सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

प्रेमचंद के फटे जूते

  प्रेमचंद का एक चित्र मेरे सामने है, पत्नी के साथ फ़ोटो खिंचा रहे हैं. सिर पर किसी मोटे कपड़े की टोपी, कुरता और धोती पहने हैं. कनपटी चिपकी है, गालों की हड्डियां उभर आई हैं, पर घनी मूंछें चेहरे को भरा-भरा बतलाती हैं. पांवों में केनवस के जूते हैं, जिनके बंद बेतरतीब बंधे हैं. लापरवाही से उपयोग करने पर बंद के सिरों पर की लोहे की पतरी निकल जाती है और छेदों में बंद डालने में परेशानी होती है. तब बंद कैसे भी कस लिए जाते हैं. दाहिने पांव का जूता ठीक है, मगर बाएं जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अंगुली बाहर निकल आई है. मेरी दृष्टि इस जूते पर अटक गई है. सोचता हूं-फ़ोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी-इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है. यह जैसा है, वैसा ही फ़ोटो में खिंच जाता है. मैं चेहरे की तरफ़ देखता हूं. क्या तुम्हें मालूम है, मेरे साहित्यिक पुरखे कि तुम्हारा जूता फट गया है और अंगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हें इसका ज़रा भी अहसास नहीं है? ज़रा लज्जा, संकोच या झेंप नहीं है? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि धोती को थोड़ा न...

हिंदी साहित्य कहाँ से शुरू करें?

हिंदी साहित्य कहाँ से शुरू करें?


 हिंदी साहित्य कहाँ से शुरू करें? यह प्रश्न कोई भी कर सकता है, बशर्ते वह हिंदी भाषा और उसके साहित्य में दिलचस्पी रखता हो; लेकिन प्राय: यह प्रश्न किशोरों और नवयुवकों की तरफ़ से ही आता है। यहाँ इस प्रश्न का उत्तर कुछ क़दर देने की कोशिश की गई है कि जब भी कोई पूछे : हिंदी साहित्य कहाँ से शुरू करें? आप कह सकें : हिंदी साहित्य यहाँ से शुरू करें :


1. देवकीनंदन खत्री कृत ‘चंद्रकांता’
2. प्रेमचंद की समग्र कहानियाँ
3. भगवतीचरण वर्मा का उपन्यास ‘चित्रलेखा’
4. जैनेंद्र कुमार का उपन्यास ‘त्यागपत्र’
5. हरिवंश राय ‘बच्चन’ का काव्य ‘मधुशाला’
6. राहुल सांकृत्यायन कृत ‘वोल्गा से गंगा’
7. विश्वनाथ मुखर्जी कृत ‘बना रहे बनारस’
8. यशपाल का उपन्यास ‘दिव्या’
9. अज्ञेय कृत ‘शेखर एक जीवनी’ और ‘नदी के द्वीप’
10. धर्मवीर भारती कृत ‘गुनाहों का देवता’
11. रामधारी सिंह दिनकर का काव्य ‘रश्मिरथी’
12. पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ की आत्मकथा ‘अपनी ख़बर’
13. राजकमल चौधरी का उपन्यास ‘मछली मरी हुई’
14. निर्मल वर्मा का संपूर्ण साहित्य
15. हरिशंकर परसाई का संपूर्ण साहित्य
16. शिवप्रसाद मिश्र ‘रूद्र’ काशिकेय कृत ‘बहती गंगा’
17. मोहन राकेश का नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’
18. केशव प्रसाद मिश्र का उपन्यास ‘कोहबर की शर्त’
19. श्रीलाल शुक्ल का उपन्यास ‘राग दरबारी’
20. शरद जोशी का संपूर्ण साहित्य
21. नामवर सिंह की कृत ‘दूसरी परंपरा की खोज’ और ‘कहानी : नई कहानी’
22. राजेंद्र यादव का उपन्यास ‘सारा आकाश’
23. कमलेश्वर की कहानियाँ
24. अमरकांत की कहानियाँ
25. राही मासूम रज़ा का उपन्यास ‘टोपी शुक्ला’
26. मन्नू भंडारी का उपन्यास ‘आपका बंटी’
27. ममता कालिया का उपन्यास ‘बेघर’
28. कृष्णा सोबती का उपन्यास ‘मित्रो मरजानी’
29. दुष्यंत कुमार का काव्य ‘साये में धूप’
30. मृदुला गर्ग का उपन्यास ‘चित्तकोबरा’
31. विष्णु प्रभाकर कृत ‘आवारा मसीहा’
32. हरिमोहन झा कृत ‘खट्टर काका’
33. कुँवर नारायण का कविता-संग्रह ‘अपने सामने’
34. केदारनाथ सिंह की समग्र कविताएँ
35. अशोक वाजपेयी की समग्र कविताएँ
36. नवीन सागर की समग्र कविताएँ
37. मंगलेश डबराल का कविता-संग्रह ‘पहाड़ पर लालटेन’
38. उदय प्रकाश का कविता-संग्रह ‘अबूतर कबूतर’
39. मनोहर श्याम जोशी का उपन्यास ‘कसप’
40. पंकज बिष्ट का उपन्यास ‘लेकिन दरवाज़ा’
41. सुरेंद्र वर्मा का उपन्यास ‘मुझे चाँद चाहिए’
42. विनोद कुमार शुक्ल का उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’
43. ज्ञान चतुर्वेदी का उपन्यास ‘बारामासी’
44. काशीनाथ सिंह कृत ‘काशी का अस्सी’
45. दूधनाथ सिंह कृत ‘लौट आ ओ धार’
46. रवींद्र कालिया कृत ‘ग़ालिब छुटी शराब’
47. कृष्ण कल्पित का काव्य ‘एक शराबी की सूक्तियाँ’
48. गीत चतुर्वेदी का कविता-संग्रह ‘ख़ुशियों के गुप्तचर’
49. बाबुषा कोहली का कविता-संग्रह ‘प्रेम गिलहरी दिल अखरोट’
50. सुशोभित के ललित निबंध-संग्रह ‘सुनो बकुल’, ‘माउथ ऑर्गन’ और ‘गांधी की सुंदरता’

