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Suicide Fruiting

इस साल बाज़ार में जितने जामुन दिखाई दे रहे हैं, उतने मैंने पिछले दो दशकों में कभी नहीं देखे। ​जामुन के अक्षरशः ढेर लग रहे हैं (नीचे गिर रहे हैं)। जिन पेड़ों पर पिछले साल इक्का-दुक्का फल आए थे, वे पेड़ भी इस बार जामुन से पटे पड़े हैं। जहाँ फल आए थे, वहाँ अब उन का अंबार लगना शुरू हो गया है। ​आखिर यह सब क्या चल रहा है? ​हमारी दादी/नानी हमेशा कहती थीं कि, "जिस गर्मियों में जामुन के ऐसे ढेर लगते हैं, उस साल सूखा पड़ता है।" ​बुजुर्गों का यह पारंपरिक ज्ञान वनस्पति विज्ञान (Botany) के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बिल्कुल सही और सटीक है। विज्ञान में इस दिलचस्प और उतनी ही चौंकाने वाली प्रक्रिया को "मास्टिंग" (Masting) या "स्ट्रेस फ्रूटिंग" (Stress Fruiting) कहा जाता है। ​पेड़ों द्वारा खुद को खत्म करके ज्यादा से ज्यादा फल देने के इस आखिरी प्रयास को कभी-कभी "सुसाइड फ्रूटिंग" (Suicide Fruiting) या "बंपर क्रॉप" भी कहा जाता है। ​यह असल में क्या है और इसके पीछे का विज्ञान क्या कहता है, आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं: ​१. 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट' (अस्ति...

Glorified Kohli

 विराट कोहली ने एक इंटरव्यू में कहा है कि अगर इंडियन टीम 2028 के ओलंपिक में गोल्ड मेडल खेलने के लिए उतरती है तो वो सिर्फ एक मैच के लिए रिटायरमेंट छोड़कर उस टीम का हिस्सा बनना चाहेंगे। वैसे तो ये सवाल हाइपोथेटिकल था,पर कुछ लोगो को कोहली के जवाब में निजी स्वार्थ भी दिख सकता है। पर मुझे इस जवाब में बस एक चीज दिखती है, Thirst for Glory, यानी नाम का लालच, legacy trap..अब कहने को बुद्धिजीवी लोग इस भावना में बीस कमियां निकाल सकते है, कि कैसे ये भावना टॉक्सिक है, पर असलियत में यही वो भावना है, जो दिल्ली के मामूली से क्रिकेटर को क्रिकेट का सरताज बनाती है।यही वो भावना है जिसकी वजह से रांची का टिकट कलेक्टर जमी जमाई नौकरी छोड़ देता है, यही वो भावना है जिसकी वजह से रोमांटिक फिल्मों के जमाने में एक मामूली सा आउटसाइडर एक्टर एक साइकोपैथ lover का रोल करने के लिए राजी हो जाता है। कामयाबी, पैसा, ये सब किसी न किसी तरह से मिल ही जाता है,इंसान अपने पोटेंशल का अगर 20% भी झोंक दे,तो ये सब कोई नामुमकिन चीज नहीं है।


पर इंसान धोनी कोहली या शाहरुख खान तब बनता है, जब वो ग्लोरी के पीछे भागता है, लीगेसी के पीछे भागता है। घर किला बनाने में थोड़ी किस्मत, थोड़ा सहारा,थोड़ी चापलूसी काफी होती है, पर अगर आपको नाम कमाना है, अपनी फील्ड में बेस्ट बनना है,तो फिर तो बाबू पूरी जान झोंकना ही पहला और आखिरी ऑप्शन होता है। पर इस भावना के साथ दिक्कत ये है कि ये arogent sound करती है,और दुनिया तो हंबल लोगों की है, "जी थैंक्यू,अरे सर मैने कहा कुछ किया,आप सब लोगो की दुआएं है बोलने वाले लोगों को ज्यादा पसंद किया जाता है"।जबकि खोटे सिक्को को तो भिखारी भी अपने कटोरे से फेंक देता है, हीरा मिलता भले अंधेरी खान में हो,पर कभी ठेले पर नहीं बिकता है,ज्यादातर लोग आपके इर्द गिर्द तभी इकट्ठा होना शुरू होते है जब आप कुछ बन जाते है,जब तक आप कुछ बनेंगे नहीं तब तक आपका हंबल होना भी एक शर्त एक मजबूरी की तरह देखा जाता है।


इसलिए खाओ कमाओ, अपने और अपने परिवार को सिक्योर करो, पर अगर किसी काम के अच्छे हो, और बेहतर होने की गुंजाइश नजर आती हो तो success नहीं glory के पीछे भागो।पर दिक्कत ये है कि जब आप ग्लोरी के पीछे भागते है तो आपको रस्ते में succes के stop पर कई लोग बैठे मिलते है,आराम करते हुए, जो ये बताने समझाने की कोशिश करते है कि इसके आगे कुछ नहीं रखा, बैठो आराम करो। ऐसे लोग ये समझाने में लगते है कि ग्लोरी के पीछे भागने वाले परिवार नहीं बना पाते,रिश्ते कायम नहीं रख पाते।पर जब आप शाहरुख, विराट और धोनी की तरफ देखते है तो आपको मालूम चलता है कि हैप्पी मैन, हैप्पी फैमिली के सभी खांचे इन पर फिट बैठते है, पर इनका लालच खत्म नहीं होता, ये अभी भी भाग रहे है, आगे भी भागते रहेंगे, उनकी इस जिद और लालच की कीमत कही न कही उनके परिवार को भी चुकानी पड़ती है,पर ये thirst of glory के नशे के आदी हो चुके है,ये भागते रहेंगे इसी तरह, ये कभी आपको लालची दिखेंगे, कभी arogent, कभी delutional, पर जैसा कि tywin lannistor ने हिरन की खाल उतारते हुए कहा था, "A lion doesn't concern himself with opinion of sheep"


रेहान अहमद

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