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Suicide Fruiting

इस साल बाज़ार में जितने जामुन दिखाई दे रहे हैं, उतने मैंने पिछले दो दशकों में कभी नहीं देखे। ​जामुन के अक्षरशः ढेर लग रहे हैं (नीचे गिर रहे हैं)। जिन पेड़ों पर पिछले साल इक्का-दुक्का फल आए थे, वे पेड़ भी इस बार जामुन से पटे पड़े हैं। जहाँ फल आए थे, वहाँ अब उन का अंबार लगना शुरू हो गया है। ​आखिर यह सब क्या चल रहा है? ​हमारी दादी/नानी हमेशा कहती थीं कि, "जिस गर्मियों में जामुन के ऐसे ढेर लगते हैं, उस साल सूखा पड़ता है।" ​बुजुर्गों का यह पारंपरिक ज्ञान वनस्पति विज्ञान (Botany) के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बिल्कुल सही और सटीक है। विज्ञान में इस दिलचस्प और उतनी ही चौंकाने वाली प्रक्रिया को "मास्टिंग" (Masting) या "स्ट्रेस फ्रूटिंग" (Stress Fruiting) कहा जाता है। ​पेड़ों द्वारा खुद को खत्म करके ज्यादा से ज्यादा फल देने के इस आखिरी प्रयास को कभी-कभी "सुसाइड फ्रूटिंग" (Suicide Fruiting) या "बंपर क्रॉप" भी कहा जाता है। ​यह असल में क्या है और इसके पीछे का विज्ञान क्या कहता है, आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं: ​१. 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट' (अस्ति...

क्या है ग्रीष्म नवरात्र एवं शरद नवरात्र का मुख्य अंतर| The Real Story Of Navratri|

The Real Story Of Celebrating Navratri

Devi Durga
Devi Durga

नवरात्रि शुरू हो चुके हैं। आप में से कई सारे लोगों ने। आदि शक्ति मां दुर्गा जी को पसंद करने के लिए उपवास भी रखे होंगे। लेकिन क्या आप शरद नवरात्रि एवं ग्रीष्मकालीन नवरात्रि के अंतर के बारे में जानते हैं? यदि नहीं तो हम आपके ब्लॉग में आप की यह जिज्ञासा भी पूर्ण कर देंगे। ब्लॉग को अंत तक अवश्य पढ़िएगा, क्योंकि तभी आपको यह पता लगेगा कि ग्रीष्मकालीन नवरात्र एवं शीतकालीन नवरात्र का मुख्य अंतर क्या है।