इस सूची को हिंदी साहित्य के अध्ययन-क्रम में ‘कोर्सेतर किशोरोपयोगी हिंदी-साहित्य की स्वर्ण-रेखा’ कह सकते हैं। यह अलग तथ्य है कि इसमें कुछ लेखकों की कुछ रचनाएँ भिन्न-भिन्न शिक्षालयों के भिन्न-भिन्न पाठ्यक्रमों में भी मिल सकती हैं। अब हमारे केंद्रीय प्रश्न के उत्तर से निकलता एक प्रश्न यह भी संभव है कि हिंदी-साहित्य की इस ‘स्वर्ण-रेखा’ को पार कैसे करें, यानी यह सब कुछ अगर पढ़ना हो तो प्राप्त कहाँ से करें? इसका उत्तर यह है कि इसमें इंटरनेट और आपका नज़दीकी पुस्तकालय (लाइब्रेरी) आपकी बहुत मदद कर सकते हैं। साहित्यिक दोस्त बनाना और सोशल मीडिया भी इस सिलसिले में बहुत सहायक हैं।


यह एक बेहद पुरानी, आज़माई हुई और सच्ची राह है कि एक किताब जब आप पढ़कर ख़त्म करते हैं, तब वह ख़ुद बताती है कि अब अगली किताब आपको कौन-सी पढ़नी चाहिए। इसके बावजूद ऊपर उद्धृत ‘स्वर्ण-रेखा’ किशोरों और नवयुवकों के लिए कुछ इस प्रकार का एक जंतर है, जिसकी मदद से हिंदी-साहित्य में किशोरावस्था से मुक्त हुआ जा सकता है।

हमने इसका प्रयोग कुछ किशोरों पर किया है और हमें इसके बेहतर नतीजे प्राप्त हुए हैं। इस बेहतरी के मज़ीद विस्तार के लिए अब हम इसे बिल्कुल मुफ़्त में सार्वजनिक भी कर रहे हैं, जबकि आजकल जिसके पास कुछ भी नहीं है; वह भी कुछ न देने के लिए कुछ न कुछ माँग रहा है।

यहाँ यह स्पष्ट करना भी ज़रूरी है कि किशोरावस्था से आशय को यहाँ बहुत अभिधा में लेते हुए, इसे 13 से 19 वर्ष (teenage) के बीच का वक़्त मात्र मान लेने की भूल न करें; क्योंकि बहुत सारे प्रसंगों में साहित्यिक किशोरावस्था, शारीरिक किशोरावस्था से भिन्न अवस्था है।

