सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

प्रेमचंद के फटे जूते

  प्रेमचंद का एक चित्र मेरे सामने है, पत्नी के साथ फ़ोटो खिंचा रहे हैं. सिर पर किसी मोटे कपड़े की टोपी, कुरता और धोती पहने हैं. कनपटी चिपकी है, गालों की हड्डियां उभर आई हैं, पर घनी मूंछें चेहरे को भरा-भरा बतलाती हैं. पांवों में केनवस के जूते हैं, जिनके बंद बेतरतीब बंधे हैं. लापरवाही से उपयोग करने पर बंद के सिरों पर की लोहे की पतरी निकल जाती है और छेदों में बंद डालने में परेशानी होती है. तब बंद कैसे भी कस लिए जाते हैं. दाहिने पांव का जूता ठीक है, मगर बाएं जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अंगुली बाहर निकल आई है. मेरी दृष्टि इस जूते पर अटक गई है. सोचता हूं-फ़ोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी-इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है. यह जैसा है, वैसा ही फ़ोटो में खिंच जाता है. मैं चेहरे की तरफ़ देखता हूं. क्या तुम्हें मालूम है, मेरे साहित्यिक पुरखे कि तुम्हारा जूता फट गया है और अंगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हें इसका ज़रा भी अहसास नहीं है? ज़रा लज्जा, संकोच या झेंप नहीं है? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि धोती को थोड़ा न...

Eternal Love: The Indian Valentine Saga

Valentine day


पता नहीं क्यों मुझे 'प्रेम' शब्द सुनते ही सबसे पहले कृष्ण याद आते हैं। 
     वे कृष्ण, जो एक बार गोकुल छोड़ते हैं तो कभी मुड़ कर नहीं देखते भी गोकुल की ओर... न यमुना, न बृंदाबन, न कदम्ब, न राधा, कोई उन्हें दुबारा खींच नहीं पाता! मथुरा-गोकुल से अधिक दूर नहीं है हस्तिनापुर, कृष्ण सौ बार हस्तिनापुर गए पर गोकुल नहीं गए। क्यों?
     मुझे लगता है यदि कृष्ण दुबारा एक बार भी गोकुल चले गए होते तो उनके प्रेम की वह ऊंचाई नहीं रह जाती, जो है। प्रेम देह की विषयवस्तु नहीं, आत्मा का शृंगार है। प्रेम जिस क्षण देह का विषय हो जाय, उसी क्षण पराजित हो जाता है। कृष्ण का प्रेम आत्मा का प्रेम था। वे कभी राधिका के साथ नहीं रहे। कृष्ण का स्मरण कर राधिका रोती रहीं, राधिका का स्मरण कर कृष्ण मुस्कुराते रहे। दोनों देह से दूर रहे, पर दोनों की आत्मा साथ रही। तभी कृष्ण का प्रेम कभी पराजित नहीं हुआ। वे जगत के एकमात्र प्रेमी हैं जिनका प्रेम अपराजित रहा...
     यह भी कितना अजीब है कि कृष्ण का स्मरण कर राधिका रोती रहीं, और राधिका का स्मरण कर कृष्ण मुस्कुराते रहे। वस्तुतः दोनों अपनी मर्यादा ही निभा रहे थे। पुरुष रो नहीं पाता। वह मर्मांतक पीड़ा भी मुस्कुरा कर सहता है। पुरुष होने का भाव पुरुष को अंदर ही अंदर मार देता है, फिर भी वह अपनी पीड़ा किसी को नहीं बता पाता। कृष्ण तो पूर्ण पुरुष के दावे के साथ आये थे, कैसे रोते?
     रोये थे मेरे राम! पिता के लिए रोये, माता के लिए रोये, भाई के लिए रोये, पत्नी के लिए रोये, मित्र के लिए रोये, मातृभूमि तक के लिए रोये...
     लोगों को लगता है कि कृष्ण कोमल थे, और राम कठोर। मुझे लगता है राम कोमल थे, कृष्ण कठोर... राम ने सबको क्षमा कर दिया। चौदह वर्ष की कठोर पीड़ा देने वाली मंथरा तक को कुछ नहीं किया, कैकई के प्रति तनिक भी कठोर नहीं हुए, पर कृष्ण ने किसी को क्षमा नहीं किया। दुर्योधन कर्ण तो छोड़िये, अपने सबसे प्रिय मित्र अर्जुन तक को क्षमा नहीं किया। पत्नी का अपमान देखने का पाप किया अर्जुन ने, तो उन्ही के हाथों उनके कुल का नाश कराया।
     राम क्षमा करना सिखाते हैं, और कृष्ण दण्ड देना। जीवन के लिए यह दोनों कार्य अत्यंत आवश्यक हैं।
     लोग पूछते हैं कि आखिर क्या कारण है कि विश्व की सारी सभ्यताएँ नष्ट हो गईं, पर भारत अभी भी स्वस्थ है। मेरा यही उत्तर होता है कि भारत ने राम और कृष्ण दोनों को पूजा है, इसी कारण दीर्घायु है।
      हाँ तो बात प्रेम की! या कहें तो बात कृष्ण की... कहते हैं, कृष्ण ने उद्धव को गोकुल भेजा था गोपियों को ज्ञान सिखाने के लिए... क्या सचमुच? शायद नहीं! कृष्ण ने उद्धव को भेजा था ताकि उद्धव जब वापस लौटें तो उनसे गोकुल की कथा सुन कर एक बार फिर वे गोकुल को जी सकें... जो आनंद अपने प्रिय के बारे में किसी और के मुख से अच्छा सुनने में मिलता है, उसे याद करते रहने में मिलता है, वह आनंद तो प्रिय से मिलने में भी नहीं मिलता। है न?
     कृष्ण ने विश्व को सिखाया कि प्रेम को जीया कैसे जाता है... कृष्ण अभी युगों तक प्रेम सिखाते रहेंगे।
      मुझे लगता है जब-जब राधा कृष्ण की कथा लिखी गयी है, तो केवल राधा की ओर से लिखा गया है। राधा का वियोग, राधा का समर्पण, राधा के अश्रु... किसी ने कृष्ण को नहीं लिखा। कृष्ण भले गोकुल नहीं गए, पर जीवन भर उसी गोकुल के इर्द-गिर्द घूमते रहे। हस्तिनापुर, इंद्रप्रस्थ, कुरुक्षेत्र... नहीं तो कहाँ द्वारिका, कहाँ इंद्रप्रस्थ... 
     यदि कभी कृष्ण के प्रेम को लिख सका तो... कन्हैया जाने।

