सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कर्म फल तो भोगना ही पड़ेगा

 महाभारत के भयंकर नरसंहार के बाद पुत्र-वियोग में तड़पती गांधारी जब श्रीकृष्ण को शाप देने के लिए आगे बढ़ती हैं, तब श्रीकृष्ण शांत स्वर में कहते हैं— माते!  मैं शोक, मोह और पीड़ा—इन सबसे परे हूँ, न मुझे विजय का गर्व है, न पराजय का विषाद, न मुझे सम्मान बाँधता है, न अपमान। न जीवन, न मृत्यु—किसी में मैं आबद्ध नहीं हूँ। मैं न सत्य में बँधा हूँ, न असत्य में.. काल और महाकाल—दोनों मेरे अधीन हैं; मैं उन्हीं के माध्यम से अपने कार्य सिद्ध कराता हूँ। हे माता, यह युद्ध अवश्यम्भावी था। जो चले गए हैं, उनके लिए विलाप मत करो। जो शेष हैं—उन्हें स्वीकारो। वर्तमान को अपनाओ, क्योंकि अतीत का शोक ही दुख का मूल है.. कृष्ण की वाणी सुनकर गांधारी विलाप करती हुई कह उठती हैं.. कृष्ण…! तुम यह सब कह सकते हो, क्योंकि तुम माँ नहीं हो। तुम क्या जानो एक माँ की ममता क्या होती है? तुम क्या समझो पुत्र-शोक की असहनीय पीड़ा? तुम मोह-त्याग और ज्ञान की बातें करते हो, तो जाओ—अपनी माता देवकी से पूछो कि पुत्र-वियोग क्या होता है! पूछना उनसे— कैसा लगता था जब कंस एक-एक कर उसके कलेजे के टुकड़े छीन लेता था.. जब उसका दूध उतरता थ...

INDIA NEEDS PLANNING TO BEAT COVID-19 SECOND WAVE कोरोना से निपटने के लिए भारत को प्लानिंग की आवश्यकता ।। A Blogpost by Abiiinabu।।

INDIA NEEDS PLANNING TO BEAT COVID-19 SECOND WAVE कोरोना से निपटने के लिए भारत को प्लानिंग की आवश्यकता 

    जब छोटा था तब से देखता आ रहा था, कभी अम्मा, कभी नानी, कभी बुआ तो कभी मम्मी को। घर में जितना भी दूध आता था वो कभी पूरा इस्तेमाल नहीं होता था।  हमेशा एक चौथाई या तिहाई हिस्सा ही पीने या चाय या अन्य कामों में लिया जाता था। बाकि का दूध बचा कर रख दिया जाता था। बचपन में तो समझ नहीं आता था ये सब, वो इसलिए कि दूध बहुत ज़्यादा पसंद नहीं था मुझे। मिडिल क्लास घर के बच्चों को दूध को पीने लायक बनाने के लिए हॉर्लिक्स या बोर्नविटा की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। उनके लिए बस मम्मी की मार या पापा की आँखें ही उस बेस्वाद दूध को पीने लायक बना देती थी। खैर ये पीने की प्रक्रिया की चर्चा फिर कभी। अभी फिलहाल, आगे की बात सुनो। हाँ तो एक बार मम्मी को काम करते देखा तो पाया कि जितना भी दूध आता है उसके ज़रूरत के हिसाब से हिस्से किये जाते हैं।  एक पीने के लिए बोले तो रॉ कंसम्पशन, एक हिस्से का पनीर या छास बन जाता है, मतलब प्राइमरी कंसम्पशन। उसके बाद एक हिस्से में तोड़ डालकर उसका दही ज़माने रख दिया जाता है। उससे पहले एक प्रक्रिया और की जाती है वो है सारे दूध को उबालना। दूध उबलने के बाद उसमे मलाई आ जाती है, उसको अलग निकाल लिया जाता है और संभाल कर रख लिया जाता है। जब कई दिनों की मलाई इकट्ठी हो जाती है तो उसको मथनी से मथ कर उसमे से माखन निकाला जाता है और उसको गरम करके घर में ही शुद्ध देसी घी बनाया जाता है। 

लेकिन भारतीय महिलाओं के इस कृत्य के पीछे कारण क्या है। मेरे हिसाब से दूध से पनीर, छास, दही, माखन और अंत में घी बनाने की प्रक्रिया में महिलाएं ये निश्चित करती हैं की दूध की पौष्टिकता कैसे लम्बे समय तक घरके सभी सदस्यों को दी जा सकती है। क्यूंकि दूध से घी बनने की प्रक्रिया के जैसे जैसे भिन्न भिन्न उत्पाद बनने लगते हैं वैसे वैसे दूध की ख़राब न होने की अवधि भी बढ़ने लगती है; जिस कारण दूध ख़राब नहीं होता और उसकी पौष्टिकता अधिक समय तक और अलग अलग स्वाद में हम सबको मिलती रहती है। साधारण सी दिखने वाली घरेलु महिलायें कितनी लम्बी प्लानिंग करके रखती हैं, ये इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।  हम सबने देखा ही होगा अपने अपने घरों में।  