किशोरावस्था से मुक्ति प्रत्येक देश-काल में समाज और संस्कृति की माँग रही आई है। लेकिन मुक्ति की माँग संघर्ष है—सतत संघर्ष। इस संघर्ष में ढील का उदाहरण देखना हो तो अपने आस-पास 1965 से 1985 की अवधि के बीच जन्मे व्यक्तियों के जीवन पर एक नज़र मारिए, देखिए क्या वे अब भी (2021 में) गुलज़ार और समीर की बहस में उलझे हुए हैं? क्या अब भी वे सब कुछ में लैंगिक विमर्श और आरक्षण खोजने की स्वागत-योग्य, लेकिन कैशोर्य चाह से ग्रस्त हैं? क्या अब भी वे लुगदी उपन्यासों, सत्तर और नब्बे का दौर, गोविंदा, निर्मल वर्मा, रजनीगंधा फूल तुम्हारे…, मनोहर श्याम जोशी, क्रिकेट सम्राट, बहुत पियार करते हैं तुमको सनम…, झूठ बोले कौआ काटे, पहल, कम्पट, डीडी मेट्रो, बरफ वाली आइसक्रीम, पोस्टकार्ड और एसटीडी-पीसीओ आदि की लंतरानियों में व्यस्त हैं? अगर हैं, तब इन्हें ही ऊपर उद्धृत जंतर की ज़रूरत है, वह भी सीधे उस भाषा में जिसमें ये सबसे सहज हैं, यानी हिंदी में।

सन् 2000 के बाद जन्मे मानव-शरीर ही अगर आज किशोर होते तो मुक्ति का संघर्ष बहुत सहल हो जाता, लेकिन ऐसा है कहाँ… इसलिए यह ‘स्वर्ण-रेखा’ है, इसे पार कीजिए और वयस्क होइए। इसके बाद क्या करना-पढ़ना-देखना-सुनना-जानना है, किसी से पूछने की ज़रूरत कम ही पड़ेगी; क्योंकि जैसा कि कहा गया : प्रत्येक बेहतर रचना आपको दूसरी बेहतर रचनाओं तक ले जाती है। बाक़ी ‘कोर्सेतर किशोरोपयोगी हिंदी-साहित्य की स्वर्ण-रेखा’ के पार ये रचनाकार हैं :

निराला, जयशंकर प्रसाद, रामचंद्र शुक्ल, भुवनेश्वर, मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, त्रिलोचन, नागार्जुन, रामविलास शर्मा, रघुवीर सहाय, हजारीप्रसाद द्विवेदी, फणीश्वरनाथ रेणु, कृष्ण बलदेव वैद, विजय देव नारायण साही, आचार्य नरेंद्र देव, वासुदेव शरण अग्रवाल, अमृतलाल नागर, श्रीनरेश मेहता, कृष्णनाथ, कुबेरनाथ राय, शिवप्रसाद सिंह, श्रीकांत वर्मा, शैलेश मटियानी, रमेश बक्षी, गिरिराज किशोर, ज्ञानरंजन, मंज़ूर एहतेशाम, शानी, विश्वनाथ त्रिपाठी, विष्णु खरे, चंद्रकांत देवताले, वागीश शुक्ल, अब्दुल बिस्मिल्लाह, प्रियंवद, शिवमूर्ति, संजीव, देवेंद्र, मैत्रेयी पुष्पा, अलका सरावगी, वीरेन डंगवाल, अरुण कमल, राजेश जोशी, असद ज़ैदी, तुलसीराम, कात्यायनी, अजंता देव, देवी प्रसाद मिश्र, सविता सिंह, आर. चेतनक्रांति, महेश वर्मा।

नोट : दोनों सूचियों में कोई एक नाम दो बार न आए, इसका विशेष ध्यान रखा गया है। इस प्रसंग में यह ध्यान देना ज़रूरी है कि पहली सूची में जिस लेखक की किसी एक रचना का ही उल्लेख है, उसकी दूसरी रचना बहुत संभव है कि ‘स्वर्ण-रेखा’ के पार ठहरे, जैसे : धर्मवीर भारती का उपन्यास  ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’, राही मासूम रज़ा का उपन्यास ‘आधा गाँव’ और सुरेंद्र वर्मा का उपन्यास ‘काटना शमी का वृक्ष, पद्मपंखुरी की धार से’।

