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The Metamorphosis book review

समाज लोगों से प्यार तब तक करता है, जब तक वे उसके लिए उपयोगी रहते हैं।   और जैसे ही कोई व्यक्ति उपयोगी होना बंद कर देता है—उसका अस्तित्व भी असहज हो जाता है।   यही वास्तविक भयावहता है काफ्का के "द मेटामॉर्फोसिस" की। ग्रेगर साम्सा रातों‑रात कोई राक्षस नहीं बन जाता।   वह बस एक ऐसा इंसान बन जाता है जो अब काम नहीं कर सकता, कमाई नहीं कर सकता,   परिवार की उम्मीदों को पूरा नहीं कर सकता,   और समाज की उस "सामान्य" दुनिया में फिट नहीं बैठता जो हम सबको थोप देती है।   और अचानक—   उसका अपना कमरा छोटा लगने लगता है,   घर की बातचीत में ठंडक घर कर जाती है,   और वही परिवार जिसने कभी उस पर अपेक्षाएँ और निर्भरता रखी थी,   धीरे‑धीरे उसके बिना जीना सीख जाता है।   काफ्का हमें दिखाते हैं कि   समाज अक्सर मानवता की कीमत नहीं,   बस उत्पादकता की कीमत चुकता है।   जैसे ही कोई व्यक्ति कमज़ोर होता है, बेरोज़गार होता है,   दुखी, अलग, टूटा हुआ—   तो वह बस एक बोझ बन जाता है।   किसी इंसान की जगह एक “समस्या” बन जाता है।   यह सच्चाई हम आ...

कन्यादान या कन्यामान ? Alia Bhatt Controversy from Mohey Ad | A blogpost by Abiiinabu

कन्यादान या कन्यामान ? Alia Bhatt Controversy from Mohey Ad | A blogpost by Abiiinabu

अभी हाल ही में हमने बहुत ही कंट्रोवर्शियल ऐड मोहे की तरफ से देखा, जिसमें भारतीय बॉलीवुड अभिनेत्री आलिया भट्ट ट्रेडिशनल हिंदू वैल्यूस को टारगेट करते हुए उनको गलत तरीके से प्रदर्शित कर रही है। मोहे की तरफ से चलाए गए इस एक प्रोग्राम में भारतीय संस्कृति की कन्यादान परंपरा को गलत तरीके से पेश करती हुई नजर आ रही है। तो आज की इस पोस्ट में हम उस गलत एड की विवेचना और कन्यादान का सही मतलब आपको बताएंगे।

        हिंदू धर्म में कन्यादान एक बहुत ही महत्वपूर्ण विवाह अनुष्ठान है। यह हजारों बलिदान के बराबर सबसे बड़ा पुण्य के रूप में माना जाता है. यही कारण है कि वे लोग, जिनकी स्वयं की कोई कन्या (पुत्री) नहीं होती, इस पुण्य को प्राप्त करने के लिए दूसरों की बेटियों का कन्यादान करके इस पुण्य को प्राप्त करते हैं। इस वैवाहिक अनुष्ठान की हिन्दू संस्कृति में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। 

        लेकिन पिछले कुछ महीनों से विभिन्न प्रकार की गलत धारणाएं, गलत जानकारियां, इस कन्यादान शब्द को लेकर; सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही है। ।वे लोग जो इस प्रकार की भ्रामक जानकारी प्रसारित कर रहे हैं।दुर्भाग्य से भारतीय समाज उन्हें लिबरल- बुद्धिजीवी कहता है।सबसे बड़ी समस्या यही है कि वे लोग जिन्हें सही जानकारी देने की जिम्मेदारी है। अपने ज़मीर की परवाह न करते हुए चंद रुपयों की खातिर अपनी संस्कृति के साथ बद से बदतर व्यवहार किए जा रहे हैं। ये वही लोग हैं जिन्हें लगभग हर चीज़ मेंकोई न कोई समस्या उत्पन्न होती रहती है। 

        हिन्दू धर्म के कुछ ठेकेदार केवल अपने अभिमान को सत्य साबित करने हेतु। अपने ही धर्म पर आपत्तिजनक टिप्पणी करके अपना एवं अपने धर्म विशेष का उपहास बनाते जा रहे हैं। वही लोग हैं, जिन्हें न तो शस्त्र का पूर्ण ज्ञान है एवं ना विवेक का अनुभव।आज की इस पोस्ट में हम कन्यादान से जुड़े हुए कुछ गंभीर मुद्दों को आपके सामने उजागर करेंगे, एवं उनका संतुष्टिपूर्वक उत्तर देंगे। 

  • यदि कन्या को दान देते हैं तो क्या कन्या एक भौतिक वस्तु है?

