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प्रेमचंद के फटे जूते

  प्रेमचंद का एक चित्र मेरे सामने है, पत्नी के साथ फ़ोटो खिंचा रहे हैं. सिर पर किसी मोटे कपड़े की टोपी, कुरता और धोती पहने हैं. कनपटी चिपकी है, गालों की हड्डियां उभर आई हैं, पर घनी मूंछें चेहरे को भरा-भरा बतलाती हैं. पांवों में केनवस के जूते हैं, जिनके बंद बेतरतीब बंधे हैं. लापरवाही से उपयोग करने पर बंद के सिरों पर की लोहे की पतरी निकल जाती है और छेदों में बंद डालने में परेशानी होती है. तब बंद कैसे भी कस लिए जाते हैं. दाहिने पांव का जूता ठीक है, मगर बाएं जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अंगुली बाहर निकल आई है. मेरी दृष्टि इस जूते पर अटक गई है. सोचता हूं-फ़ोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी-इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है. यह जैसा है, वैसा ही फ़ोटो में खिंच जाता है. मैं चेहरे की तरफ़ देखता हूं. क्या तुम्हें मालूम है, मेरे साहित्यिक पुरखे कि तुम्हारा जूता फट गया है और अंगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हें इसका ज़रा भी अहसास नहीं है? ज़रा लज्जा, संकोच या झेंप नहीं है? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि धोती को थोड़ा न...

Laxman VS Karna

 "रामायण के लक्ष्मण या महाभारत के कर्ण में से शक्तिशाली कौन थे?" 


आदर के साथ कहना चाहूंगा कि आपका ये प्रश्न ही अनुचित है। पौराणिक पात्रों की तुलना करते समय हम जो सबसे बड़ी गलती करते हैं, वो वही है जो आपने अपने इस प्रश्न में की है। सदा स्मरण रखें कि कभी भी किसी दो के योद्धाओं की तुलना आपस मे ना करें क्योंकि वो तर्कसंगत नही है। बात यहाँ लक्ष्मण और कर्ण की नहीं है, बात ये भी नहीं है कि कर्ण के स्थान पर यहाँ अर्जुन होते, द्रोण होते, भीष्म होते या कोई और। बात ये है कि एक त्रेतायुग के योद्धा की तुलना एक द्वापरयुग के योद्धा से करना ही गलत है।


आपको मेरे उत्तर से निराशा हो सकती है क्यूंकि मैं यहाँ लक्ष्मण और कर्ण का कोई भी तुलनात्मक अध्ययन नहीं करने वाला हूँ। इसका एक कारण ये भी है कि लक्ष्मण से कर्ण या अर्जुन की तुलना करना भी वीरवर लक्ष्मण का अपमान होगा। मैं बस ये साफ़ करना चाहता हूँ कि इस प्रकार के कपोलकल्पना से भरे प्रश्न क्यों अनुचित हैं। अगर आप मुझसे सहमत ना हों तो क्षमा चाहूँगा।


जब हम अपने धर्मग्रंथों को पढ़ते हैं तो कई ग्रंथों, विशेषकर पुराणों में अलग-अलग युगों के व्यक्तियों के सामर्थ्य के भेद के विषय में बहुत स्पष्टता से लिखा गया है। ये बहुत स्पष्ट है कि सतयुग के योद्धा सबसे अधिक शक्तिशाली होते थे। फिर जैसे-जैसे समय बीतता था, योद्धाओं का बल और पराक्रम क्षीण होता जाता था। ब्रह्मपुराण में वर्णित है कि सतयुग में व्यक्ति की औसत ऊंचाई २१ हाथ, त्रेता में १४ हाथ, द्वापर में ७ हाथ एवं कलियुग में ४ हाथ होती थी। केवल इस एक वर्णन के आधार पर आप उनके बल के अंतर का आंकलन कर सकते हैं।


त्रेतायुग का रावण कितना बलशाली था वो सब को पता है किन्तु अब आप उसके बल की तुलना सतयुग के हिरण्यकशिपु से तो नहीं कर सकते हैं ना? हिरण्यकशिपु तो छोड़िये, रावण हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रह्लाद के पुत्र विरोचन के पुत्र दैत्यराज बलि का बाजूबंद तक नहीं उठा पाया था। किन्तु इसका अर्थ ये नहीं कि आप रावण की वीरता पर संदेह करें। बस दोनों युगों के योद्धाओं के सामर्थ्य में अंतर था। सतयुग के धनुष "पिनाक" को त्रेतायुग के महान से महान योद्धा हिला भी नहीं पाए थे। उसी प्रकार त्रेतायुग के हनुमान की पूंछ द्वापर के सर्वाधिक बली भीम हिला भी नहीं पाए थे। हनुमान ने ही द्वापरयुग के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन के बाणों का पुल अपनी कनिष्ठा अंगुली से ही तोड़ दिया था।


कहने का तात्पर्य ये है कि जैसे-जैसे युग आगे बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे योद्धाओं की शक्ति क्षीण होती जाती है। इसीलिए कभी भी सतयुग के योद्धा की तुलना त्रेता के योद्धा से या त्रेता के योद्धा की तुलना द्वापर के योद्धा से नहीं करनी चाहिए। ये ठीक ऐसा ही है कि आप द्वापर के महान योद्धा कर्ण या अर्जुन की तुलना कलियुग के सर्वश्रेष्ठ योद्धा से कर दें। हम सभी को पता है कि कलियुग का सर्वश्रेष्ठ से सर्वश्रेष्ठ योद्धा भी कर्ण या अर्जुन के समक्ष एक चींटी से अधिक कुछ नहीं होगा। बिलकुल यही अनुपात अन्य युगों के योद्धाओं के बीच है।


अगर वास्तव में तुलना करना चाहते हैं तो समान युग के योद्धाओं की तुलना करें। हिरण्यकशिपु की तुलना वृत्रासुर या महिषासुर से करें, लक्ष्मण की तुलना मेघनाद या रावण से करें, कर्ण की तुलना अर्जुन, द्रोण या भीष्म से करें। वो बिलकुल तर्कसंगत होगा। लेकिन अब आप रावण की तुलना दुर्योधन या कंस से कर दें तो उसपर हंसी ही आ सकती है। बिलकुल ऐसी ही तुलना आपका ये प्रश्न भी कर रहा है।


मैंने जान-बूझ कर लक्ष्मण और कर्ण के बल या अस्त्र-शस्त्रों की तुलना नहीं की है। क्यों नहीं की है, उसका कारण आपको अब तक समझ में आ ही गया होगा। अगर मेरे उत्तर से कष्ट पहुँचा हो तो पहले ही करबद्ध क्षमा मांग लेता हूँ।

जय श्री राम 

जय श्रीकृष्ण।

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