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

If you have any doubt please let me know.

Best From the Author

जब आपके अंदर काबिलियत हो तो समय आपका स्वयं इंतजार करता है, इतिहास रचवाने के लिए

जब आपके अंदर काबिलियत हो तो समय आपका स्वयं इंतजार करता है, इतिहास रचवाने के लिए      बात उन दिनों की है, भारतीय क्रिकेट टीम 2003 का वर्ल्डकप   फाइनल ऑस्ट्रेलिया से हार रही थी। अकेला पोंटिंग भारी पड़ रहा था, और अंततः पोंटिंग की वजह से ऑस्ट्रेलिया ने भारत को हरा कर विश्व कप जीत लिया। भारतीय टीम के बड़े बड़े धुरंधर सौरव गांगुली, युवराज सिंह, सचिन तेंदुलकर, जाहिर खान, मोहम्मद कैफ उस दिन ऐसे बेबस थे जैसे वो दिन बस रिकी पॉन्टिंग के लिए ही बना हो। उन्ही दिनों खड़गपुर रेलवे क्वार्टर में अपने दोस्तों के साथ टीवी पर मैच देख रहा था। सचिन के आउट होने ही वो उठा और चाय बनाने चल दिया। इधर पतीली में चाय उबल रही थी और उधर उसके दिमाग में अपने खेल को आगे बढ़ाने की कोशिशें उबल रही थी। गैस को बढ़ा कर उसने उबलने की गति कुछ और बढ़ाई ही थी कि दोस्तों की खुसुर पुसुर से उसके दिमाग में उबाल बढ़ने लगे। "ई युवरजवा और कैफवा तो अपने महिया के साथ ही खेलत बा ना। पता नहि अपने महिया का नंबर कब लागेल।" वो चुप चाप सुन कर मुस्कुराता रहा और चाय बना कर लाता रहा। ठीक चार साल बाद जब वो आउट हुआ तो भारतीय दर्...

History of Chambal

 चम्बल का इतिहास क्या हैं? ये वो नदी है जो मध्य प्रदेश की मशहूर विंध्याचल पर्वतमाला से निकलकर युमना में मिलने तक अपने 1024 किलोमीटर लम्बे सफर में तीन राज्यों को जीवन देती है। महाभारत से रामायण तक हर महाकाव्य में दर्ज होने वाली चम्बल राजस्थान की सबसे लम्बी नदी है। श्रापित और दुनिया के सबसे खतरनाक बीहड़ के डाकुओं का घर माने जाने वाली चम्बल नदी मगरमच्छों और घड़ियालों का गढ़ भी मानी जाती है। तो आईये आज आपको लेकर चलते हैं चंबल नदी की सेर पर भारत की सबसे साफ़ और स्वच्छ नदियों में से एक चम्बल मध्य प्रदेश के इंदौर जिले में महू छावनी के निकट स्थित विंध्य पर्वत श्रृंखला की जनापाव पहाड़ियों के भदकला जलप्रपात से निकलती है और इसे ही चम्बल नदी का उद्गम स्थान माना जाता है। चम्बल मध्य प्रदेश में अपने उद्गम स्थान से उत्तर तथा उत्तर-मध्य भाग में बहते हुए धार, उज्जैन, रतलाम, मन्दसौर, भिंड, मुरैना आदि जिलों से होकर राजस्थान में प्रवेश करती है। राजस्थान में चम्बल चित्तौड़गढ़ के चौरासीगढ से बहती हुई कोटा, बूंदी, सवाईमाधोपुर, करोली और धौलपुर जिलों से निकलती है। जिसके बाद ये राजस्थान के धौलपुर से दक्षिण क...

