सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Suicide Fruiting

इस साल बाज़ार में जितने जामुन दिखाई दे रहे हैं, उतने मैंने पिछले दो दशकों में कभी नहीं देखे। ​जामुन के अक्षरशः ढेर लग रहे हैं (नीचे गिर रहे हैं)। जिन पेड़ों पर पिछले साल इक्का-दुक्का फल आए थे, वे पेड़ भी इस बार जामुन से पटे पड़े हैं। जहाँ फल आए थे, वहाँ अब उन का अंबार लगना शुरू हो गया है। ​आखिर यह सब क्या चल रहा है? ​हमारी दादी/नानी हमेशा कहती थीं कि, "जिस गर्मियों में जामुन के ऐसे ढेर लगते हैं, उस साल सूखा पड़ता है।" ​बुजुर्गों का यह पारंपरिक ज्ञान वनस्पति विज्ञान (Botany) के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बिल्कुल सही और सटीक है। विज्ञान में इस दिलचस्प और उतनी ही चौंकाने वाली प्रक्रिया को "मास्टिंग" (Masting) या "स्ट्रेस फ्रूटिंग" (Stress Fruiting) कहा जाता है। ​पेड़ों द्वारा खुद को खत्म करके ज्यादा से ज्यादा फल देने के इस आखिरी प्रयास को कभी-कभी "सुसाइड फ्रूटिंग" (Suicide Fruiting) या "बंपर क्रॉप" भी कहा जाता है। ​यह असल में क्या है और इसके पीछे का विज्ञान क्या कहता है, आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं: ​१. 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट' (अस्ति...

All About Nobel Awards in Hindi| Nobel Prize History in Hindi| Nobel Prize 2021 in Hindi

All About Nobel Awards in Hindi| Nobel Prize History in Hindi| Nobel Prize 2021 in Hindi

नोबेल पुरस्कार आधुनिक दुनिया में विषय विशेष पर दिया जाने वाला सबसे बड़ा सम्मान एवं पुरस्कार है। यह पुरस्कार स्वीडिश वैज्ञानिक अल्फ्रेड नोबेल की याद में दिया जाता है। जिनका जन्म 21 अक्टूबर 1835 को हुआ था एवं मृत्यु 10 दिसंबर 1896 को हुई थी। उनकी पुण्यतिथि पर उनको सम्मान देते हुए 10 दिसंबर को ही नोबेल पुरस्कारों का वितरण किया जाता है।
Alfred Nobel
Alfred Nobel

अलफ्रेड नोबेल स्वीडन के प्रख्यात वैज्ञानिक थे। उन्होंने अपने जीवन काल में 355 पेटेंट अपने नाम कराए। जिसमें डायनामाइट भी शामिल था। डायनामाइट उस समय सबसे महत्वपूर्ण खोजों में से एक था। क्योंकि डायनामाइट से पहले सारे विस्फोटक पदार्थ तरल होते थे। जिन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना, अत्यंत कठिन एवं साथ ही साथ बेहद हानिकारक भी होता था।
Dynamite
Dynamite

डायनामाइट की बिक्री करके सर अल्फ्रेड नोबेल ने तकरीबन 265 बिलियन अमेरिकी डॉलर की संपत्ति नोबेल फाउंडेशन में दान की थी।
Norwegian Parliament
Norwegian Parliament
नोबेल फाउंडेशन को बनाने की बात उन्होंने अपनी वसीयत में ही लिख दी थी। जिसमें यह लिखा था कि दुनिया भर के विभिन्न वैज्ञानिक एवं महान हस्तियों को उनकी मूल राशि के ब्याज से प्राप्त धनराशि प्रदान की जाए।

  • किस क्षेत्र में दिया जाता है नोबेल पुरस्कार

वर्तमान समय में नोबेल पुरस्कार शांति, साहित्य, भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र, चिकित्सा शास्त्र, एवं अर्थशास्त्र में विश्व का सर्वोच्च पुरस्कार है।
उनकी वसीयत को ध्यान में रखते हुए 29 जून 1900 को उनकी मृत्यु के चौथे साल नोबेल फाउंडेशन की स्थापना की गई। जिसने अगले साल से ही 1901 में अल्फ्रेड नोबेल की याद में, नोबेल पुरस्कार वितरण करना शुरू कर दिया। पहली बार नोबेल पुरस्कारों का आयोजन स्टॉकहोम एवं ओस्लो से किया गया था।

  • क्या-क्या मिलता है Nobel Award में

नोबेल पुरस्कार में 18 कैरेट का स्वर्ण पदक 10 मिलियन स्वीडिश क्रोनर तकरीबन (73.5 भारतीय रुपए) एवं एक प्रशस्ति पत्र दिया जाता है।
Nobel Prize
The Nobel Gold Medel

