सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Suicide Fruiting

इस साल बाज़ार में जितने जामुन दिखाई दे रहे हैं, उतने मैंने पिछले दो दशकों में कभी नहीं देखे। ​जामुन के अक्षरशः ढेर लग रहे हैं (नीचे गिर रहे हैं)। जिन पेड़ों पर पिछले साल इक्का-दुक्का फल आए थे, वे पेड़ भी इस बार जामुन से पटे पड़े हैं। जहाँ फल आए थे, वहाँ अब उन का अंबार लगना शुरू हो गया है। ​आखिर यह सब क्या चल रहा है? ​हमारी दादी/नानी हमेशा कहती थीं कि, "जिस गर्मियों में जामुन के ऐसे ढेर लगते हैं, उस साल सूखा पड़ता है।" ​बुजुर्गों का यह पारंपरिक ज्ञान वनस्पति विज्ञान (Botany) के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बिल्कुल सही और सटीक है। विज्ञान में इस दिलचस्प और उतनी ही चौंकाने वाली प्रक्रिया को "मास्टिंग" (Masting) या "स्ट्रेस फ्रूटिंग" (Stress Fruiting) कहा जाता है। ​पेड़ों द्वारा खुद को खत्म करके ज्यादा से ज्यादा फल देने के इस आखिरी प्रयास को कभी-कभी "सुसाइड फ्रूटिंग" (Suicide Fruiting) या "बंपर क्रॉप" भी कहा जाता है। ​यह असल में क्या है और इसके पीछे का विज्ञान क्या कहता है, आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं: ​१. 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट' (अस्ति...

The Story of Delhi's Khuni Darwaja

 दिल्ली के खूनी दरवाजा पर खत्म हुआ था अकबर का वंश।


1857 के दौरान पूरे भारत देश में अंग्रेजो के विरूद्ध विद्रोह पनप रहा था। उस वक्त के मुगल शासक बहादुर शाह जफर ने भी अंग्रेजो के विरूद्ध विद्रोह का साथ दिया।


शुरू में विद्रोह सफल रहा लेकिन बाद में अंग्रेज इस विद्रोह को दबाने में सफल रहे।


मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर द्वितीय ने बचने के लिए अपने बेटों मिर्जा मुगल और खिजर सुलतान और पोतों के साथ हुमायू के मकबरे में छिप गए।


जहां मेजर हडसन ने उनको पकड़ लिया। मेजर हडसन ने उनको बोला की अंग्रेज सरकार आपको मारना नहीं चाहती है अगर आप आत्मसमर्पण कर दे तो, यह सुनकर बहादुर शाह जफर ने आत्म समर्पण कर दिया और उनके बेटों को पकड़ लिया गया।


लेकिन हडसन कुछ और ही चाह रहा था। जब वह बहादुर शाह जफर के बेटों और पोते को पकड़ के लिए जा रहा था तो बहुत बड़ी भीड़ पीछे चल रही थी।


कुछ गडबड ना हो इसको देखते हुए हडसन ने बहादुर शाह जफर के लड़को के कपड़े और शरीर पर पड़े हुए सारे जेवर उतरवा लिए।


उनको पूरी तरह नंगा करने के बाद दिल्ली के खूनी दरवाजे पर तीनों को गोली मार दी। उसके बाद मेजर हडसन वहीं से चिल्लाया की हिंदुओ मैंने तुम लोगों का बदला ले लिया है।


जिस तरह मुगलों ने लाखों हिंदुओं का कत्ल किया और महिलाओं की इज्जत लूटी वह आज आपके सामने नंगे मरे पड़े हैं।


मेजर हडसन ने यह इसलिए बोला ताकि आगे कोई विद्रोह ना हो सके और लोगों में डर फैलाने के लिए मुगल वंशजों की नंगी लाश को चांदनी चौक पर फेंक दिया।


2 दिन तक लाश वहीं पड़ी रही और किसी को लाश उठाने नहीं दिया। इधर बहादुर शाह जफर को कैद करके रंगून (म्यांमार) भेजने की तैयारी शुरू कर दी।


बहादुर शाह जफर ने भूख लगने पर जब खाना मांगा तो हडसन ने उनके बेटों के सर लाकर थाली में परोस दिए और यह देखकर बहादुर शाह जफर बेहोश हो गया।


जबकि यही काम मुगलों ने बंदा बहादुर के साथ किया था जब औरंगजेब ने बंदा बहादुर के बेटे को उन्हीं के सामने मारकर उसका कलेजा निकालकर बंदा बहादुर के मुँह में डाल दिया था।


बाद में बहादुर शाह जफर की रंगून में कैद के दौरान मृत्यु हो गई। बाकि बचे हुए अकबर के वंशजों को भी अंग्रेजो ने पकड़ पकड़ कर गोली मार दी।


इस तरह अकबर के वंश का समूल नाश कर दिया गया। जिस खूनी दरवाजे पर मेजर हडसन ने बहादुर शाह जफर के बेटों को मारा था उसी खूनी दरवाजे पर औरगजेब ने अपने बड़े भाई दारा शिकोह को मारकर उसकी गर्दन टांग दी थी।


इसी खूनी दरवाजे पर अकबर के बेटे जहांगीर ने अकबर के नौ रत्नों में से एक रहे अब्दुल रहीम खाने खाना के बेटों को मारकर लटका दिया था।

टिप्पणियाँ

Best From the Author

Not demonic, just introverted! आसुरी नहीं, अंतर्मुखी!