प्रेमचंद के फटे जूते

  प्रेमचंद का एक चित्र मेरे सामने है, पत्नी के साथ फ़ोटो खिंचा रहे हैं. सिर पर किसी मोटे कपड़े की टोपी, कुरता और धोती पहने हैं. कनपटी चिपकी है, गालों की हड्डियां उभर आई हैं, पर घनी मूंछें चेहरे को भरा-भरा बतलाती हैं. पांवों में केनवस के जूते हैं, जिनके बंद बेतरतीब बंधे हैं. लापरवाही से उपयोग करने पर बंद के सिरों पर की लोहे की पतरी निकल जाती है और छेदों में बंद डालने में परेशानी होती है. तब बंद कैसे भी कस लिए जाते हैं. दाहिने पांव का जूता ठीक है, मगर बाएं जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अंगुली बाहर निकल आई है. मेरी दृष्टि इस जूते पर अटक गई है. सोचता हूं-फ़ोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी-इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है. यह जैसा है, वैसा ही फ़ोटो में खिंच जाता है. मैं चेहरे की तरफ़ देखता हूं. क्या तुम्हें मालूम है, मेरे साहित्यिक पुरखे कि तुम्हारा जूता फट गया है और अंगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हें इसका ज़रा भी अहसास नहीं है? ज़रा लज्जा, संकोच या झेंप नहीं है? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि धोती को थोड़ा न...

भारत का महान राजा अशोक, Ashoka The Great

अशोक, जिसे 'देवनामपिया पियादासी' या देवताओं के प्रिय के रूप में भी जाना जाता है, मौर्य वंश का अंतिम प्रमुख राजा था। उन्हें मुख्य रूप से उनके शासनकाल के दौरान भारत और विदेशों में बौद्ध धर्म के प्रसार में उनकी भूमिका के लिए याद किया जाता है। 1830 के दशक के मध्य तक, जब जेम्स प्रिंसेप ब्राह्मी लिपि में एक शिलालेख को समझने में सक्षम थे, उन्हें मौर्य राजाओं की सूची में कई शासकों में से एक माना जाता था। अंतिम पुष्टि कि शिलालेख में देवानामपिया पियादासी के रूप में दिखाई देने वाला नाम अशोक का था, 1915 में आया था। अशोक मौर्य राजा बिंदुसार के पुत्र थे। जबकि कुछ इतिहासकारों का मानना है कि वह अपने पिता की मृत्यु के तुरंत बाद सिंहासन पर चढ़ा, कई लोगों का तर्क है कि उनके कई भाइयों के बीच उत्तराधिकार के लिए संघर्ष में लगभग चार साल का अंतर था। एक प्रशासक के रूप में उनके करियर ने तब उड़ान भरी जब उन्होंने तक्षशिला में राज्यपाल के रूप में सेवा शुरू की। इसमें एक विद्रोह को दबाना और व्यावसायिक गतिविधियों को संभालना शामिल था। अशोक के शासन के दौरान विभिन्न घटनाओं में, कलिंग युद्ध को सबसे मह...

History and Significance of Taking The Knee| Why Players Kneeling on the ground

History and Significance of Taking The Knee| Why Players Kneeling on the ground T20 World Cup में खिलाड़ियों द्वारा किया जाने वाला Taking The Knee क्या है? बीते कुछ समय से हम सभी लोग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चलने वाले खेलों में खिलाड़ियों को अपने एक घुटने के बल बैठता हुआ देखते आए हैं। चाहे फुटबॉल हो, क्रिकेट हो अथवा ओलंपिक खेल ही क्यों ना हो, खिलाड़ियों को अपने घुटने के बल बैठकर एक खास प्रदर्शन करना आखिर क्या दिखाता है? आखिर क्यों दुनिया भर के खिलाड़ी अपने अपने क्षेत्र में इस प्रकार की Body Language बना रहे हैं? Football Players Kneeling 18वीं और 19वीं शताब्दी में जब ब्रिटेन पूरी दुनिया पर अपना राज कर रहा था। तब ब्रिटिश अधिकारी कई अलग-अलग तरीकों से उन देशों के मूल निवासियों के प्रति घृणा का भाव रखते थे। जिनमें सबसे बड़ा भाव था रंग के आधार पर भेदभाव करना। रंगभेद, नस्लभेद या Racism भी कहा जाता है। रंगभेद और नस्ल भेद वक्त के साथ कमजोर पड़ते गए लेकिन कभी पूर्ण रूप से खत्म नहीं हो पाए। कुछ लोगों का केवल अपने त्वचा के रंग आधार पर यह मानना कि वह बाकी दुनिया से श्रेष्ठ हैं, एक प्रकार की विकृत ...