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Suicide Fruiting

इस साल बाज़ार में जितने जामुन दिखाई दे रहे हैं, उतने मैंने पिछले दो दशकों में कभी नहीं देखे। ​जामुन के अक्षरशः ढेर लग रहे हैं (नीचे गिर रहे हैं)। जिन पेड़ों पर पिछले साल इक्का-दुक्का फल आए थे, वे पेड़ भी इस बार जामुन से पटे पड़े हैं। जहाँ फल आए थे, वहाँ अब उन का अंबार लगना शुरू हो गया है। ​आखिर यह सब क्या चल रहा है? ​हमारी दादी/नानी हमेशा कहती थीं कि, "जिस गर्मियों में जामुन के ऐसे ढेर लगते हैं, उस साल सूखा पड़ता है।" ​बुजुर्गों का यह पारंपरिक ज्ञान वनस्पति विज्ञान (Botany) के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बिल्कुल सही और सटीक है। विज्ञान में इस दिलचस्प और उतनी ही चौंकाने वाली प्रक्रिया को "मास्टिंग" (Masting) या "स्ट्रेस फ्रूटिंग" (Stress Fruiting) कहा जाता है। ​पेड़ों द्वारा खुद को खत्म करके ज्यादा से ज्यादा फल देने के इस आखिरी प्रयास को कभी-कभी "सुसाइड फ्रूटिंग" (Suicide Fruiting) या "बंपर क्रॉप" भी कहा जाता है। ​यह असल में क्या है और इसके पीछे का विज्ञान क्या कहता है, आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं: ​१. 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट' (अस्ति...

Oxygen Shortage पहले से पता था क्या होने वाला है || blog by Abiiinabu||

Oxygen Shortage is now common in India, Oxygen Shortage पहले से पता था क्या होने वाला है?

    अगस्त 2017 की बात है, उत्तर प्रदेश के गोरखपुर  में एक सरकारी सहायता प्राप्त अस्पताल में अचानक 63 बच्चों की मौत की खबर सुनकर हाहाकार मच गया।  कारण था BRD हॉस्पिटल  में ऑक्सीजन सिलिंडर की कमी। अस्पताल की सेंट्रल ऑक्सीजन पाइपलाइन सप्लाई में भी 2 घंटे की ऑक्सीजन की मात्रा का अलार्म बजने लगा और उसी के साथ बजने लगी डॉक्टरों को बच्चों को बचाने की उम्मीद।  BRD हॉस्पिटल के स्टाफ को और सरकार दोनों को बार बार अपना बकाया चुकाने के लिए रिमाइंडर के तौर पर लेटर लिखे जा रहे थे। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने, और न अस्पताल प्रशाशन ने किसी भी पत्र का जवाब दिया।  जिससे हार कर अस्पताल को ऑक्सीजन उपलब्ध करने वाली कंपनी ने ऑक्सीजन की सप्लाई बंद कर दी। 10 अगस्त की सुबह ऑक्सीजन ख़तम का अलार्म बजने के साथ, बच्चों की मौत का तांडव शुरू हो गया। इधर इन सब से बेखबर बाकी लोग दिमागी बुखार से ग्रस्त बच्चों को भर्ती करवाने के लिए उनके माता पिता आ रहे थे।  अस्पताल में भीड़ बढ़ रही थी, और पहले से भर्ती बच्चों की हालत बिगड़ रही थी।  उसी समय बहुत थोड़े से समय अंतराल में 33 बच्चों की ऑक्सीजन न होने की वजह से मौत हो गई और उसके 48 घंटे के अंदर 30 बच्चों की जान और चली गई।  

हॉस्पिटल के सीनियर पेडिअट्रिशन Dr. Kafeel Khan ने अपने 16 जूनियर डॉक्टरों के साथ मिल कर अपने पैसे से 500 ऑक्सीजन सिलिंडर का जुगाड़ कर लिए और बहुत से बच्चों की जान बचा ली। उसके बाद 13 अगस्त की सुबह ऑक्सीजन सेवा बहाल हुई और मौत का ये सिलसिला थमा।  जब मीडिया को ये खबर पता चली तो उन्होंने डॉक्टर कफील खान को हीरो की तरह सम्मान दिया और सिस्टम की खामियों के बारे में लिखना शुरू कर दिया और इसी कारण मामले ने तूल पकड़ लिया।  सिस्टम की अनदेखी की वजह से ये हादसा हुआ था और सरकारी अस्पताल होने की वजह से इसकी जिम्मेदारी प्रदेश सरकार की थी लेकिन सरकार ने अपनी खामियों को छुपाने के लिए एक बलि के बकरे की तरह डॉक्टर कफील खान को पेश किया और इन मौतों का ठीकरा उन्ही के सर फोड़ दिया।  22 अगस्त को बैठे गई जांच रिपोर्ट में डॉक्टर कफील खान को 9 अन्य सहयोगियों के साथ सस्पेंड कर दिया गया और उनको अरेस्ट कर लिया।  हॉस्पिटल हेड डॉक्टर आर के मिश्रा को भी गिरफ्तार किया जाता है।  रिपोर्ट देने के लिए ढाई साल का समय लगा दिया। 