टिप्पणियाँ

Best From the Author

जब आपके अंदर काबिलियत हो तो समय आपका स्वयं इंतजार करता है, इतिहास रचवाने के लिए

जब आपके अंदर काबिलियत हो तो समय आपका स्वयं इंतजार करता है, इतिहास रचवाने के लिए      बात उन दिनों की है, भारतीय क्रिकेट टीम 2003 का वर्ल्डकप   फाइनल ऑस्ट्रेलिया से हार रही थी। अकेला पोंटिंग भारी पड़ रहा था, और अंततः पोंटिंग की वजह से ऑस्ट्रेलिया ने भारत को हरा कर विश्व कप जीत लिया। भारतीय टीम के बड़े बड़े धुरंधर सौरव गांगुली, युवराज सिंह, सचिन तेंदुलकर, जाहिर खान, मोहम्मद कैफ उस दिन ऐसे बेबस थे जैसे वो दिन बस रिकी पॉन्टिंग के लिए ही बना हो। उन्ही दिनों खड़गपुर रेलवे क्वार्टर में अपने दोस्तों के साथ टीवी पर मैच देख रहा था। सचिन के आउट होने ही वो उठा और चाय बनाने चल दिया। इधर पतीली में चाय उबल रही थी और उधर उसके दिमाग में अपने खेल को आगे बढ़ाने की कोशिशें उबल रही थी। गैस को बढ़ा कर उसने उबलने की गति कुछ और बढ़ाई ही थी कि दोस्तों की खुसुर पुसुर से उसके दिमाग में उबाल बढ़ने लगे। "ई युवरजवा और कैफवा तो अपने महिया के साथ ही खेलत बा ना। पता नहि अपने महिया का नंबर कब लागेल।" वो चुप चाप सुन कर मुस्कुराता रहा और चाय बना कर लाता रहा। ठीक चार साल बाद जब वो आउट हुआ तो भारतीय दर्...

History of Chambal

 चम्बल का इतिहास क्या हैं? ये वो नदी है जो मध्य प्रदेश की मशहूर विंध्याचल पर्वतमाला से निकलकर युमना में मिलने तक अपने 1024 किलोमीटर लम्बे सफर में तीन राज्यों को जीवन देती है। महाभारत से रामायण तक हर महाकाव्य में दर्ज होने वाली चम्बल राजस्थान की सबसे लम्बी नदी है। श्रापित और दुनिया के सबसे खतरनाक बीहड़ के डाकुओं का घर माने जाने वाली चम्बल नदी मगरमच्छों और घड़ियालों का गढ़ भी मानी जाती है। तो आईये आज आपको लेकर चलते हैं चंबल नदी की सेर पर भारत की सबसे साफ़ और स्वच्छ नदियों में से एक चम्बल मध्य प्रदेश के इंदौर जिले में महू छावनी के निकट स्थित विंध्य पर्वत श्रृंखला की जनापाव पहाड़ियों के भदकला जलप्रपात से निकलती है और इसे ही चम्बल नदी का उद्गम स्थान माना जाता है। चम्बल मध्य प्रदेश में अपने उद्गम स्थान से उत्तर तथा उत्तर-मध्य भाग में बहते हुए धार, उज्जैन, रतलाम, मन्दसौर, भिंड, मुरैना आदि जिलों से होकर राजस्थान में प्रवेश करती है। राजस्थान में चम्बल चित्तौड़गढ़ के चौरासीगढ से बहती हुई कोटा, बूंदी, सवाईमाधोपुर, करोली और धौलपुर जिलों से निकलती है। जिसके बाद ये राजस्थान के धौलपुर से दक्षिण क...