    वर्तमान समय के परिप्रेक्ष्य में यदि इसको बड़े स्तर पर देखे, तो महिलाओं पर घर चलने की जिम्मेदारी होती है, और घर के प्रत्येक सदस्य के खाने पीने की ज़रूरत का ध्यान, उसको कब क्या देना है इसकी पूरी प्लांनिग वो करके रखती हैं।  ये देश भी तो एक परिवार की तरह ही है, बेशक इसकी देखभाल करने वाला चुनने के लिए हमे हर पांच साल में मौका मिलता है, तो निश्चित तौर पर ये उस व्यक्ति का दायित्व है कि  प्लानिंग कैसे करनी  है, क्या प्लानिंग करनी है? इसकी भी प्लानिंग सरकार को करनी चाहिए लेकिन देश में महामारी का यूँ फ़ैल जाना।  उसके बचाव के लिए न तो कोई प्लानिंग दिखाई पड़ी है और न पड़ रही है। लोग ऑक्सीजनOxygen Shortage blog की कमी से मर रहे हैं लेकिन अस्पतालों में क्या व्यवस्था  बनेगी इसकी भी कोई प्लानिंग नहीं। उधर बंगाल में लोग मर रहे हैं, उधर भी कोई प्लानिंग नहीं।  साधारण महिलायें जब इतनी प्लानिंग कर सकती हैं तो सरकार का तो फ़र्ज़ बनता है इस सबके प्रति जबाबदेही का।

    आचार्य चाणक्य ने कहा था कि राजधर्म कहता है कि सबसे पहले प्रजा की ज़रूरत का ध्यान रखा जाए। और अब तो गोवा हाई कोर्ट  भी ऑक्सीजन की कमी से मौत को नागरिक के लये अनुच्छेद 21 का उल्लंघन मानती है।  अब तो जाओ सरकार, अब तो प्लानिंग करो 

-Abiiinabu

आशा करता हूँ  की आपको हमारा आज का यह ब्लॉग पसंद आया होगाआप इसे शेयर कर सकते हैं और यदि इससे जुडी कोई भी बात आपकी समझ में  आई हो अथवा कोई प्रश्न हो तो हमको कमेंट में लिखना  भूलें।




Disclaimer:- This article is written only for educational and informative purposes. There is no intention to hurt anyone's feelings. This article is the original property of Abiiinabu. All data and knowledge are referred to by various books and facts. Pictures that I used are not mine, credit for those goes to their respected owners.


Follow the Author:-

Instagram :-  www.instagram.com/abiiinabu
Twitter:- www.twitter.com/aabhinavno1

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

If you have any doubt please let me know.

Best From the Author

The 2025 Knowledge Stack

  The 2025 Knowledge Stack I read 34 books in 2025. If I had to distill those thousands of pages into 4 life-changing lessons, this is what they would be. 📚👇 1. On Wealth & Wisdom: "The Almanack of Naval Ravikant" This wasn't just a book; it was a manual for the modern world. The biggest takeaway? "Specific knowledge" is your superpower. Build skills that feel like play to you but look like work to others. 2. On Strategy: "Lanka ka Yuddh" by Amish Tripathi ⚔️ A masterclass in how leadership and strategy are inseparable from ethics. It’s a reminder that how you win matters just as much as the win itself. 3. On Mindset: "The Courage to Be Disliked" 🧠 A radical lesson in emotional freedom. Most of our stress comes from trying to meet others' expectations. Real growth starts when you have the courage to be your authentic self, regardless of the "likes". 4. On Discipline: "Make Your Bed" by Admiral William H. McRaven...

Middle Class Log

यार देखिये हम मिडिल क्लास लोग हैं। जब हम गोवा नहीं जा पाते तो चुप मार के अपने गाँव चले जाते हैं! एक उमर तक ना हम ढेर आस्तिक हैं ना कम नास्तिक। कुछ कुछ मौक़ापरस्त! पीड़ा में होते हैं तो भगवान को याद करते हैं। जब सब कुछ तबाह हो जाए तो भगवान को दोष देते हैं! और जब मनोकामना पूरी हो जाए तो भगवान को किनारे कर देते हैं। हम नेताओं को गरियाते हैं! और एक्टरों को पूजते हैं। हम अपने नेता चुनते हैं पर उनसे सवाल नहीं कर पाते। उनको ना कोस के ख़ुद को कोसते हैं। अमिताभ और सचिन हमारे भगवान होते हैं। हमको अटल बिहारी बाजपेयी, सुष्मा जी और मोदीजी के अलावा कोई और नेता लीडर लगता ही नहीं!  हम वो हैं जो कभी कभी फटे दूध की चाय बना लेते हैं। एक ईयर फ़ोन में दोस्त के साथ रेडियो पे नग़मे सुन लेते हैं। गरमी हो या बारिश हमें विंडो सीट ही चाहिए होती है। १५ ₹/किलो आलू जब हम मोलभाव करके १३ में और धनिया फ़्री मे लेके घर लौटते हैं तो सीना थोड़ा चौड़ा कर लेते हैं। हम कभी कभी फ़ेरी वाला समान अनायास ही ख़रीद लेते हैं। हम पैसे उड़ाते तो हैं पर हिसाब दिमाग़ में रखते हुए चलते हैं। हम दिया उधार जल्दी वापस नहीं माँग पाते ना ...