मैं 27 मूल नक्षत्रों, शनिवार और 22 तारीख को जन्मा व्यक्ति हूँ — एक ऐसा जन्म‑संयोग जो न सिर्फ़ मेरी तिथि बताता है, बल्कि मेरे भीतर की गहराई, द्वंद्व और अस्थिरता का भी संकेत देता है। राहु के प्रबल और दूरदर्शी प्रभाव ने मेरे व्यक्तित्व को सीधे, सरल और सतही नहीं रहने दिया; मैं विचारों की उस गहरी खाई में अक्सर भटक जाता हूँ, जहाँ हर बात बस बाहरी रूप नहीं, बल्कि भीतरी अर्थ भी धरती होता है। मैं हर निर्णय के पीछे छिपे संभावित नतीजों, अनजाने खतरों और छिपी हुई उम्मीदों को भी देखने का आदी हूँ।   कभी‑कभी लोग मेरे कार्यों, अभिव्यक्ति और निर्णयों को असामान्य, अत्यंत गहन या यहाँ तक कि “आसुरी” समझने लगते हैं, क्योंकि मेरी सोच उनकी सामान्य धारणाओं की रेखाओं से बाहर निकल जाती है। पर यह आसुरी नहीं, बस एक टूटी हुई, खुरदरी और अत्यंत ईमानदार आत्मा की आवाज़ है, जो दिखावे की दुनिया से थक चुकी है और अपने सच्चे रूप में जीना चाहती है। मैं जब भी बोलता हूँ, तो बस शब्द नहीं बोलता, बल्कि उसके पीछे समा दर्द, संघर्ष, अनुभव और उम्मीदों को भी लाता हूँ।   मेरी पहचान में ग्रहों का भी बड़ा हाथ है। जब ग्रह ही वही है...

काग के भाग बड़े सजनी

  पितृपक्ष में रसखान रोते हुए मिले। सजनी ने पूछा -‘क्यों रोते हो हे कवि!’ कवि ने कहा:‘ सजनी पितृ पक्ष लग गया है। एक बेसहारा चैनल ने पितृ पक्ष में कौवे की सराहना करते हुए एक पद की पंक्ति गलत सलत उठायी है कि कागा के भाग बड़े, कृश्न के हाथ से रोटी ले गया।’ सजनी ने हंसकर कहा-‘ यह तो तुम्हारी ही कविता का अंश है। जरा तोड़मरोड़कर प्रस्तुत किया है बस। तुम्हें खुश होना चाहिए । तुम तो रो रहे हो।’ कवि ने एक हिचकी लेकर कहा-‘ रोने की ही बात है ,हे सजनी! तोड़मोड़कर पेश करते तो उतनी बुरी बात नहीं है। कहते हैं यह कविता सूरदास ने लिखी है। एक कवि को अपनी कविता दूसरे के नाम से लगी देखकर रोना नहीं आएगा ? इन दिनों बाबरी-रामभूमि की संवेदनशीलता चल रही है। तो क्या जानबूझकर रसखान को खान मानकर वल्लभी सूरदास का नाम लगा दिया है। मनसे की तर्ज पर..?’ खिलखिलाकर हंस पड़ी सजनी-‘ भारतीय राजनीति की मार मध्यकाल तक चली गई कविराज ?’ फिर उसने अपने आंचल से कवि रसखान की आंखों से आंसू पोंछे और ढांढस बंधाने लगी।  दृष्य में अंतरंगता को बढ़ते देख मैं एक शरीफ आदमी की तरह आगे बढ़ गया। मेरे साथ रसखान का कौवा भी कांव कांव करता चला आ...

Kashi ka Assi Book Review

**किताब समीक्षा: "काशी का अस्सी"** **लेखक**: काशीनाथ सिंह   **शैली**: व्यंग्यात्मक कथा साहित्य   **प्रकाशन वर्ष**: 2004 "काशी का अस्सी" हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण और चर्चित उपन्यास है, जिसे काशीनाथ सिंह ने लिखा है। यह किताब बनारस की जीवनशैली, वहाँ की संस्कृति और आम जनमानस की भाषा और बोलचाल का जीवंत चित्रण करती है। किताब का केंद्र बनारस का प्रसिद्ध अस्सी घाट है, जो सिर्फ एक भौगोलिक स्थल नहीं, बल्कि बनारसी जीवन का प्रतीक है। ### **कहानी का सारांश**: कहानी अस्सी घाट के इर्द-गिर्द घूमती है, जहाँ विभिन्न तबकों के लोग बैठकर बातचीत, बहस और ठहाके लगाते हैं। यह बनारसी समाज की धड़कनों को पकड़ता है। किताब में कई पात्र हैं, जिनमें मुख्यत: पंडित, टीकाकार, शिक्षक, छात्र, नौकरीपेशा लोग और साधारण नागरिक शामिल हैं। हर व्यक्ति का अपना दृष्टिकोण और जीवन के प्रति अपने अनुभव होते हैं, जो किताब को वास्तविक और मजेदार बनाते हैं। **काशी का अस्सी** में अस्सी घाट के पंडों और स्थानीय निवासियों के रोजमर्रा के जीवन को बड़े ही सजीव और व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है। काशी का परंपर...