सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

RCB vs CSK 2025

 सौ दिन की पराजय एक क्षण की कायरता से बेहतर होती है.. 18 साल के IPL में, कभी भी मैने, धोनी के क्रीज पर रहते हुए,चेपक को इतना खामोश नहीं देखा था, जितना खामोश चेपक आज था। बहुत से लोग धोनी को शायद इसलिए पसंद करते होंगे क्योंकि उसने ट्रॉफियां जिताई है, रन बनाए है, छक्के मारे है। पर मुझे धोनी सिर्फ और सिर्फ अपनी दिलेरी की वजह से पसंद रहा है। वो बांग्लादेश वाला मैच, जब एक रन बराबरी के लिए चाहिए था,कोई और विकेटकीपर होता तो थ्रो मार देता, पर हाथ में गेंद लेकर स्प्रिंट नहीं लगाता। क्योंकि थ्रो मारने पर थ्रो लगे न लगे,मामला फिफ्टी फिफ्टी का रहता है, कोई धोनी को ब्लेम करने नहीं जाता, पर हाथ में गेंद लेकर दौड़ने पर अगर एक दो सेकंड का फासला भी रहता तो सारा ब्लेम धोनी पर ही आना था, पर धोनी को कभी डर नहीं लगा इन बातों से। इसी तरह वर्ल्डकप फाइनल में, खुद को युवराज की जगह प्रमोट करना,वहां धोनी के पास पाने को कम और खोने को ज्यादा था। पर ये बन्दा उतरा, खेला, और जिताया भी।कई लोग धोनी को उस दिन के लिए ट्रॉल करते है, जब धोनी ने अंबाती रायडू को आधी पिच से लौटा दिया था इस कॉन्फिडेंट में कि लास्ट बॉल पर मै...

The Bloodiest Revolution in India's Freedom Movement that you haven't heard of!!!

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में आंदोलन का नाम एक ऐसे बदलाव के रूप में दर्ज है, जो आगे चलकर सामाजिक क्रांति का प्रतीक बन गया। पंजाब से शुरू हुए इस आंदोलन की नींव शालीन व्यक्ति के मालिक सतगुरु राम सिंह नामधारी ने रखी, जो एक धर्मगुरु, आंदोलन के नेतृत्वकर्ता और महिलाओं का उत्थान करने वाले शख्स के रूप में जाने जाते हैं। अपने बहुमुखी व्यक्तित्व के कारण ही वह ब्रिटिश शासन के खिलाफ बड़ा आंदोलन खड़ा करने में समाज की स्थापना की और महिलाओं, खासकर बालिकाओं के रक्षक बनकर उभरे। उन्होंने नारी उद्धार, अंतर्जातीय विवाह व सामूहिक विवाह के साथ- साथ गौरक्षा के लिए जीवन समर्पित कर दिया। नामधारी सिखों की कुर्बानी स्वतंत्रता संग्रम के इतिहास में कूका आंदोलन के नाम से दर्ज है, जिसकी कमान सतगुरु राम सिंह के हाथों में थी 12 अप्रैल, 1857 को लुधियाना के करीब भैणी साहिब में सफेद रंग का स्वतंत्रता का ध्वज फहराकर कूका आंदोलन की शुरुआत हुई। खास बात यह थी कि सतगुरु राम सिंह के अनुयायी सिमरन में लीन रहते हुए आंदोलन को आगे बढ़ाते थे। अंग्रेजों के खिलाफ हुंकार (कूक) करने के कारण उन्हें कूका के नाम से जाना जाने लगा। इस अदोलन में सभी वर्गों साधारण शामिल थे। लोगों में न सिर्फ आत्म सम्मान, देशप्रेम और भक्ति की या कि समाज में पनी के खिलाफ एक उन्होंने लोगों में स्वाभिमान जागृत किया। 

नामधारी समाज से संबंध रखने वाले लेखक संत सिंह कहते हैं, 'सतगुरु रामसिंह धार्मिक और सामाजिक सुधार आम लोगों के लिए धार्मिक नेताओं के चंगुल से निकलने की बुनियाद बन गए।"