पूर्व के काल में देवताओं एवं राक्षसों के बीच महायुद्ध हुआ था। महिषासुर के पिता रंभ, समुद्र मंथन के पश्चात हुए अन्याय से देवताओं से क्रोधित थे। उन्होंने कई बार स्वर्ग पर आक्रमण किया परंतु हर बार वे परास्त ही होते रहे। कुछ समय के बाद असुर राज रंभ और उनकी पत्नी महिषी से एक बालक का जन्म हुआ। जन्म के पश्चात ही उस उस बालक की चीख से भयंकर शोर हो रहा था. ऐसा लग रहा था जैसे हजारों भैंसें एक साथ चीख रहे हो। इसीलिए उन्होंने उस बालक का नाम महिषासुर रखा इसका अर्थ होता है- जिसका स्वर महिष अर्थात भैंसे की तरह हो।
महिषासुर धीरे-धीरे बड़ा होने लगा और उसने यह जाना कैसे देवताओं ने छल से असुरों को अमृत पान करने से रोक दिया था। महिषासुर के मन में धीरे-धीरे देवताओं के प्रति क्रोध एवं घृणा बढ़ने लगी। उसने युद्ध में सदैव विजयी रहने के लिए अमृत प्राप्त करने के लिए सृष्टि निर्माता ब्रह्मा की उपासना शुरू की। 1000 वर्षों की कठिन तपस्या के बाद ब्रह्मा जी उससे प्रसन्न हुए एवं उससे वरदान मांगने को कहा। उसने परम पिता ब्रह्मा से अमर होने का वरदान मांगा। लेकिन ब्रह्मा जी ने कालचक्र एवं सृष्टि के निर्माण एवं विनाश की प्रक्रिया को समझाते हुए उसे यह वरदान देने से मना कर दिया। जिसके बदले में ब्रह्मा जी ने उसे दूसरा वरदान मांगने को कहा। इस बार महिषासुर ने ब्रह्मा जी से कहा हे परमपिता मुझे ऐसा वरदान दीजिए की युद्ध में मुझे ना कोई देवता, दानव एवं मनुष्य पराजित न कर सके| इनमें से कोई भी मेरा वध ना कर सके। जिस पर ब्रह्मा देव ने उसे वरदान दिया। ब्रह्मा जी से लगभग अमरता का वरदान प्राप्त करने के बाद महिषासुर की खुशी की सीमा न रही एवं उसने देवताओं, ऋषियों एवं मनुष्यों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया साथ ही साथ उसने स्वर्ग पर भी आक्रमण कर दिया और उसे जीत लिया। महिषासुर के आक्रमण से त्रस्त सभी देव ब्रह्मा जी के साथ श्री हरि विष्णु के पास पहुंचे एवं उनसे मदद की गुहार लगाई। इधर महिषासुर के स्वर्ग पर विजय प्राप्त करने के बाद बाकी अन्य असुर राजाओं ने उसके आगे समर्पण कर दिया एवं उसे असुर राज की उपाधि प्रदान की।
उधर श्री हरि विष्णु ने कोई उपाय ना देखते हुए सभी देवताओं के साथ कैलाश पर भगवान शिव की ओर प्रस्थान किया एवं उनसे मदद की गुहार लगाई। भगवान शिव ने अन्य सभी देवताओं से कहा परम पिता ब्रह्मा के ईश्वरदान के बाद महिषासुर को हम में से कोई भी नहीं मार सकता। यही सही समय है जब आदिशक्ति के प्रादुर्भाव के लिए हम सभी को अपनी शक्तियां एकत्रित करनी चाहिए। 
महादेव के इस सुझाव के बाद सभी देवताओं ने अपनी शक्तियों को एकत्रित किया एवं उससे एक दिव्य ज्योति का प्रादुर्भाव हुआ एवं और ज्योति से आदि शक्ति स्वरूपा प्रकट हुई। ब्रह्मदेव ने आदिशक्ति के स्वरूप को दुर्गा के नाम से संबोधित किया। सभी देवताओं ने उन्हें अपने अपने अस्त्र-शस्त्र दिए।
श्री हरि नारायण ने उन्हें सुदर्शन चक्र प्रदान किया। ब्रह्मदेव ने उन्हें कमंडल एवं अक्षमाला प्रदान की। इंद्र ने वज्र, वरुण ने शंख, चंद्रदेव ने चंद्र शोभा युक्त वस्त्र, यमराज ने काल दंड एवं गदा; अग्नि ने भाला, सूर्य देव ने धनुष बाण काल ने खड़ग, विश्वकर्मा ने अभेद ढाल, कुबेर ने स्वर्ण मुकुट एवं आभूषण। हिमालय में सिंह राज एवं स्वयं कैलाश पति ने उन्हें अपना त्रिशूल प्रदान किया।
सभी अस्त्र-शस्त्र, आभूषणों एवं वस्त्रों से युक्त होकर देवी दुर्गा ने शंख बजाकर युद्ध का आवाहन किया। एवं देवर्षि नारद आक्रमण का समाचार लेकर महिषासुर के दरबार पहुंचे।
महिषासुर को जब यह पता चला कि देवताओं की ओर से एक देवी उनसे युद्ध करने आ रही हैं; तो उसने उसे अपनी रानी बनाने का प्रस्ताव देते हुए, युद्ध के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया।
अगले दिन महिषासुर अपनी सेना को अर्धचंद्र व्यूह में लगाकर रणक्षेत्र में ले आया। उसकी सेना में चंड एवं मुंड दाहिनी ओर से युद्ध करने के लिए तैयार थे। वेसल नगरी के असुर राज धमरी सेना को बाईं ओर से नेतृत्व कर रहे थे। उद्धत, चामर, उदुग्र, वाष्पकल, ताम्र, अंधक, उग्रस्य, उग्रवीर, महाहनु, बिदाल, दुर्धर, दुर्मुख, एवं अन्य असुर महारथी उसके सेना में थे। महिषासुर की इस महा सेना का प्रधान सेनापति चिक्षुर था, जो महिषासुर के साथ ही सेना के बीच में था। 

  • इस नवरात्रि जानिए कैसे हुआ 64 योगिनी का प्रादुर्भाव

दूसरी तरफ देवी दुर्गा ने अपने तेज से भैरवी को रण क्षेत्र में निमंत्रित किया। भैरवी एवं भैरव ने अष्टमातृ एवं अष्टभैरव की रचना की। यह सभी अष्टमातृ एवं अष्ट भैरव स्वयं में एक महारथी थे। इन्हीं अष्ट मात्र एवं अष्ट भैरव से 64 योगिनी एवं 64 योग भैरों का निर्माण हुआ।
एक मातृका 8 योगिनीओं का नेतृत्व कर रही थी।

