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Suicide Fruiting

इस साल बाज़ार में जितने जामुन दिखाई दे रहे हैं, उतने मैंने पिछले दो दशकों में कभी नहीं देखे। ​जामुन के अक्षरशः ढेर लग रहे हैं (नीचे गिर रहे हैं)। जिन पेड़ों पर पिछले साल इक्का-दुक्का फल आए थे, वे पेड़ भी इस बार जामुन से पटे पड़े हैं। जहाँ फल आए थे, वहाँ अब उन का अंबार लगना शुरू हो गया है। ​आखिर यह सब क्या चल रहा है? ​हमारी दादी/नानी हमेशा कहती थीं कि, "जिस गर्मियों में जामुन के ऐसे ढेर लगते हैं, उस साल सूखा पड़ता है।" ​बुजुर्गों का यह पारंपरिक ज्ञान वनस्पति विज्ञान (Botany) के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बिल्कुल सही और सटीक है। विज्ञान में इस दिलचस्प और उतनी ही चौंकाने वाली प्रक्रिया को "मास्टिंग" (Masting) या "स्ट्रेस फ्रूटिंग" (Stress Fruiting) कहा जाता है। ​पेड़ों द्वारा खुद को खत्म करके ज्यादा से ज्यादा फल देने के इस आखिरी प्रयास को कभी-कभी "सुसाइड फ्रूटिंग" (Suicide Fruiting) या "बंपर क्रॉप" भी कहा जाता है। ​यह असल में क्या है और इसके पीछे का विज्ञान क्या कहता है, आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं: ​१. 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट' (अस्ति...

Sachin Tendulkar the GOAT

 "हेलमेट के नीचे, उन बेतरतीब घुंघराले बालों के भीतर, खोपड़ी के अंदर, कुछ ऐसा है जिसे हम पूरी तरह से समझ नहीं पाए हैं—कुछ ऐसा जो वैज्ञानिक माप से परे है। यही वह चीज़ है जो उसे उड़ने, क्रिकेट के क्षेत्र में राज करने की शक्ति देती है, जिसे न सिर्फ हम, बल्कि वे भी, जो उसके साथ खेलने के लिए पर्याप्त प्रतिभाशाली हैं, समझने की कल्पना भी नहीं कर सकते। जब वह बल्लेबाजी के लिए उतरता है, तो लोग अपने टेलीविज़न सेट चालू कर देते हैं और पल भर के लिए अपनी ज़िंदगी बंद कर देते हैं।" - बीबीसी, सचिन तेंदुलकर पर। यह कितनी सच्ची बात है! 24 साल तक खेलना आसान नहीं होता। क्रिकेट एक पेशा है, और प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए खुद को लगातार अपग्रेड करना पड़ता है। कई लोग कहते हैं कि सचिन के रिकॉर्ड उनके खेले गए मैचों की संख्या—200 से अधिक टेस्ट मैचों—का परिणाम हैं। लेकिन क्या यह आसान है? बिल्कुल नहीं। इसके लिए शीर्ष स्तर की फिटनेस, बेहतरीन बल्लेबाजी कौशल और असाधारण एकाग्रता की जरूरत होती है ताकि 600 से अधिक अंतरराष्ट्रीय मैचों तक टिके रह सकें। मैंने कभी नहीं सुना कि सचिन किसी भी तरह की गेंदबाजी के खिलाफ कमज...

Sachin Tendulkar the God of Cricket

 सचिन के 28, 90 प्लस स्कोर हैं। जिसमे एक बार ये नोट आउट गये बाक़ी 27 बार आउट हो गये। जिसमे से साल 2007 में ये 7 बार 90 प्लस स्कोर पर आउट हुए या यूँ कहिए नर्वस 90s का शिकार हुए। इसके बावजूद इनके तीनों फ़ॉर्मेट में कुल 100 शतक हैं। और जब जब इन्होंने शतक लगाया तो 33% मैचों में इंडिया की हार हुई है  वहीं सहवाग, विराट, धोनी, शिखर धवन के कुल 11, 90 प्लस स्कोर हैं लेकिन सहवाग विराट और धोनी को कभी कोई नर्वस नाइंटीज़ का शिकार नहीं बोल सकता क्योंकि कोहली या धोनी हमेशा 70 प्लस के बाद स्ट्राइक रेट तेज कर देते हैं 90 से 100 आने के लिए कभी इनलोगो ने ज़्यादा डॉट बॉल्स नहीं खेली हैं जबकि सचिन इन दस रनों के लिए 30 चालीस बाल आराम से पी जाते थे😂 इस बारे में वीरेंद्र सहवाग का कहना था कि जो काम आप दो तीन बॉल्स में कर सकते हो उसके लिए इतनी देर तक प्रेशर में क्यों जीना। बहरहाल सचिन के शतकों का योगदान भारत की जीत में मात्र 67% मैचों में ही रहा है जबकि विराट कोहली का शतकों का योगदान 87% मैच जीत में हैं। सचिन ने अपने शतकों के चक्कर में जो तीस तीस चालीस चालीस बॉल्स ख़राब की हैं उसकी वजह से कई मैच इंडिय...