कुरीतियों के साथ युद्ध
यह यह दौर था जब कन्याओं को पैदा होते ही मार देना, उन्हें बेच देना या उनका बाल विवाह कर देने जैसी कुरीतियां समाज में गहरी पकड़ बना चुकी थीं। गुरु जी ने इसकी वजह को समझा और पाया कि इन सभी का ताल्लुक विवाह में होने वाले भारी भरकम खर्च से है। उन्होंने तीन जून, 1853 को फिरोजपुर में छह जोड़ों का सामूहिक विवाह करवाकर सामाजिक बदलाव की शुरुआत की। साथ ही पुरुषों की तरह महिलाओं को भी अमृत छका कर (अमृतपान) उन्हे सिख पंथ से जोड़ा। उन्होंने महज सवा रुपए में विवाह करने की परंपरा की शुरुआत की, जो आज भी बरकरार है। इससे दहेज जैसी कुरीति पर अंकुश लगा और विवाह समारोहों में बेवजह खर्च की पेड़ भी कम हुई। महाराजा रणजीत सिंह की फौज छोड़ने के बाद उन्होंने सामाजिक जंग छेड़ने के लिए उन्होंने गुरु गोबिंद सिंह जी की शिक्षाओं का सहारा लिया।

घबरा गए अंग्रेज

उनकी बढ़ती लोकप्रियता से अंग्रेजो को भय हो गया कि नामधारी सिर्फ एक धार्मिक समुदाय नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक इरादे पालने वाला पंथ है, जो उनके लिए बड़ी चुनौती साबित होगा। यदि इसे तत्काल न कुचला गया तो यह खतरनाक रूप ले सकता है। इसी क्रम में सतगुरु राम सिंह को 1863 में लुधियाना के भैणी साहिब में नजरबंद कर दिया गया। अंग्रेजों ने लोगों को धर्म के नाम पर बांटने के लिए जब पंजाब में गौमांस के लिए बूचड़खाने खोले तो सतगुरु राम सिंह ने इसका कड़ा विरोध। किया। अंग्रेजों की मंशा थी कि इससे हिंदू, मुसलमान और सिख आपस में लड़ेंगे। नामधारियों ने लुधियाना के रायकोट के एक बूचड़खाने से बड़ी संख्या में गायों, को मुक्त कराया। उन्होंने गायों की सुरक्षा के लिए अपने अनुयायियों का भी प्रेरित किया। इस बगायत की सजा के तौर पर पांच अगस्त 1871 को तीन नामधारी सिखों को रायकोट में, दो नामधारी सिखों को 26 नवंबर, 1871 को लधियाना में व 15 दिसंबर, 1871 को चार नामधारी सिक्खों को तोप के मुंह के सामने बांध कर उड़ा दिया गया। 


विद्रोह कुचलने की हर कोशिश

मालेरकोटला में 15 जनवरी, 1872 को गायों को मुक्त करवाने के लिए नामधारियों ने बूचड़खानों पर हमला बोल दिया। 30 नामधारी सिख लड़ते हुए शहीद अंग्रेजों ने इस विद्रोह कुचलने के लिए, मालेरकोटला के परेड ग्राउंड में 49 नामधारी सिक्खों को तोपों के सामने खड़ा कर उड़ा दिया। 18 जनवरी, 1872 को 36 अन्य सिख भी ऐसे ही शहीद हो गए। चार लोगों को काले पानी की सजा हुई। इस घटना का असर यह हुआ कि लोग खुलकर नामधारी समुदाय से जुड़ने लगे और अंग्रेजों के खिलाफ बगावत तेज कर दी। अब वे अंग्रेजों को ललकारने लगे। बड़ी संख्या में लोग सतगुरु राम सिंह के नेतृत्व में नामधारी बन गए और अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद की। सतगुरु पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने असहयोग, अंग्रेजी वस्तुओं व सेवाओं के बहिष्कार को अंग्रेजों के विरुद्ध एक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। भगत सिंह और उनके साथियों ने भी स्वतंत्रता की लड़ाई में नामधारी समाज के सहयोग की प्रशंसा की थी।



यदि आपको हमारा आज का ब्लॉग पसंद आया तो इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर करें। 