  1. देवी ब्रह्माणी के नेतृत्व में थी ज्ञानेश्वरी, दिव्य योगिनी, महायोगिनी, सिद्ध योगिनी, मालिनी, मंत्र योगिनी, कौशिकी एवं करालिनी।
  2. देवी वैष्णवी के नेतृत्व में मोहिनी, चक्री, लक्ष्मी, जूही चक्रनी, शुषकंगी एवं विरुपक्षी थी।
  3. देवी महेश्वरी के नेतृत्व में भुवनेश्वरी, क्रोधा, कालग्नि, दुर्मुखी, प्रेत भवानी, सहसरक्षी, विशाला एवं व्याघ्री थीं।
  4. देवी इंद्राणी के नेतृत्व में विकटा, दुर्जटा, घोरा, लंगली, कामूकी, यंत्रवहिनी, यक्षी एवं कुंडलाक्षी थीं।
  5. देवी कौमारी के नेतृत्व में चंडी, मारीका, चौरीका, भयंकरी, कलहप्रिया, धूम्रकाक्षी, फेटकारी, एवं उर्धाकेशी थीं।
  6. देवी वाराही के नेतृत्व में यक्षिणी कपालिनी यमुदुती, दीर्घलंबौष्ट, अजीता, दवंशिनी, रोमाझंघा एवं झनकारी थीं।
  7. देवी नरसिम्ही के नेतृत्व में मनसाभोजनी, वीरभद्राक्षी, रक्ता, घोर्रक्ताक्षी, पिशाचिनी, मुंड धारिणी, प्रेत वाहिनी एवं भक्षिणी थीं।
  8. एवं देवी चामुंडा के नेतृत्व में काली, कालरात्रि, डाकिनी, प्रेताक्षी, निशाचरी, उर्द्ववेताली, भूत यामिनी एवं खरपिरी थीं। 
Chaunsath Yogini Temple
Chaunsath Yogini Temple


ठीक इसी प्रकार 1-1 भैरव 8-8 भैरव को नेतृत्व कर रहे थे।

अन्य सभी देवगण अपने अपने स्थान पर नियुक्त थे। और इस विशाल सेना को आदिशक्ति महामाया देवी दुर्गा संचालित कर रही थी।

इस महा विशाल सेना को देखकर पहले तो महिषासुर घबरा गया फिर उसने अपने भय को छुपाते हुए व्यंग से 10 हाथों वाली देवी से कहा कि तुम्हारा स्थान तो मेरे राजप्रासाद एवं मेरे राज्य में है। तुम यह युद्ध छोड़कर मेरी सेवा में लग जाओ। अन्यथा युद्ध के बाद तुम्हें तुम्हें वैसे ही बल पूर्वक प्राप्त कर लूंगा। जब महिषासुर यह शब्द बोल रहा था तब देवी दुर्गा, वैद्य धनवंतरी द्वारा दिया गया मधुकलश पी रही थी। महिषासुर के इन शब्दों को सुनकर देवी ने कहा
गर्ज गर्ज क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्हम।
मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवता:
(दुर्गासप्तशती, तृतीय अध्याय)

"हे मूर्ख, जब तक मैं मधु पान कर रही हूं। तब तक तू दहाड़ता जा। शीघ्र ही इस स्थान पर इंद्र समेत अन्य सभी देवगण आनंदित होंगे जब मैं तेरा वध करूंगी।"