लेकिन आज मैं आपको ये क्यों बता रहा हूँ ? ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहे उत्तर प्रदेश प्रशाशन को उसकी कमियां दिखाने के जुर्म में, एक सच में मदद करने वाले इंसान को फसाया गया , एक बाप से उसकी बच्ची का बचपन देखने का हसीं सपना छीन लिया गया।  क्यों , क्यूंकि उन्होंने इस सिस्टम से लड़ने की उसको उसकी कमियां दिखाने की उसकाा आइना दिखाने की जुर्रत की थी। हमारे देश में जब तक कोई हादसा बहुत बड़ा न हो जाये तब तक वो हादसा माना ही नहीं जाता।  उसको मजाक बना कर रख दिया जाता है।  अगर उत्तर प्रदेश सरकार या केंद्र सरकार दोनों में से किसी ने भी इस हादसे से सबक लिया होता तो आज कोरोना की वजह से ऑक्सीजन लेवल कम होने की वजह से जो लोग मर रहे हैं उनमे से बहुतों की जान बचाई जा सकती थी। 

इस देश में नेता मरते लोगो तक को नहीं छोड़ते, अभी हाल ही में मेरी पहचान की एक महिला की माता जी का इसी वजह से निधन हो गया। ऑक्सीजन सिलिंडर के लिए बोला तो अस्पताल से जवाब मिला की अगर किसी नेता से जान पेहचान हो तो मिल सकती है। मुझे यह समझ नही  आया अगर जान पहचान से ही इलाज हो रहे हैं तो ये सब ढकोसले क्यों किये जा रहे हैं, साफ़ साफ़ बोर्ड पर लिख क्यों नहीं देते की हमारे यहाँ बस जान पहचान वालों का इलाज किया जाता है।  इसके बाद दूसरा पहल यह है कि एक मरीज जिसका ऑक्सीजन लेवल 58 तक आ गया है उसके परिवार वाले तो उसको बचने के लिए तो कुछ भी करेंगे न, तो उन लोगों ने भी किया एक लोकल नेता से पहचान निकाली और उसको समस्या बताई तो नेताजी का जवाब सुनिए।  नेताजी कहिन कि अस्पताल में कुछ भी होना मुश्किल है आप उन को घर ले जाओ और योग करवाओ।  अब यदि नेताजी के घर का कोई ऐसी स्थितिओं में होता तो नेताजी अपना पराक्रम दिखाते या उसको योग करवाते?

आज उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में ऑक्सीजन सिलिंडर को लेकर जो स्थिति है वो सुधर सकती थी अगर हमने डॉक्टर कफील अहमद को सीरियसली लिया होता तो।  लेकिन हमको तो सच्चाई दिखाने वाले कि जात देखनी है, उसका मज़हब देखना है।  मुझे याद है जब बच्चे मरे तो कैसे उस डॉक्टर को मज़हबी जिहादी बताया गया कैसे उसकी ड्यूटी करने के लिए उसको जेल में डाला गया ।  अब भी समय है, बाहर लहर चल रही है इंसानियत को बचाने की, अगर नहीं तैर सके तो डूब जायेंगे।  हर चीज़ में मजहब ढूंढ़ना बंद करो, इंसानियत से बड़ा कोई मजहब नहीं ये कब समझोगे।  

इस जुल्म की दुनिया में जुबां खोलेगा कौन ? 
अगर हम भी चुप रहेंगे तो बोलेगा कौन?

-Abiiinabu




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Not demonic, just introverted! आसुरी नहीं, अंतर्मुखी!

मैं 27 मूल नक्षत्रों, शनिवार और 22 तारीख को जन्मा व्यक्ति हूँ — एक ऐसा जन्म‑संयोग जो न सिर्फ़ मेरी तिथि बताता है, बल्कि मेरे भीतर की गहराई, द्वंद्व और अस्थिरता का भी संकेत देता है। राहु के प्रबल और दूरदर्शी प्रभाव ने मेरे व्यक्तित्व को सीधे, सरल और सतही नहीं रहने दिया; मैं विचारों की उस गहरी खाई में अक्सर भटक जाता हूँ, जहाँ हर बात बस बाहरी रूप नहीं, बल्कि भीतरी अर्थ भी धरती होता है। मैं हर निर्णय के पीछे छिपे संभावित नतीजों, अनजाने खतरों और छिपी हुई उम्मीदों को भी देखने का आदी हूँ।   कभी‑कभी लोग मेरे कार्यों, अभिव्यक्ति और निर्णयों को असामान्य, अत्यंत गहन या यहाँ तक कि “आसुरी” समझने लगते हैं, क्योंकि मेरी सोच उनकी सामान्य धारणाओं की रेखाओं से बाहर निकल जाती है। पर यह आसुरी नहीं, बस एक टूटी हुई, खुरदरी और अत्यंत ईमानदार आत्मा की आवाज़ है, जो दिखावे की दुनिया से थक चुकी है और अपने सच्चे रूप में जीना चाहती है। मैं जब भी बोलता हूँ, तो बस शब्द नहीं बोलता, बल्कि उसके पीछे समा दर्द, संघर्ष, अनुभव और उम्मीदों को भी लाता हूँ।   मेरी पहचान में ग्रहों का भी बड़ा हाथ है। जब ग्रह ही वही है...

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Ten Dikpalas of Hindu Religion

 The 10 Dikpàlas (deities presiding over the ten directions) in Sanatan Dharm 1. Kubera - Guardian of the North Direction 2.Yamraj - Guardian of the South Direction 3. Indra - Guardian of the East Direction 4. Varuna - Guardian of the West Direction 5.Agni -Guardian of the South-East Direction 6.Nirrti - Guardian of the South-West Direction 7. Vàyu - Guardian of the North-West Direction 8. Īśāna - Guardian of the North East Direction 9. Bhagwan Brahmà - Guardian of the Zenith (Highest point in the celestial sphere) 10. Sesa - Guardian of the Nadir (The point in the celestial sphere which is directly opposite the zenith)

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