सबसे पहली बात तो यह कि कन्यादान एक संस्कृत भाषा का शब्द है। जिसका अंग्रेजी और हिंदी दोनों ही भाषाओं में समानार्थी शब्द उपलब्ध नहीं है। इसका मतलब हुआ कि कन्यादान का सही अर्थ ना तो अंग्रेजी में और ना ही हिंदी में बताया जा सकता है। इसके लिए आपको संस्कृत भाषा की व्याकरण एवं उसका ज्ञान होना आवश्यक है। तभी आप कन्यादान का सही मतलब जान सकेंगे और इसको जानने के लिए आप संस्कृत हिंदी शब्दकोश या संस्कृत से हिंदी की डिक्शनरी को उठाकर देखेंगे तो वहां पाएंगे कि धन का क्या मतलब होता है उसमें कन्या को धन बोला गया है तो उस धन का क्या मतलब होता है। 
        संस्कृत भाषा में धन के कई अर्थ है जिसमें पहला अर्थ भौतिक वस्तुओं से है इसमें रुपया, पैसा, दौलत, संपत्ति, स्वर्ण, चांदी आदि विभिन्न प्रकार की वस्तुएं आती है। वहीं धन का दूसरा अर्थ यह भी है कि जिस चीज का सम्मान किया जाए या जो चीज अत्यधिक प्रिय हो उसे भी संस्कृत में धन बोला गया है। जैसे विद्याधन, प्राणधन, ईश्वर का नाम इत्यादि। यानी कि हर वो चीज जो हमें अपनी जान से ज्यादा प्यारी हो उसे धन कहा जा सकता है। इस शब्दकोश की देखें तो हम पाएंगे कि कन्या को धन इसलिए कहा गया है और कन्या को प्राण से भी अधिक प्रिय बताया गया है। और जो वस्तु या जो चीज प्राणों से अधिक प्रिय होती है उसे धन की संज्ञा दी जा सकती है। संस्कृत में कई श्लोक हैं, कई सूक्तियां है जो इस धन की अर्थ को सार्थक करते हैं जैसे विद्या धनम् सर्व धनम प्रधानम, जब आवे संतोष धन सब धन धूरि समान। धन को अर्थ देते हुए मेवाड़ की कुलवधू मीराबाई ने बड़ी ही लोकप्रिय पंक्तियां कहीं उन्होंने कहा पायोजी मैंने राम रतन धन पायो, यहां पर राम रतन को धन की उपमा दी गई है, क्योंकि मीराबाई को श्रीकृष्ण अपने जान से भी अधिक प्रिय थे इसीलिए उन्होंने उन्हें धन की उपमा दी यदि वे कोई भौतिक वस्तु की तरह प्राप्त करना क्यों चाहेंगी, जबकि उनके पास संपत्ति की कोई सीमा नहीं थी। वह एक राजघराने की कुलवधू थी। उन्होंने धन को सही अर्थ देते हुए भी अपनी बात कही। 
        तो कन्यादान में दान किसी निर्जीव वस्तु का नहीं बल्कि अपनी जान से अधिक किसी सजीव प्राणी का हो रहा है। दान केवल निर्जीव वस्तुओं का ही नहीं बल्कि अत्याधिक सम्माननीय वस्तुओं का भी किया जाता है।  हिंदू धर्म में गाय को माता कहा गया है और इसीलिए वह हिंदुओं को अपनी जान से भी अधिक प्यारी है जिस कारण प्राय: गोदान जैसे शब्द भी सुनने को मिलते हैं जिसका अर्थ गाय को अपमानित करना नहीं बल्कि उसे सम्मान के साथ विदा देना है। गाय का दान गोदान कहलाता है, जीवन का दान जीवन दान कहलाता है, इसे प्राण दान भी कहते हैं। भारतीय संस्कृति में विद्या को भी सम्मान के साथ हस्तांतरित किया जाता है इसीलिए विद्या प्रदान करने को विद्यादान कहते हैं जो गुरु अपने शिष्य को करता है। 


        सतयुग में जब भगवान विष्णु ने असुर राज बली से तीन पग भूमि मांगी थी तब असुर राज ने उन्हें हावी देते हुए भूदान दिया था लेकिन भगवान ने अपनी लीला दिखाते हुए एक पग में संपूर्ण स्वर्ग लोक, दूसरे पग में संपूर्ण पृथ्वी लोक मांग लिया। तब वामन अवतार ने राजा बलि से पूछा कि हे राजन मैं तीसरा पग कहां रखूं? तब राजा ने अपना सिर आगे करते हुए कहा हे ब्राह्मण! अपना तीसरा पैर मेरे सर पर रखिए। राजा बलि की इस दान शीलता को देखकर भगवान विष्णु बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें साल में एक बार अपने राज्य में आने की अनुमति दी। राजा बलि वर्ष में एक बार ओणम के समय अपने राज्य में आते हैं और बली की इस दान शीलता के कारण ही बलिदान शब्द अस्तित्व में आया जिसका अर्थ होता है सर्वोच्च समर्पण इसीलिए कोई भी सैनिक जब युद्ध में मारा जाता है तो यह कहा जाता है कि उसने अपने प्राणों का बलिदान दिया है। 

  • क्या जैसे कन्यादान होता है; वैसे ही पुत्र दान का भी विधान है?