  • किसके द्वारा दिया जाता है Nobel Award

Nobel Committee
The Norwegian Nobel Committee

नोबेल पुरस्कार स्वीडन की एक कमेटी द्वारा निर्धारित किया जाता है जिसके अंतर्गत वह भौतिकी, रसायन, चिकित्सा, अर्थशास्त्र, एवं साहित्य के क्षेत्र में अग्रणी उम्मीदवारों का चयन करते हैं। केवल शांति का नोबेल पुरस्कार नॉर्वे के ओस्लो में दिया जाता है। नॉर्वेजियन नोबेल समिति यह तय करती है कि पुरस्कार किसे मिलेगा। एवं नॉर्वे की संसद नॉर्वेजियन नोबेल समिति का चयन करती है।

  • Fascinating Facts about Nobel Awards

  • सन 1901 से 2020 तक 597 नोबेल पुरस्कार दिए गए हैं जिनमें से 923 व्यक्ति हैं एवं 27 संगठन है।
  • शांति का पहला नोबेल पुरस्कार 1901 में हेनरी ड्यूनेट को रेड क्रॉस की स्थापना एवं फ्रेंच पीस सोसाइटी की स्थापना करने वाले फ्रेडरिक पैसी को दिया गया था।
  • भौतिकी का नोबेल पुरस्कार 1916, 1931, 1934, 1940, 1941, एवं 1942 में नहीं दिया गया था।
  • रसायन शास्त्र का नोबेल पुरस्कार 1916, 1917, 1919, 1924, 1933, 1940, 1941, एवं 1942 में नहीं दिया गया है।
  • इसी प्रकार चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार 1915, 1916, 1917, 1918, 1921, 1925, 1940, 1941, एवं 1942 में नहीं दिया गया था।
  • साहित्य का नोबेल पुरस्कार 1914, 1918, 1935, 1940, 1941, 1942, एवं 1943 में नहीं दिया गया था।
  • सबसे अधिक बार स्थगित होने वाला पुरस्कार शांति का नोबेल पुरस्कार है जिसे 1914, 1915, 1916, 1918, 1923, 1924, 1928, 1932, 1939, 1940, 1941, 1942, 1943, 1948, 1955, 1956, 1966, 1967, एवं 1972 में नहीं दिया गया था। ऐसा माना जाता है कि 1948 का शांति का नोबेल पुरस्कार महात्मा गांधी को दिया जाना था लेकिन पुरस्कारों की घोषणा से पहले ही उनकी हत्या कर दी गई जिसकी वजह से उस साल का नोबेल पुरस्कार किसी को नहीं दिया गया।
  • John B Goodinf 97 वर्ष की आयु में रसायन शास्त्र में नोबेल पुरस्कार जीतने वाले सबसे अधिक आयु के व्यक्ति बने थे। 
  • मलाला यूसुफजई को मात्र 17 वर्ष में शांति का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया था।
  • अन्य क्षेत्रों में सबसे कम उम्र में पुरस्कार प्राप्त करने वालों में लॉरेंस ब्रैग 1915 भौतिकी, 25 वर्ष, नादिया मुराद 25 वर्ष 2018, शांति फ्रेडरिक जूलियट रसायन शास्त्र 35 वर्ष 1935, फ्रेडरिक Banting चिकित्सा शास्त्र 32 वर्ष 1923, एवं साहित्य में रोडिया ड्रिपिंग को 41 वर्ष की आयु में 1907, शामिल है।
  • Marie Qurie नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाली पहली महिला थी. साथ ही पहली ऐसी हस्ती भी थी जिन्हें दो बार नोबेल पुरस्कार दिया गया. 1903 में भौतिक शास्त्र में उनके योगदान के लिए एवं 1911 में रसायन शास्त्र में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए।
  • Jean Paul Sarte & Le Duc Tho ने पुरस्कार लेने से मना कर दिया था। 
  • Richard Kuh, Adolf Butenad, Gerhard Domgak को Adolf Hitler ने एवं Boris Pastrnak को तात्कालिक USSR सरकार ने नोबेल पुरस्कार ना लेने के लिए बाध्य किया था।
  • कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें नोबेल पुरस्कार कब मिला जब वह जेल में बंद थे इनमें से Karl Von Oshietzki, Aung San Suu Kyi और Liu Xiaobo प्रमुख थे।
  • जहां लोगों को एक बार नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने में पूरा जीवन लग जाता है वहीं कुछ महान विभूतियां ऐसी भी हुई हैं जिन्हें अपने जीवन में एक से अधिक बार नोबेल पुरस्कार भी मिला है. J. bardeen, Marie Curie, L. Pauling, F. Sanger, ICRC, UNHCR एवं Red Cross शामिल हैं।



आशा करते हैं आपको यह ब्लॉग पसंद आया होगा अगर आपको यह ब्लॉग अच्छा लगा तो कृपया इसे शेयर कीजिए एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचारों को लिखना ना भूलिए.
धन्यवाद🙏

टिप्पणियाँ

Best From the Author

Not demonic, just introverted! आसुरी नहीं, अंतर्मुखी!

