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Madness for Iphone

​ *आखिर जा कहां रहा है हमारा समाज..* महाराष्ट्र के निम्न मध्यम वर्गीय मां-बाप ने अपनी इकलौती संतान को जैसे-तैसे पाल पोसकर 18 साल का किया। अब उस बेटे को आईफोन की सनक जग गई, पहाड़ के किनारे खड़े होकर 3 घंटे का फुल वोल्टेज ड्रामा चला। संभवतः सभी को लगा होगा कि ड्रामा कर रहा है, इसी बीच बाप सामने आया, शायद उसे अपने भावनात्मक और शारीरिक बल पर भरोसा रहा होगा, कि या तो मैं अपने बेटे को प्यार/डांट से मना/धमका लूंगा, नहीं तो ताकत का प्रयोग करके उसे किनारे से खींच लाऊंगा। बाप का दांव गलत साबित हुआ, बेटा उसकी उम्मीद से ज्यादा भावनात्मक रूप से ढीट और बलशाली था, खींचा-तानी में बेटे का बैलेंस बिगड़ा, गिरते बेटे ने वही किया जो वो पिछले 18 साल से करता आ रहा था, (बाप का सपोर्ट लेना), और उसने सपोर्ट लेने के चक्कर में अपने साथ बाप को भी खाई में खींच लिया। मां जो पहले ही बेटे को मनाने के लिए अपना मंगलसूत्र देने की पेशकश कर रही थी, इस दृश्य को देखकर कुछ समझ नहीं सकी, और बदहवासी में 1-2 सेकंड बाद उसने भी खाई में जंप लगा दी। पूरा परिवार एक आईफोन की सनक में कॉल के ग्रास में चले गए।। गलती किसकी है: 1. आईफोन के...

Oxygen Shortage पहले से पता था क्या होने वाला है || blog by Abiiinabu||

Oxygen Shortage is now common in India, Oxygen Shortage पहले से पता था क्या होने वाला है?

    अगस्त 2017 की बात है, उत्तर प्रदेश के गोरखपुर  में एक सरकारी सहायता प्राप्त अस्पताल में अचानक 63 बच्चों की मौत की खबर सुनकर हाहाकार मच गया।  कारण था BRD हॉस्पिटल  में ऑक्सीजन सिलिंडर की कमी। अस्पताल की सेंट्रल ऑक्सीजन पाइपलाइन सप्लाई में भी 2 घंटे की ऑक्सीजन की मात्रा का अलार्म बजने लगा और उसी के साथ बजने लगी डॉक्टरों को बच्चों को बचाने की उम्मीद।  BRD हॉस्पिटल के स्टाफ को और सरकार दोनों को बार बार अपना बकाया चुकाने के लिए रिमाइंडर के तौर पर लेटर लिखे जा रहे थे। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने, और न अस्पताल प्रशाशन ने किसी भी पत्र का जवाब दिया।  जिससे हार कर अस्पताल को ऑक्सीजन उपलब्ध करने वाली कंपनी ने ऑक्सीजन की सप्लाई बंद कर दी। 10 अगस्त की सुबह ऑक्सीजन ख़तम का अलार्म बजने के साथ, बच्चों की मौत का तांडव शुरू हो गया। इधर इन सब से बेखबर बाकी लोग दिमागी बुखार से ग्रस्त बच्चों को भर्ती करवाने के लिए उनके माता पिता आ रहे थे।  अस्पताल में भीड़ बढ़ रही थी, और पहले से भर्ती बच्चों की हालत बिगड़ रही थी।  उसी समय बहुत थोड़े से समय अंतराल में 33 बच्चों की ऑक्सीजन न होने की वजह से मौत हो गई और उसके 48 घंटे के अंदर 30 बच्चों की जान और चली गई।  