टिप्पणियाँ

Best From the Author

The Justice Verma Incident

 हास्य व्यंग्य : वाह रे न्याय....!! फायर ब्रिगेड के ऑफिस में हड़कंप मच गया। आग लगने की सूचना जो मिली थी उन्हें। आग भी कहां लगी ? दिल्ली हाईकोर्ट के माननीय न्यायाधीश “फलाने वर्मा” के सरकारी बंगले में..! घटना की सूचना मिलने पर फायर ब्रिगेड कर्मचारियों के हाथ पांव फूल गए । "माई लॉर्ड" के बंगले में आग ! हे भगवान ! अब क्या होगा ? एक मिनट की भी अगर देर हो गई तो माई लॉर्ड सूली पर टांग देंगे ! वैसे भी माई लॉर्ड का गुस्सा सरकार और सरकारी कर्मचारियों पर ही उतरता है। बाकी के आगे तो ये माई लॉर्ड एक रुपए की हैसियत भी नहीं रखते हैं जिसे प्रशांत भूषण जैसे वकील भरी कोर्ट में उछालते रहते हैं।  बेचारे फायर ब्रिगेड के कर्मचारी एक साथ कई सारी फायर ब्रिगेड लेकर दौड़ पड़े और आनन फानन में आग बुझाने लग गए। अचानक एक फायर ऑफिसर की नजर सामने रखे नोटों के बंडलों पर पड़ी। वह एक दम से ठिठक गया। उसके हाथ जहां के तहां रुक गए..!! नोट अभी जले नहीं थे..!! लेकिन दमकल के पानी से खराब हो सकते थे.. इसलिए उसने फायर ब्रिगेड से पानी छोड़ना बंद कर दिया और दौड़ा दौड़ा अपने बॉस के पास गया...  "बॉस...!    म...

The Story of Yashaswi Jaiswal

जिस 21 वर्षीय यशस्वी जयसवाल ने ताबड़तोड़ 98* रन बनाकर कोलकाता को IPL से बाहर कर दिया, उनका बचपन आंसुओं और संघर्षों से भरा था। यशस्‍वी जयसवाल मूलरूप से उत्‍तर प्रदेश के भदोही के रहने वाले हैं। वह IPL 2023 के 12 मुकाबलों में 575 रन बना चुके हैं और ऑरेंज कैप कब्जाने से सिर्फ 2 रन दूर हैं। यशस्वी का परिवार काफी गरीब था। पिता छोटी सी दुकान चलाते थे। ऐसे में अपने सपनों को पूरा करने के लिए सिर्फ 10 साल की उम्र में यशस्वी मुंबई चले आए। मुंबई में यशस्वी के पास रहने की जगह नहीं थी। यहां उनके चाचा का घर तो था, लेकिन इतना बड़ा नहीं कि यशस्वी यहां रह पाते। परेशानी में घिरे यशस्वी को एक डेयरी पर काम के साथ रहने की जगह भी मिल गई। नन्हे यशस्वी के सपनों को मानो पंख लग गए। पर कुछ महीनों बाद ही उनका सामान उठाकर फेंक दिया गया। यशस्वी ने इस बारे में खुद बताया कि मैं कल्बादेवी डेयरी में काम करता था। पूरा दिन क्रिकेट खेलने के बाद मैं थक जाता था और थोड़ी देर के लिए सो जाता था। एक दिन उन्होंने मुझे ये कहकर वहां से निकाल दिया कि मैं सिर्फ सोता हूं और काम में उनकी कोई मदद नहीं करता। नौकरी तो गई ही, रहने का ठिकान...