प्रेमचंद के फटे जूते

  प्रेमचंद का एक चित्र मेरे सामने है, पत्नी के साथ फ़ोटो खिंचा रहे हैं. सिर पर किसी मोटे कपड़े की टोपी, कुरता और धोती पहने हैं. कनपटी चिपकी है, गालों की हड्डियां उभर आई हैं, पर घनी मूंछें चेहरे को भरा-भरा बतलाती हैं. पांवों में केनवस के जूते हैं, जिनके बंद बेतरतीब बंधे हैं. लापरवाही से उपयोग करने पर बंद के सिरों पर की लोहे की पतरी निकल जाती है और छेदों में बंद डालने में परेशानी होती है. तब बंद कैसे भी कस लिए जाते हैं. दाहिने पांव का जूता ठीक है, मगर बाएं जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अंगुली बाहर निकल आई है. मेरी दृष्टि इस जूते पर अटक गई है. सोचता हूं-फ़ोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी-इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है. यह जैसा है, वैसा ही फ़ोटो में खिंच जाता है. मैं चेहरे की तरफ़ देखता हूं. क्या तुम्हें मालूम है, मेरे साहित्यिक पुरखे कि तुम्हारा जूता फट गया है और अंगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हें इसका ज़रा भी अहसास नहीं है? ज़रा लज्जा, संकोच या झेंप नहीं है? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि धोती को थोड़ा न...

भारत का महान राजा अशोक, Ashoka The Great

अशोक, जिसे 'देवनामपिया पियादासी' या देवताओं के प्रिय के रूप में भी जाना जाता है, मौर्य वंश का अंतिम प्रमुख राजा था। उन्हें मुख्य रूप से उनके शासनकाल के दौरान भारत और विदेशों में बौद्ध धर्म के प्रसार में उनकी भूमिका के लिए याद किया जाता है। 1830 के दशक के मध्य तक, जब जेम्स प्रिंसेप ब्राह्मी लिपि में एक शिलालेख को समझने में सक्षम थे, उन्हें मौर्य राजाओं की सूची में कई शासकों में से एक माना जाता था। अंतिम पुष्टि कि शिलालेख में देवानामपिया पियादासी के रूप में दिखाई देने वाला नाम अशोक का था, 1915 में आया था। अशोक मौर्य राजा बिंदुसार के पुत्र थे। जबकि कुछ इतिहासकारों का मानना है कि वह अपने पिता की मृत्यु के तुरंत बाद सिंहासन पर चढ़ा, कई लोगों का तर्क है कि उनके कई भाइयों के बीच उत्तराधिकार के लिए संघर्ष में लगभग चार साल का अंतर था। एक प्रशासक के रूप में उनके करियर ने तब उड़ान भरी जब उन्होंने तक्षशिला में राज्यपाल के रूप में सेवा शुरू की। इसमें एक विद्रोह को दबाना और व्यावसायिक गतिविधियों को संभालना शामिल था। अशोक के शासन के दौरान विभिन्न घटनाओं में, कलिंग युद्ध को सबसे मह...

History and Significance of Taking The Knee| Why Players Kneeling on the ground

History and Significance of Taking The Knee| Why Players Kneeling on the ground T20 World Cup में खिलाड़ियों द्वारा किया जाने वाला Taking The Knee क्या है? बीते कुछ समय से हम सभी लोग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चलने वाले खेलों में खिलाड़ियों को अपने एक घुटने के बल बैठता हुआ देखते आए हैं। चाहे फुटबॉल हो, क्रिकेट हो अथवा ओलंपिक खेल ही क्यों ना हो, खिलाड़ियों को अपने घुटने के बल बैठकर एक खास प्रदर्शन करना आखिर क्या दिखाता है? आखिर क्यों दुनिया भर के खिलाड़ी अपने अपने क्षेत्र में इस प्रकार की Body Language बना रहे हैं? Football Players Kneeling 18वीं और 19वीं शताब्दी में जब ब्रिटेन पूरी दुनिया पर अपना राज कर रहा था। तब ब्रिटिश अधिकारी कई अलग-अलग तरीकों से उन देशों के मूल निवासियों के प्रति घृणा का भाव रखते थे। जिनमें सबसे बड़ा भाव था रंग के आधार पर भेदभाव करना। रंगभेद, नस्लभेद या Racism भी कहा जाता है। रंगभेद और नस्ल भेद वक्त के साथ कमजोर पड़ते गए लेकिन कभी पूर्ण रूप से खत्म नहीं हो पाए। कुछ लोगों का केवल अपने त्वचा के रंग आधार पर यह मानना कि वह बाकी दुनिया से श्रेष्ठ हैं, एक प्रकार की विकृत ...