हॉस्पिटल के सीनियर पेडिअट्रिशन Dr. Kafeel Khan ने अपने 16 जूनियर डॉक्टरों के साथ मिल कर अपने पैसे से 500 ऑक्सीजन सिलिंडर का जुगाड़ कर लिए और बहुत से बच्चों की जान बचा ली। उसके बाद 13 अगस्त की सुबह ऑक्सीजन सेवा बहाल हुई और मौत का ये सिलसिला थमा।  जब मीडिया को ये खबर पता चली तो उन्होंने डॉक्टर कफील खान को हीरो की तरह सम्मान दिया और सिस्टम की खामियों के बारे में लिखना शुरू कर दिया और इसी कारण मामले ने तूल पकड़ लिया।  सिस्टम की अनदेखी की वजह से ये हादसा हुआ था और सरकारी अस्पताल होने की वजह से इसकी जिम्मेदारी प्रदेश सरकार की थी लेकिन सरकार ने अपनी खामियों को छुपाने के लिए एक बलि के बकरे की तरह डॉक्टर कफील खान को पेश किया और इन मौतों का ठीकरा उन्ही के सर फोड़ दिया।  22 अगस्त को बैठे गई जांच रिपोर्ट में डॉक्टर कफील खान को 9 अन्य सहयोगियों के साथ सस्पेंड कर दिया गया और उनको अरेस्ट कर लिया।  हॉस्पिटल हेड डॉक्टर आर के मिश्रा को भी गिरफ्तार किया जाता है।  रिपोर्ट देने के लिए ढाई साल का समय लगा दिया। 



लेकिन आज मैं आपको ये क्यों बता रहा हूँ ? ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहे उत्तर प्रदेश प्रशाशन को उसकी कमियां दिखाने के जुर्म में, एक सच में मदद करने वाले इंसान को फसाया गया , एक बाप से उसकी बच्ची का बचपन देखने का हसीं सपना छीन लिया गया।  क्यों , क्यूंकि उन्होंने इस सिस्टम से लड़ने की उसको उसकी कमियां दिखाने की उसकाा आइना दिखाने की जुर्रत की थी। हमारे देश में जब तक कोई हादसा बहुत बड़ा न हो जाये तब तक वो हादसा माना ही नहीं जाता।  उसको मजाक बना कर रख दिया जाता है।  अगर उत्तर प्रदेश सरकार या केंद्र सरकार दोनों में से किसी ने भी इस हादसे से सबक लिया होता तो आज कोरोना की वजह से ऑक्सीजन लेवल कम होने की वजह से जो लोग मर रहे हैं उनमे से बहुतों की जान बचाई जा सकती थी। 

इस देश में नेता मरते लोगो तक को नहीं छोड़ते, अभी हाल ही में मेरी पहचान की एक महिला की माता जी का इसी वजह से निधन हो गया। ऑक्सीजन सिलिंडर के लिए बोला तो अस्पताल से जवाब मिला की अगर किसी नेता से जान पेहचान हो तो मिल सकती है। मुझे यह समझ नही  आया अगर जान पहचान से ही इलाज हो रहे हैं तो ये सब ढकोसले क्यों किये जा रहे हैं, साफ़ साफ़ बोर्ड पर लिख क्यों नहीं देते की हमारे यहाँ बस जान पहचान वालों का इलाज किया जाता है।  इसके बाद दूसरा पहल यह है कि एक मरीज जिसका ऑक्सीजन लेवल 58 तक आ गया है उसके परिवार वाले तो उसको बचने के लिए तो कुछ भी करेंगे न, तो उन लोगों ने भी किया एक लोकल नेता से पहचान निकाली और उसको समस्या बताई तो नेताजी का जवाब सुनिए।  नेताजी कहिन कि अस्पताल में कुछ भी होना मुश्किल है आप उन को घर ले जाओ और योग करवाओ।  अब यदि नेताजी के घर का कोई ऐसी स्थितिओं में होता तो नेताजी अपना पराक्रम दिखाते या उसको योग करवाते?

आज उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में ऑक्सीजन सिलिंडर को लेकर जो स्थिति है वो सुधर सकती थी अगर हमने डॉक्टर कफील अहमद को सीरियसली लिया होता तो।  लेकिन हमको तो सच्चाई दिखाने वाले कि जात देखनी है, उसका मज़हब देखना है।  मुझे याद है जब बच्चे मरे तो कैसे उस डॉक्टर को मज़हबी जिहादी बताया गया कैसे उसकी ड्यूटी करने के लिए उसको जेल में डाला गया ।  अब भी समय है, बाहर लहर चल रही है इंसानियत को बचाने की, अगर नहीं तैर सके तो डूब जायेंगे।  हर चीज़ में मजहब ढूंढ़ना बंद करो, इंसानियत से बड़ा कोई मजहब नहीं ये कब समझोगे।  

इस जुल्म की दुनिया में जुबां खोलेगा कौन ? 
अगर हम भी चुप रहेंगे तो बोलेगा कौन?

-Abiiinabu




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