The Reality of Kumbh Snan

 फरवरी के अंत तक देश में दो ही तरह के लोग बचेंगे—एक वे, जिन्होंने कुंभ में स्नान कर लिया और दूसरा वे, जिन्होंने कुंभ में स्नान नहीं किया!यह विभाजन जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र से ऊपर उठकर नई पहचान गढ़ रहा है—"स्नानी" बनाम "अस्नानी"! कुंभ में स्नान कर चुके लोग खुद को शुद्धता का आखिरी प्रमाणपत्र मानेंगे! उनके चेहरे की चमक किसी फेशियल क्रीम से नहीं, बल्कि गंगा जल की बूंदों से उपजी होगी! वे किसी भी तर्क-वितर्क में यह कहकर जीत जाएंगे—"पहले स्नान कर आओ, फिर बात करना!" धर्म और आस्था की भावना से लबरेज, वे खुद को मोक्ष के एक कदम करीब मानेंगे और दूसरों को अधूरे जीवन का बोझ उठाने वाला समझेंगे! दूसरी तरफ वे होंगे, जो कुंभ में नहीं जा पाए—कारण चाहे जो भी रहा हो!ऑफिस की छुट्टी नहीं मिली, ट्रेन की टिकट नहीं मिली, या बस आलस कर गए!इन्हें जीवनभर इस ग्लानि से जूझना पड़ेगा कि वे 2025 के ऐतिहासिक स्नान युग का हिस्सा नहीं बन पाए!स्नानी मित्र उनसे मिलते ही ताने मारेंगे—"अरे, तुम तो अभी तक अपवित्र ही घूम रहे हो!" सरकार आगे चलकर स्नान करने वालों को प्रमाण पत्र दे सकती है, ज...

Tyagpatra by Jainendra Book Review

 त्यागपत्र: एक अंतर्मुखी पीड़ा की कहानी जैनेंद्र कुमार का उपन्यास 'त्यागपत्र' भारतीय साहित्य में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह उपन्यास मृणाल की कहानी है, जो अपने पति प्रमोद के द्वारा त्याग दी जाती है। कहानी मृणाल के अंतर्मुखी पीड़ा, सामाजिक बंधनों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संघर्ष को दर्शाती है। जैनेंद्र कुमार की लेखन शैली सरल और गहरी है। उन्होंने मृणाल के मन की उलझनों और भावनात्मक जटिलताओं को बहुत ही संवेदनशील तरीके से चित्रित किया है। कहानी में सामाजिक रूढ़ियों और व्यक्तिगत इच्छाओं के बीच का द्वंद्व स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। मृणाल का त्यागपत्र केवल एक शारीरिक त्यागपत्र नहीं है, बल्कि यह उसके आंतरिक संघर्ष और मुक्ति की खोज का प्रतीक है। उपन्यास में प्रमोद का चरित्र भी जटिल है। वह एक ऐसे व्यक्ति के रूप में दिखाया गया है जो सामाजिक दबावों और अपनी कमजोरियों के कारण मृणाल को त्याग देता है। यह उपन्यास उस समय के समाज में महिलाओं की स्थिति और उनके संघर्षों पर प्रकाश डालता है। 'त्यागपत्र' एक ऐसा उपन्यास है जो पाठक को सोचने पर मजबूर करता है। यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सामाजि...

Vivek Pangani's love story

 सालों पहले एक फिल्म आई थी बर्फ़ी.. रनबीर कपूर अभिनीत इस फिल्म में कईं सम्मोहित कर देने वाले दृश्य थे.. फिल्म की सिनेमेटोग्राफ़ी भी उल्लेखनीय थी.. फिल्म में एक दृश्य है जो मेरे मन में बार बार उभरता है, जिसे  रनबीर के अलावा तीन अलग अलग किरदारों के साथ पिक्चराइज़ किया गया था.. यह दृश्य किसी के प्रति प्रेम, निष्ठा और विश्वास को जाँचने के लिए किया गया एक किस्म का लिटमस टेस्ट है.. प्रोटेगनिस्ट बर्फ़ी यह जानना चाहता है कि क्या संसार में कोई ऐसा भी है जिसका मन उसके लिए निश्छल और निस्वार्थ प्रेम से भरा हुआ है.. यह जानने के लिए वह सबसे पहले अपने दोस्त का हाथ पकड़कर एक लकड़ी के बने लैम्प पोस्ट के नीचे खड़ा हो जाता है.. बर्फ़ी उस चरमराती हुई लकड़ी के बने लैम्प पोस्ट के कभी भी गिर जाने की बात से अनजान नहीं.. बस वह यह देखना चाहता है कि उसका दोस्त मुसीबत की घड़ी में उसका हाथ छोड़कर भाग तो नहीं जाता.. और यही होता है.. लैम्प पोस्ट के नीचे गिरने से पहले ही उसका वह दोस्त अपना हाथ छुड़वा कर पीछे हट जाता है.. फिल्म आगे बढ़ती है, दूसरी बार उसी फ्रेम में बर्फ़ी के साथ वह लड़की खड़ी है जिसे वह चाहता...