शेर पर सवार देवी दुर्गा ने पल भर में ही अपनी सेना सहित असुर सेना का संहार कर दिया। अपनी शेर सेना को मारा जाते देख, असुर सेनापति चिक्षुर, देवी दुर्गा से धनुर युद्ध करने लगा। लेकिन देवी दुर्गा ने उसके हर बाण को अपने बाण से काट डाला। फिर उसके रथ को तोड़ दिया उसकी ध्वजा को भी काट डाला। उसके धनुष को भी तोड़ दिया। धनुष बाण के युद्ध के बाद चिक्षुर, पहले तलवार से एवं उसके बाद त्रिशूल से वार करने लगा। लेकिन देवी दुर्गा ने उसके हर बार को बड़े पराक्रम से बचाया एवं उसका वध कर दिया। 
इसके बाद असुर सेना ने अपने नए सेनापति चामर के नेतृत्व में युद्ध संभाला। लेकिन देवी भैरवी ने उसका भी वध कर दिया। 
देवी दुर्गा के साथ इंद्र, वायु एवं अन्य देवता भी युद्ध का प्रहार कर रहे थे। एवं देवी दुर्गा का पूर्ण रूप से युद्ध में साथ दे रहे थे।
इस प्रकार जब महिषासुर ने देखा कि उसकी सेना का नाश हो रहा है तो उसने अपनी आसुरी माया का प्रयोग करके एक भैंस का रूप बनाया। उसके बाद वह महादेवी की सेना पर टूट पड़ा। कई सारे गणों को मार देने के बाद महिषासुर देवी दुर्गा के वाहन सिंह की ओर दौड़ा जिस पर महादेवी अति क्रोधित हो गई। देवी ने पाश फेंककर महिषासुर को बांध लिया। जिसके बाद महिषासुर ने भैसें का रूप छोड़कर शेर का रूप बना लिया। जैसे ही देवी दुर्गा ने उसका सिर काटने के लिए अपने शस्त्र उठाए वैसे ही महिषासुर अपने असली रूप में आ गया। जिसे देवी दुर्गा ने तुरंत ही धनुष बाण से भेद दिया। इसके बाद महिषासुर ने एक हाथी का रूप बनाया और उसकी सूंड  से देवी दुर्गा के शेर को अपनी तरफ खींचने लगा| लेकिन देवी दुर्गा ने अपनी तलवार से उस हाथी की सूंड काट डाली। इसके बाद महिषासुर ने फिर से 1 सूंड का रूप धारण कर लिया| और फिर से धरती पर अन्य सभी लोगों को कष्ट पहुंचाने लगा महिषासुर को निर्दोष लोगों को मारता देख, देवी दुर्गा का क्रोध सातवें आसमान पर चला गया वह तुरंत अपने शेर से कूदी और महिषासुर को अपने पैरों से दाब लिया। जैसे ही देवी दुर्गा उसके ऊपर सवार हुई वैसे ही महिषासुर अपने असली रूप में उसमें से के मुंह से बाहर आने लगा। आधा बाहर निकले के बाद भी महिषासुर अपनी खड़ग एवं ढाल से देवी दुर्गा से युद्ध करने लगा। तब देवी दुर्गा ने अपने त्रिशूल से उसकी छाती पर वार किया, एवं अपनी तलवार से उसका मस्तक काट डाला; एवं उसका वध कर दिया महिषासुर का वध होते ही युद्ध समाप्त हो गया एवं सभी देवगण एवं ऋषि गण आनंदित होकर नाचने लगे। ऋषि गण देवी दुर्गा की स्तुति में ऋचाएं गाने लगे। गंधर्व एवं अप्सराएं उनके सम्मान में नृत्य करने लगे बसंत ऋतु ने संपूर्ण भूलोक पर अपना अस्तित्व जमा लिया।
Mahishasur Mardini
Mahishasurmardini Devi Durga

यह महायुद्ध शुक्ल प्रतिपदा से शुक्ल दशमी तक चला और शुक्ल दशमी के मध्यान में देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध कर दिया। इसीलिए चैत्र मास में देवी दुर्गा की उपासना की जाती है। 9 दिनों एवं नवरात्रि तक चलने वाले इस महायुद्ध के विजई परिणाम के स्वरूप ही आदि शक्ति मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए, सभी लोग उनके सम्मान में उपवास रखते हैं और इसीलिए नवरात्रि मनाई जाती है।

    परंतु त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने रावण पर विजय प्राप्त करने हेतु अश्विन मास में देवी दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा अर्चना की एवं 9 दिनों तक विधि विधान से उपवास रखते हुए अपने लिए शक्तियों का आवाहन किया। जिससे देवी दुर्गा प्रसन्न हुई एवं उन्हें नौवें दिन आदि पराशक्ति अस्त्र प्रदान किया यह एकमात्र वह दिव्यास्त्र था, जिसे कोई अन्य अस्त्र एवं शस्त्र पराजित नहीं कर सकते थे। इसी का उपयोग करते हुए भगवान श्रीराम ने रावण की नाभि पर प्रहार किया एवं उसका वध कर दिया। वैसे तो नवरात्रि चैत्र मास में ही मनाई जाती है लेकिन श्रीराम ने शरद ऋतु में देवी दुर्गा का आवाहन किया। जिस कारण इसे अकालबोधन कहा जाता है। इसके बाद महादेवी की पूजा अश्विन मास में भी प्रारंभ हो गई। जिसे हम  शरद नवरात्रि का दुर्गा पूजा कहते हैं। 
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Suicide Fruiting

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