिए रिटायरमेंट छोड़कर उस टीम का हिस्सा बनना चाहेंगे। वैसे तो ये सवाल हाइपोथेटिकल था,पर कुछ लोगो को कोहली के जवाब में निजी स्वार्थ भी दिख सकता है। पर मुझे इस जवाब में बस एक चीज दिखती है, Thirst for Glory, यानी नाम का लालच, legacy trap..अब कहने को बुद्धिजीवी लोग इस भावना में बीस कमियां निकाल सकते है, कि कैसे ये भावना टॉक्सिक है, पर असलियत में यही वो भावना है, जो दिल्ली के मामूली से क्रिकेटर को क्रिकेट का सरताज बनाती है।यही वो भावना है जिसकी वजह से रांची का टिकट कलेक्टर जमी जमाई नौकरी छोड़ देता है, यही वो भावना है जिसकी वजह से रोमांटिक फिल्मों के जमाने में एक मामूली सा आउटसाइडर एक्टर एक साइकोपैथ lover का रोल करने के लिए राजी हो जाता है। कामयाबी, पैसा, ये सब किसी न किसी तरह से मिल ही जाता है,इंसान अपने पोटेंशल का अगर 20% भी झोंक दे,तो ये सब कोई नामुमकिन चीज नहीं है।


पर इंसान धोनी कोहली या शाहरुख खान तब बनता है, जब वो ग्लोरी के पीछे भागता है, लीगेसी के पीछे भागता है। घर किला बनाने में थोड़ी किस्मत, थोड़ा सहारा,थोड़ी चापलूसी काफी होती है, पर अगर आपको नाम कमाना है, अपनी फील्ड में बेस्ट बनना है,तो फिर तो बाबू पूरी जान झोंकना ही पहला और आखिरी ऑप्शन होता है। पर इस भावना के साथ दिक्कत ये है कि ये arogent sound करती है,और दुनिया तो हंबल लोगों की है, "जी थैंक्यू,अरे सर मैने कहा कुछ किया,आप सब लोगो की दुआएं है बोलने वाले लोगों को ज्यादा पसंद किया जाता है"।जबकि खोटे सिक्को को तो भिखारी भी अपने कटोरे से फेंक देता है, हीरा मिलता भले अंधेरी खान में हो,पर कभी ठेले पर नहीं बिकता है,ज्यादातर लोग आपके इर्द गिर्द तभी इकट्ठा होना शुरू होते है जब आप कुछ बन जाते है,जब तक आप कुछ बनेंगे नहीं तब तक आपका हंबल होना भी एक शर्त एक मजबूरी की तरह देखा जाता है।


इसलिए खाओ कमाओ, अपने और अपने परिवार को सिक्योर करो, पर अगर किसी काम के अच्छे हो, और बेहतर होने की गुंजाइश नजर आती हो तो success नहीं glory के पीछे भागो।पर दिक्कत ये है कि जब आप ग्लोरी के पीछे भागते है तो आपको रस्ते में succes के stop पर कई लोग बैठे मिलते है,आराम करते हुए, जो ये बताने समझाने की कोशिश करते है कि इसके आगे कुछ नहीं रखा, बैठो आराम करो। ऐसे लोग ये समझाने में लगते है कि ग्लोरी के पीछे भागने वाले परिवार नहीं बना पाते,रिश्ते कायम नहीं रख पाते।पर जब आप शाहरुख, विराट और धोनी की तरफ देखते है तो आपको मालूम चलता है कि हैप्पी मैन, हैप्पी फैमिली के सभी खांचे इन पर फिट बैठते है, पर इनका लालच खत्म नहीं होता, ये अभी भी भाग रहे है, आगे भी भागते रहेंगे, उनकी इस जिद और लालच की कीमत कही न कही उनके परिवार को भी चुकानी पड़ती है,पर ये thirst of glory के नशे के आदी हो चुके है,ये भागते रहेंगे इसी तरह, ये कभी आपको लालची दिखेंगे, कभी arogent, कभी delutional, पर जैसा कि tywin lannistor ने हिरन की खाल उतारते हुए कहा था, "A lion doesn't concern himself with opinion of sheep"


रेहान अहमद

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