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प्रेमचंद के फटे जूते

  प्रेमचंद का एक चित्र मेरे सामने है, पत्नी के साथ फ़ोटो खिंचा रहे हैं. सिर पर किसी मोटे कपड़े की टोपी, कुरता और धोती पहने हैं. कनपटी चिपकी है, गालों की हड्डियां उभर आई हैं, पर घनी मूंछें चेहरे को भरा-भरा बतलाती हैं. पांवों में केनवस के जूते हैं, जिनके बंद बेतरतीब बंधे हैं. लापरवाही से उपयोग करने पर बंद के सिरों पर की लोहे की पतरी निकल जाती है और छेदों में बंद डालने में परेशानी होती है. तब बंद कैसे भी कस लिए जाते हैं. दाहिने पांव का जूता ठीक है, मगर बाएं जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अंगुली बाहर निकल आई है. मेरी दृष्टि इस जूते पर अटक गई है. सोचता हूं-फ़ोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी-इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है. यह जैसा है, वैसा ही फ़ोटो में खिंच जाता है. मैं चेहरे की तरफ़ देखता हूं. क्या तुम्हें मालूम है, मेरे साहित्यिक पुरखे कि तुम्हारा जूता फट गया है और अंगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हें इसका ज़रा भी अहसास नहीं है? ज़रा लज्जा, संकोच या झेंप नहीं है? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि धोती को थोड़ा न...

The Metamorphosis book review

समाज लोगों से प्यार तब तक करता है, जब तक वे उसके लिए उपयोगी रहते हैं।  

और जैसे ही कोई व्यक्ति उपयोगी होना बंद कर देता है—उसका अस्तित्व भी असहज हो जाता है।  

यही वास्तविक भयावहता है काफ्का के "द मेटामॉर्फोसिस" की।

ग्रेगर साम्सा रातों‑रात कोई राक्षस नहीं बन जाता।  

वह बस एक ऐसा इंसान बन जाता है जो अब काम नहीं कर सकता, कमाई नहीं कर सकता,  

परिवार की उम्मीदों को पूरा नहीं कर सकता,  

और समाज की उस "सामान्य" दुनिया में फिट नहीं बैठता जो हम सबको थोप देती है।  


और अचानक—  

उसका अपना कमरा छोटा लगने लगता है,  

घर की बातचीत में ठंडक घर कर जाती है,  

और वही परिवार जिसने कभी उस पर अपेक्षाएँ और निर्भरता रखी थी,  

धीरे‑धीरे उसके बिना जीना सीख जाता है।  


काफ्का हमें दिखाते हैं कि  

समाज अक्सर मानवता की कीमत नहीं,  

बस उत्पादकता की कीमत चुकता है।  

जैसे ही कोई व्यक्ति कमज़ोर होता है, बेरोज़गार होता है,  

दुखी, अलग, टूटा हुआ—  

तो वह बस एक बोझ बन जाता है।  

किसी इंसान की जगह एक “समस्या” बन जाता है।  


यह सच्चाई हम आज भी इधर‑उधर देखते हैं—  

थके हुए कामगारों में,  

जो अपना जीवन दे देते हैं पर जब थक जाते हैं तो भूल जाए जाते हैं;  

छात्रों में,  

जिन पर इतना दबाव होता है कि उनकी आत्मा तक दब जाती है;  

उन लोगों में,  

जो असफलता के समय परिवार या दोस्तों से अलग हो जाते हैं;  

और उन मौन आत्माओं में,  

जो धीरे‑धीरे गायब हो जाती हैं क्योंकि वे अब “सामान्य” चौखट में नहीं बैठतीं।  

ग्रेगर की सच्ची त्रासदी इस बात में नहीं है  

कि वह एक कीड़े में बदल गया।  

त्रासदी यह है कि उसके बाद कोई भी उसे समझने की कोशिश नहीं करता।  

उसके दर्द को सुनने की जगह, उसकी अजीबता को ढांचे से निकालने की कोशिश की जाती है।  

उसकी मानवता को नहीं, उसकी उपयोग‑क्षमता को देखा जाता है।  


शायद इसीलिए काफ्का आज भी इतने आधुनिक लगते हैं।  

क्योंकि सच में आज भी समाज का चेहरा बहुत तेज़ी से बदल जाता है,  

पर उसका दिल उतना तेज़ी से नहीं पिघलता।  


"The Metamorphosis"  

Franz Kafka

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