मैं 27 मूल नक्षत्रों, शनिवार और 22 तारीख को जन्मा व्यक्ति हूँ — एक ऐसा जन्म‑संयोग जो न सिर्फ़ मेरी तिथि बताता है, बल्कि मेरे भीतर की गहराई, द्वंद्व और अस्थिरता का भी संकेत देता है। राहु के प्रबल और दूरदर्शी प्रभाव ने मेरे व्यक्तित्व को सीधे, सरल और सतही नहीं रहने दिया; मैं विचारों की उस गहरी खाई में अक्सर भटक जाता हूँ, जहाँ हर बात बस बाहरी रूप नहीं, बल्कि भीतरी अर्थ भी धरती होता है। मैं हर निर्णय के पीछे छिपे संभावित नतीजों, अनजाने खतरों और छिपी हुई उम्मीदों को भी देखने का आदी हूँ।   कभी‑कभी लोग मेरे कार्यों, अभिव्यक्ति और निर्णयों को असामान्य, अत्यंत गहन या यहाँ तक कि “आसुरी” समझने लगते हैं, क्योंकि मेरी सोच उनकी सामान्य धारणाओं की रेखाओं से बाहर निकल जाती है। पर यह आसुरी नहीं, बस एक टूटी हुई, खुरदरी और अत्यंत ईमानदार आत्मा की आवाज़ है, जो दिखावे की दुनिया से थक चुकी है और अपने सच्चे रूप में जीना चाहती है। मैं जब भी बोलता हूँ, तो बस शब्द नहीं बोलता, बल्कि उसके पीछे समा दर्द, संघर्ष, अनुभव और उम्मीदों को भी लाता हूँ।   मेरी पहचान में ग्रहों का भी बड़ा हाथ है। जब ग्रह ही वही है...

अफगानी तालिबान एवं ISIS के झंडों पर आखिर लिखा क्या होता है? What is written on New flag of Afghanistan & ISIS flag? A blogpost by Abiiinabu

अफगानी तालिबान एवं ISIS के झंडों पर आखिर लिखा क्या होता है? What is written on New flag of Afghanistan & ISIS flag? ISIS ke jhande pr kya likha hota hai? जिहाद के काले झंडे ISIS , ALQEIDA और कई अन्य इस्लामिक चरमपंथी संगठनों द्वारा समय-समय पर प्रदर्शित किए जाते हैं, और युद्ध के समय पर प्रदर्शित किए जाते रहे हैं। लेकिन यही झंडे बाहर की दुनिया में एक अजीब खौफ और उत्सुकता भी पैदा करते रहे हैं. इस्लामिक ध्वज, उसका रंग, उसकी भाषा, उसके निशान और यहां तक कि झंडों के ऊपर लिखी धार्मिक सूक्तियां भी बाहरी दुनिया को अपनी और आकर्षित करने में सफल रही हैं। Isis Flag       लेकिन यह चरमपंथी संगठन जिस ध्वज का प्रदर्शन करके चरमपंथ की नई परिभाषा एवं कट्टरवाद को प्रदर्शित करते रहे हैं उसका इतिहास उसके वर्तमान परिपेक्ष से बिल्कुल जुदा है। इतिहास को जानने वाले यहां तक कहते हैं कि इस झंडे का उपयोग केवल व्यक्तिगत चरमपंथ को बढ़ावा देने, एवं स्वार्थ सिद्धि के लिए ही अधिकतर हुआ है। आतंकवादी संगठन इसे अपने तरीके से तोड़ मरोड़ कर पेश करते हैं और केवल अपने स्वार्थ के लिए इसका उपयोग करते हैं यह...