महाभारत के आदि पर्व में, यह कहा गया है की पुत्र दान और स्वयं का दान सबसे कठिन है इसीलिए पुत्र दान का प्रावधान भी भारतीय संस्कृति में देखने को मिलता है। 
1857 में, रानी लक्ष्मीबाई प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अपने दत्तक पुत्र को पीठ पर बांधकर युद्ध में उतरी थीं। दत्तक का अर्थ होता है दान में पाया हुआ। 
        कन्यादान देते समय कन्या के माता-पिता को वरुण देव, स्वयं कन्या को आदित्य, वर को विष्णु का अवतार माना जाता है। 

  • कन्यादान नहीं कन्यामान कहिए?

    कन्यादान किसी लड़की को अपमानित करने के लिए कदापि नहीं है बल्कि पुरातन संस्कृति में वैवाहिक अनुष्ठान के समय कन्या की सहमति के बिना उसका विवाह नहीं हो सकता था। इसीलिए पुराने समय में कन्या का विवाह कराने के लिए स्वयंवर आयोजित कराने पड़ते थे। क्योंकि उस समय के राजा अपनी पुत्री को अपने प्राणों से अधिक एवं अति महत्वपूर्ण वस्तु समझते थे। वे उसका सम्मान करते थे, और यही चाहते थे की वहीं पुरुष उनकी लड़की के साथ विवाह करें जो सभी तरीकों से उपयुक्त हो, और ऐसा करने के लिए वह  एक विशेष प्रकार की परीक्षा लेते थे जिसे स्वयंवर की परीक्षा कहा जाता था, जिसमें राजकुमारों एवं अन्य स्वयंवर में भाग लेने आए प्रतिभागियों के साथ विभिन्न प्रकार की चुनौतियां रखी जाती थी। जिसमें उनका बाहुबल एवं बौद्धिक क्षमता परिलक्षित होती थी। 
सतयुग में सावित्री को सत्यवान से प्रेम हो गया था। और सावित्री की इच्छा का मान रखते हुए उसके पिता ने ना चाहते हुए भी सावित्री का विवाह सत्यवान से करवा दिया। यदि वे सावित्री का सम्मान ना करते होते तो सावित्री का विवाह उसकी मर्जी से क्यों ही करवाते? राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता का विवाह स्वयंवर के माध्यम से करवाया था जिसमें प्रतिभागियों के धनुर्विद्या का प्रदर्शन था जिसे भगवान श्रीराम ने उत्तीर्ण करके ही माता सीता का वर्ण किया था। नल दमयंती की कथा में दमयंती ने अनेकानेक सुंदर राजकुमारों को छोड़कर नल के गले में वरमाला पहनाई क्योंकि वह उसी से विवाह करना चाहती थी। द्वापर युग में द्रोपदी ने करण को स्वयंवर में प्रतिभाग करने से मना कर दिया था यह उस समय की नारी ही स्वतंत्रता एवं उसके मान का बोध कराती है। कलयुग में कालिदास का विवाह विद्योत्तमा नामक स्त्री से बौद्धिक शास्त्रार्थ में उसको पराजित करके किया था। इसी प्रकार घटोत्कच ने बौद्धिक एवं शारीरिक दोनों बलों का परिचय देते हुए अहिलावती से विवाह रचाया था। उपरोक्त सारे उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाता है की वैवाहिक अनुष्ठान में लड़की की मर्जी अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है। और उसी की मर्जी से उसका विवाह पूरा होता है। इसलिए कन्यादान किसी लड़की के अपमान का विषय नहीं है अपितु उसके सम्मान का ही विषय है।

  • क्या कन्यादान शब्द वेदों और पुराण में नहीं आता है? क्या ये सब गलत है? और क्या इस को परिष्कृत कर देना चाहिए? 

    सबसे पहले तो यह जान लिया जाए कि संपूर्ण विवाह कर्म मीमांसक एक स्मार्त कर्म है, ना कि श्रोत। स्मार्त कर्म वे होते हैं, जिनका वर्णन गृहसूत्र में आता है। जैसे प्रतिदान प्रतिग्रहण इत्यादि। मध्यानदिन शतपथ के द्वारा सुकन्या का वर्णन मिलता है।जो कुछ इस प्रकार है- जब तक मेरे पति जीवित रहते हैं, तब तक मैं उनके साथ रहूंगी। वो मेरे पिता ही चुनेंगे। कन्यादान शब्द का वर्णन मनुस्मृति में भी आता है आता यह बात सिद्ध हो जाती है की कन्यादान कोई मध्य भारत में शुरू हुई प्रथा नहीं है अपितु प्राचीन सनातन धर्म मैं चली आ रही एक गौरवपूर्ण अनुष्ठान है जो विवाह के समय किया जाता है।



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