Bageshwar Baba Controversy

नालंदा! तात्कालिक विश्व का सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय! कहते हैं, संसार में तब जितना भी ज्ञान था, वहाँ सबकी शिक्षा दीक्षा होती थी। सारी दुनिया से लोग आते थे ज्ञान लेने... बौद्धिकता का स्तर वह कि बड़े बड़े विद्वान वहाँ द्वारपालों से पराजित हो जाते थे। पचास हजार के आसपास छात्र और दो हजार के आसपास गुरुजन! सन 1199 में मात्र दो हजार सैनिकों के साथ एक लुटेरा घुसा और दिन भर में ही सबको मार काट कर निकल गया। दुनिया के सर्वश्रेष्ठ शिक्षक और उनके बीस हजार छात्र मात्र दो सौ लुटेरों से भी नहीं जूझ सके। छह महीने तक नालंदा के पुस्तकालय की पुस्तकें जलती रहीं।      कुस्तुन्तुनिया! अपने युग के सबसे भव्य नगरों में एक, बौद्धिकों, वैज्ञानिकों, दार्शनिकों की भूमि! क्या नहीं था वहाँ, भव्य पुस्तकालय, मठ, चर्च महल... हर दृष्टि से श्रेष्ठ लोग निवास करते थे। 1455 में एक इक्कीस वर्ष का युवक घुसा और कुस्तुन्तुनिया की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल गयी। सबकुछ तहस नहस हो गया। बड़े बड़े विचारक उन लुटेरों के पैरों में गिर कर गिड़गिड़ाते रहे, और वह हँस हँस कर उनकी गर्दन उड़ाता रहा। कुस्तुन्तुनिया का पतन हो ग...

काग के भाग बड़े सजनी

  पितृपक्ष में रसखान रोते हुए मिले। सजनी ने पूछा -‘क्यों रोते हो हे कवि!’ कवि ने कहा:‘ सजनी पितृ पक्ष लग गया है। एक बेसहारा चैनल ने पितृ पक्ष में कौवे की सराहना करते हुए एक पद की पंक्ति गलत सलत उठायी है कि कागा के भाग बड़े, कृश्न के हाथ से रोटी ले गया।’ सजनी ने हंसकर कहा-‘ यह तो तुम्हारी ही कविता का अंश है। जरा तोड़मरोड़कर प्रस्तुत किया है बस। तुम्हें खुश होना चाहिए । तुम तो रो रहे हो।’ कवि ने एक हिचकी लेकर कहा-‘ रोने की ही बात है ,हे सजनी! तोड़मोड़कर पेश करते तो उतनी बुरी बात नहीं है। कहते हैं यह कविता सूरदास ने लिखी है। एक कवि को अपनी कविता दूसरे के नाम से लगी देखकर रोना नहीं आएगा ? इन दिनों बाबरी-रामभूमि की संवेदनशीलता चल रही है। तो क्या जानबूझकर रसखान को खान मानकर वल्लभी सूरदास का नाम लगा दिया है। मनसे की तर्ज पर..?’ खिलखिलाकर हंस पड़ी सजनी-‘ भारतीय राजनीति की मार मध्यकाल तक चली गई कविराज ?’ फिर उसने अपने आंचल से कवि रसखान की आंखों से आंसू पोंछे और ढांढस बंधाने लगी।  दृष्य में अंतरंगता को बढ़ते देख मैं एक शरीफ आदमी की तरह आगे बढ़ गया। मेरे साथ रसखान का कौवा भी कांव कांव करता चला आ...

Biography of Sardar Udham Singh| सरदार उधम सिंह की जीवनी

Biography of Sardar Udham Singh | सरदार उधम सिंह की जीवनी Sardar Udham Singh 31 जुलाई 1940, सुबह के 4:00 बज रहे थे। लंदन की पैंटनविले जेल में, जेलर ने अपने सहायक को लोहे की बनी मोटी सलाखों वाले दरवाजे को खोलने का आदेश दिया। जेलर ने कहा तुम्हारा समय आ गया है क्या तुम्हें नहीं लगता कि तुम बहुत जल्दी मर रहे हो? आंखों में सुकून, सिर पर पगड़ी और हाथों में वाहेगुरु का जप नाम लिए शेर सिंह उठा। और बड़े आत्मविश्वास के साथ उसने कहा-  "मैंने उसे मारा क्योंकि मुझे उससे नफरत थी। वो इसी लायक था। मैं किसी समाज का नहीं। मैं किसी के साथ नहीं। मरने के लिए बूढ़े होने का इंतजार क्यों करना? मैं देश के लिए अपनी जान दे रहा हूं।" घड़ी आगे बढ़ चली थी। थोड़ी देर बाद आदेश के अनुसार शेर सिंह को फांसी दे दी गई।  शेर सिंह, 2 महीने पहले तक अंग्रेज सरकार को इस नाम से बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था। लेकिन 2 महीने पहले कुछ ऐसा हुआ जिसने अंग्रेजी हुकूमत को यह बता दिया कि हिंदुस्तान अब नया रूप ले रहा है। यह घर में घुसेगा भी और ठोकेगा भी। शेर सिंह की शहादत के बाद ही पता चला कि भगत सिंह केवल एक नाम नहीं था, ब...